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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 303, कुल 408 में से

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पृष्ठ 303

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क्रान्तिकारी दल और कम्यूनिस्ट
अब एक दूसरी विशेष महत्त्वपूर्ण बात का उल्लेख कर रहा हूँ। देहली में
एक और व्यक्ति से मेरी मुलाक़ात हुई। आपकी आयु अनुमान से तीस वर्ष की
रही होगी। आपसे मेरा पूर्व परिचय न था। आपका नाम कुतुबुद्दीन अहमद था।
अपना परिचय देते हुए आपने बताया कि वे श्री मानवेन्द्रनाथ राय के आदमी
हैं। इस परिचय से मेरे मन में बड़ा हर्ष और कुतूहल हुआ। कुतुबुद्दीन साहब ने
बड़े प्रेम से कहा में बहुत दिनों से आपसे मिलना चाहता था। मानवेन्द्र राय ने
आपको मास्को बुलाया है। वहाँ कम्यूनिस्ट इण्टर नेशनल कांग्रेस होने जा रही
है। राय साहब की इच्छा है कि आप भी उस समय पर उपस्थित हों। विशेष-
कर आप ही से मिलने के लिए में देहली आया हूँ।" मैंने कहा, "कम्यूनिज्म के
बारे में मैं ठीक-ठीक मब बातें नहीं जानता।" कुतुबुद्दीन साहब ने उत्साहपूर्वक
कहा, "आपको यह सब बातें समझाना मेरा काम है।"
में तो कम्यूनिज्म के बारे में सब बाते पहले ही से अच्छी तरह जानना
चाहता था। कुतुबुद्दीन माहब का प्रस्ताव तो मेरे लिए एक सौभाग्य की बात
थी। उनके साथ बहुत देर तक मेरी बातचीत हुई। कुतुबुद्दीन साहब से ही मैंने
जीवन में सर्व प्रथम कम्यूनिज्म के मूल तत्व को यथार्थ रूप में समझा। मेरे
जीवन की यह एक महान् ऐतिहासिक घटना है।
कुतुबुद्दीन साहब ने मुझसे कहा कि कम्यूनिज्म का ध्येय है समाज की ऐसी
व्यवस्था करना जिससे समाज की कोई भी सम्पत्ति किसी व्यक्ति के हाथ में न
रहकर समाज के हाथ मे रहे। यह सुनते ही मेरे मन में हिन्दुओं के संन्यास आश्रम
की बात आई इसलिए उसी क्षण मैंने कहा कि यह तो मनुष्य जीवन की चरम
उन्नति पर निर्भर है। मनुष्य जीवन की अन्तिम उन्नति हुए बिना कैसे यह
सम्भव है कि समाज की सम्पत्ति व्यक्ति के हाथ में न रहकर समाज के हाथ में
चली जाय। यह सुनकर कुतुबुद्दीन साहब ने कहा कि नहीं क्रान्ति के भागं से
भी समाज व्यवस्था ऐसी बनाई जा सकती है जिसके परिणाम में सम्पत्ति
व्यक्ति के हाथ मे से समाज के हाथ में चली जाय एवं उसी अवस्था में शिक्षा-
दीक्षा की सहायता से मनुष्य की चरम उन्नति संभव होगी। मेरे लिए यह
एकदम नई कल्पना थी। मैं थोड़े समय के लिए चकित-सा रह गया। और मुझे