बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तर भारत में दल का विस्तार / 289
तक भी हस्तिनापुर नहीं गया। सन् 1937 में छूटने के बाद मैं दो दफा मेरठ
गया। मेरे कुछ साथी हस्तिनापुर हो आए हैं। लेकिन मुझे हस्तिनापुर जाने का
अवकाश नही मिला।
मेरठ में मैं कई बार आया-गया। दुबलिसजी की सहायता से मेरठ में दो-
चार आदमी और मिलने लग गए थे। लेकिन मेरी गिरफ्तारी के कारण मेरठ का
संगठन कुछ अधिक अग्रसर नही हो पाया। एक आर्यसमाजी प्रचारक वैश्य
अनाथालय मे आया करते थे। उनसे मेरी बहुत बातचीत हुई थी। बातचीत
के बाद वह आर्यसमाज के प्रचारक मेरे साथ काम करने को तैयार हो गए। वह
सज्जन पंजाब तक जाते थे। लेकिन दुख की बात है कि मेरी अनुपस्थिति में
इन सज्जन से किसी ने कोई काम नही लिया।
मेरठ के बाद मुझे पंजाब जाना था। लेकिन जेब से रुपया निकल जाने के
कारण फिलहाल पजाब जाना स्थगित किया किन्तु पजाब जाना तो था ही, इस-
लिए बनारस और इलाहाबाद घूमकर मैं फिर पंजाब गया।
पजाब मे जाकर लाहौर के प्रोफेसर जयचन्द्रजी विद्यालकार के यहाँ ठहरता
था। अब की बार भी विद्यालंकारजी के ही यहाँ ठहरा। मुझे ठीक स्मरण नही है
कि अब की बार या इसके पहले ही मुझे पता लग गया था कि सरदार गुरुमुखसिंह
इत्यादि जो अपना अलग सगठन कर रहे थे यह नही चाहते थे कि अबकी बार
सिख गैर सिक्ख सस्थाओ के साथ मिलकर भारतीय विप्लववादी आन्दोलन मे भाग
लें। यहाँ तक कि सरदार गुरुमुखसिंहजी ने चाहा कि हमारे सच्चे साथी सरदार
भगतसिंह को हम लोगो से तोडकर अपनी संस्था मे मिला लें। इस कारण गुरुमुख-
सिंह ने भगतसिंहजी को बहुतेरा समझाया कि तुम बंगालियो के फेर में मत पड़ो
इनके फेर मे पड़ोगे तो फाँसी पर लटक जाओगे काम कुछ भी नही कर पाओगे।
इस प्रकार से गुरुमुखसिंहजी जितनी बाते भगतसिंहजी से कहते थे वे हम लोगों
से सब कह देते थे। बहुत बहकाने पर भी भगतसिंहजी ने हम लोगों का साथ नही
छोडा। मैं भी गुरुमुखसिंहजी से मिलता रहा। अपनी संस्था के छपे हुए कानून-
कायदे गुरुमुखसिंहजी ने मुझे दिए थे। उन सबसे मुझे पता चला कि उनकी सस्था
रूस की साम्यवादी नीति पर सगठित है। साम्यवाद की नीति पर गुरुमुखसिंहजी
से बहुत बातचीत हुई। जहाँ तक मुझे आज याद है उस समय गुरुमुखसिंहजी पूर्ण
रीति से मार्क्सिस्ट नही थे कारण कि भौतिकबाद मे उनका पूरा विश्वास नही
था। यदि मैं भूल नही कर रहा हूँ तो सम्भव है गुरुमुखसिंहजी ने मुझसे यह भी कहा
था कि रूस की पूरी नकल करने की कोई आवश्यकता नही है। सरदार सन्तोष-
सिंह नामक एक सज्जन रूस से वापस आये हुए थे। मैं जिस समय पंजाब गया
था उस समय सरदार सन्तोषसिंहजी एक गाँव मे नजरबन्द थे। लेकिन मुझे
ऐसा मालूम हुआ कि सरदार सन्तोषसिंह ही यथार्थ में गुरुमुखसिंह आदि के संस्था
के संचालक, व्यवस्थापक या संस्थापक थे,। उनकी सलाह से ही गुरुमुखसिंह
इत्यादि काम करते थे। इसके बहुत पहले से ही मैं कम्यूनिज्म का साहित्य पढ़ने