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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 301, कुल 408 में से

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पृष्ठ 301

उत्तर भारत में दल का विस्तार / 299

महात्माजी ही के कारण अ० भा० कमेटी मे बंगाल प्रान्तीय काग्रेस कमेटी के
प्रस्ताव के विरुद्ध दूनरा प्रस्ताव लाया गया। दासजी अपने प्रस्ताव पर डटे
रहे। अवश्य महात्माजी को अधिक वोट मिले फिर भी गोपीमोहन शाह की
प्रशंसा मे जो प्रस्ताव पहले पास हो चुका था उसके पक्ष मे भी यथेष्ठ वोट
आये। महात्माजी अपने व्यक्तित्व के कारण जीत तो अवश्य गए परन्तु उन्होंने
स्वय ऐसा कहा था कि दासजी के पक्ष मे भी इतने वोट आए इससे यह स्पष्ट
प्रतीत होता है कि अहिंसा का पक्ष अभी प्रबल नही हुआ। महान् आश्चर्य की
बात तो यह है कि सरदार भगतसिंह की प्रशंसा मे कराची काग्रेस में महात्माजी
के ही परामर्श एव सहायता से एक विशेष प्रस्ताव पास हुआ। इससे भी आश्चर्य
की बात यह है कि विलायत मे राउण्ड टेबुल काफ्रेम मे जाने के पहले बम्बई
मे अ० भा० काग्रेम कमेटी की बैठक मे कराची के इस भगतसिंह के प्रशंसा-
सूचक प्रस्ताव के विरुद्ध एक अन्य प्रस्ताव पास किया गया। ओर कराची वाले
प्रस्ताव को वापस कर लिया गया। इस प्रकार हिंसा अहिंसा की नीति पर काग्रेस
आन्दोलन मे जितनी बार प्रश्न उठ खड़े हुए टंडनजी ने कभी भी महात्माजी के
विरुद्ध अपने पक्ष का समर्थन नही किया।
व्यक्तिगत जीवन मे टंडनजी महान् त्यागी पुरुष हैं। जिस समय आप
लाहौर के एक बैंक के मैनेजिंग डायरेक्टर थे लाला लाजपतराय का देहान्त हो
गया। लाला जी लोक सेवक सघ के अध्यक्ष थे। महात्माजी के कहने पर
टंडनजी ने मैनेजिंग डायरेक्टरी छोड़कर लोक सेवक सघ का कार्यभार अपने
ऊपर ले लिया। सन् 21 के सत्याग्रह आन्दोलन के समय टंडनजी ने वकालत
छोड़ दी और उमके बाद उन्हें बहुत आर्थिक कष्ट सहने पड़े। फिर भी कभी
उन्होंने किसी के सामने हाथ नही फैलाये। इसके अतिरिक्त महात्माजी के
राष्ट्रीय आन्दोलन मे आने के बहुत पहले से ही टंडन जी अपने व्यक्तिगत जीवन
मे अहिंसा नीति का पालन करते आए है। आप इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी
'क्रीपसोल' वाले कैनबेस के जूते पहनकर वकालत करने आते थे। राष्ट्रीय
आन्दोलन के क्षेत्र मे आप सदा ही क्रान्तिकारी आन्दोलन के प्रति हार्दिक
सहानुभूति रखते थे। लेकिन ये सब बाते होते हुए भी भारतीय क्रान्तिकारी
आन्दोलन का यह बड़ा दुर्भाग्य है कि टंडनजी जैमे महानुभाव ने इस आन्दोलन
मे सक्रिय रूप से भाग नही लिया। बहुत कहने-सुनने पर काग्रेस के देहली
अधिवेशन में आपने स्वाधीनता का प्रश्न उठाया था।
राष्ट्रीय आन्दोलन के बड़े-बड़े नेताओं के विषय में में इसलिए इतनी बातें
लिख रहा हूँ कि पाठकों को इन महानुभावों की मनोवृत्तियों से परिचित होने
का अवसर मिले। यह कहना अत्यन्त कठिन है कि भविष्य में भारतीय क्रान्ति-
कारी आन्दोलन कैसा रूप ग्रहण करेगा। परन्तु इसमें सन्देह नहीं कि भारत के
इतिहासकारों को भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का विश्लेषण करना पड़ेगा।
मुझे आशा और विश्वास है कि मेरे इतिहास से भविष्य के इतिहास लेखकों को