बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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इस प्रसंग में एक बात और बता देना अप्रासंगिक न होगा। मेरे साथ बात-
चीत करने के परिणामतः देशबन्धुदास इतने प्रबल रूप से प्रभावान्वित हुए थे कि
उन्हीं दिनों में एक प्रकाश्य सभा में उन्होंने अंग्रेज सरकार को चेतावनी देकर
कहा था कि यदि सरकार समझती है कि क्रान्तिकारी आन्दोलन दब गया है तो
वह भारी भूल में पड़ी हुई है, यह आन्दोलन इतना व्यापक एवं गंभीर रूप धारण
किये हुए है कि यदि सरकार जनमत की अवहेलना करेगी तो उसे बुरी तरह
पछताना पड़ेगा।
इस वक्तृता के बाद बंगाल सरकार की तरफ से खुफिया विभाग के एक
पुलिस सुपरिटेंडेंट श्री भूपेन्द्र चटर्जी को श्री देशबन्धु के पास भेजा गया था। सर-
कार जानना चाहती थी कि दासजी के उस वक्तव्य का आधार क्या है। भूपेन्द्र
चटर्जी बहुत देर तक सी० आर० दासजी को प्रश्न पूछ-पूछकर परेशान करते रहे।
सरकार जानना चाहती थी कि क्या वर्तमान परिस्थिति वैसी नाजुक है जैसी
कि सन् 1915-16 में हुई थी।
भूपेन्द्र चटर्जी के मिलने के बाद मैं फिर सी० आर० दासजी से मिला था
और उन्ही की जबानी ये सब बातें सुनी थी। कलकत्ता शहर-भर मे यह बात
फैल गई थी कि बंगाल सरकार सी० आर० दासजी की बातों से विचलित हो
गई थी।
जिस समय दासजी ने ऐसी वक्तृता दी थी उस समय ढाका समिति के साथ
मेरा समझौता हो चुका था। मैं सी० आर० दासजी के साथ जो सम्बन्ध स्थापित
करना चाहता था ढाका अनुशीलन समिति के नेतागण उसे पसन्द नहीं करते थे।
उनका कहना था कि दासजी के वक्तव्य से सरकार और चौकन्नी हो जाएगी
इससे हमारे कार्य में बहुत बाधा पहुँचेगी और लाभ कुछ न होगा। मैं इनकी बातो
से सहमत न था। मैं कहता था कि इससे क्रान्तिकारी आन्दोलन भी प्रबल होता
जा रहा है और इससे हमारे आन्दोलन को लाभ होगा। इस प्रकार से राष्ट्रीय
आन्दोलन के ऊपर क्रान्तिकारी आन्दोलन की एक गहरी छाप पड़ रही है।
लेकिन ढाका समिति के नेताओं ने मेरे दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया।