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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 300, कुल 408 में से

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पृष्ठ 300

298 / बन्दी जीवन

अवतीर्ण होते हैं। सन् 1921 के सत्याग्रह आन्दोलन के समय महात्माजी कौंसिल
प्रवेश के विरोधी थे और देशबन्धु दास, पण्डित मोतीलाल नेहरू और लाला
लाजपतराय इत्यादि कुछ नेता गण कौंसिल प्रवेश के पक्ष में थे। पं० जवाहर-
लाल श्री पुरुषोत्तमदासजी टंडन इत्यादि नेतागण महात्माजी की तरह कौंसिल
प्रवेश के विरोधी थे। देहली कांग्रेस में दास पक्ष की विजय हुई। ऐसी परिस्थिति
में मैंने टंडनजी से यह आग्रह किया कि अब समय आया है कि कांग्रेस ध्येय
में परिवर्तन करने की चेष्टा की जाय। अपनी विशेष मानसिक परिस्थिति
के कारण टंडनजी ने अबकी बार मेरे परामर्श को स्वीकार कर लिया। जहाँ
तक मुझे स्मरण है बाबू राजेन्द्रप्रसादजी ने भी खुले अधिवेशन में टंडनजी के
प्रस्ताव का समर्थन किया था। टंडनजी ने यह प्रस्ताव किया था कि कांग्रेस के
ध्येय में अब परिवर्तन करने का समय आया है। इस प्रस्ताव के समर्थकों में मेरा
नाम भी था। परन्तु मेरे बोलने का समय आने से पहले ही मौलाना अबुलकलाम
आजाद जी सभापति के आसन से कुछ देर के लिए हट गये थे और उस समय
श्री दास जी सभापति के आसन पर बैठे थे। मैंने तो मन ही मन समझा कि मुझे
अच्छा अवसर मिला। परन्तु दुर्भाग्य से मौलाना मुहम्मदअली बोलने को खड़े
हो गये और लगभग डेढ़ या दो घण्टे तक बोलते ही रहे। दासजी उन्हें बोलने
से रोकना नहीं चाहते थे। इसके बाद मुझे बोलने का अवसर नहीं मिला।
टंडनजी पूर्ण स्वाधीनता के ध्येय को तो पसन्द करते थे। परन्तु इस ध्येय
को कार्यरूप में परिणत करने के लिए जीवन में उन्होंने क्या प्रयत्न किये यह
मुझे ज्ञात नहीं है। देहली अधिवेशन के बाद कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में भी
उन्होंने कांग्रेस के ध्येय को बदलने की कोई चेष्टा की या नहीं मुझे पता नहीं।
हिंसा-अहिंसा के प्रश्न पर भी उनकी नीति क्रान्तिकारियों अथवा श्री अरविन्द या
लोकमान्य तिलक की नीति से भिन्न न थी। श्री तिलक ने गीता रहस्य लिखकर
अपने दार्शनिक सिद्धान्त को युक्ति एवं भारतीय दर्शन के आधार पर सुप्रतिष्ठित
करने की चेष्टा की। श्री अरविन्द ने सालों तक दैनिक एवं साप्ताहिक पत्रों में
अपने राष्ट्रीय एवं दार्शनिक सिद्धान्तों का प्रचार किया। उस समय भारत एवं
विशेषकर बंगाल में सशस्त्र क्रान्ति की लहर उमड़ रही थी। अकाली सिक्खों
की तरह उन्होंने भी कभी विप्लव आन्दोलन की निन्दा नहीं की। प्रकाश्य
आन्दोलन के सम्पर्क में अथवा व्यक्तिगत जीवन में उन्होंने कभी भी हिंसा और
अहिंसा के सिद्धान्त पर राजपुरुषों के दृष्टिकोण से अपने पक्ष को दुर्बल नहीं
किया। देशबन्धुदासजी ने भी अपने देहावसान के कुछ दिन पहले तक अपनी
नीति तिलक और अरविन्द की भाँति स्थिर रखी। जब कलकत्ते के पुलिस
कमिश्नर टेगार्ट की भूल में 'डे' साहब मारे गए तो बंगाल प्रान्तीय कांग्रेस
कमेटी में 'डे' साहब के मारनेवाले श्री गोपीमोहन के प्रति सम्मान एवं प्रीति
सूचक प्रस्ताव पास किया गया था। इस प्रस्ताव के पास कराने में देशबन्धुदास
जी की पूर्ण सहायता थी। महात्माजी इस बात से एकदम बिगड़ गए एवं