बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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काफी प्रतिष्ठा थी। वे देशबन्धुदास के अत्यन्त विरोधी थे। अकाली आन्दोलन
के सिलसिले में एक बार पं० जवाहरलालजी के साथ गिडवानी साहब नाभा
पधारे थे। गिरफ्तारी के बाद थोड़े ही दिनों में वे दोनों सज्जन छोड़ दिये गए
थे। पुनः नाभा के सत्याग्रह आन्दोलन में इन सज्जनों में से किसी ने कोई भाग
नहीं लिया। सन् 1921 में आसाम बंगाल रेलवे कर्मचारियों ने एवं पूर्व बंगाल
की स्टीम नेवीगेशन कम्पनियों के कर्मचारियों ने भी भारी हड़ताल कर दी थी।
इन हड़तालों के कराने में देशबन्धुदासजी का विशेष हाथ नहीं था। लेकिन जब
हड़ताल प्रारम्भ हो गई थी तो देशबन्धुजी ने हड़तालियों की जी-जान से सहायता
की थी। उस समय चटगांव इत्यादि स्थानों के कलक्टरों को भी इन हड़तालों के
कारण कोई सामान नही मिलता था हर प्रकार से हड़ताल सफल रही थी।
देहली की कांग्रेस में जाने के पहले ही पं० जवाहरलालजी से मेरी बातचीत
हो चुकी थी। उसका उल्लेख मैंने पहले ही कर दिया है। देहली कांग्रेस के
अवसर पर एक बार मुझे डाक्टर अंसारी के स्थान पर जाना पड़ा। वहाँ पर
पं० जवाहरलालजी से मेरी भेंट हुई। पंडितजी बहुत आग्रह के साथ आनन्दित
होकर मुझे एक विशेष कमरे में ले गए। वहाँ श्री कुरेशी से मेरी जान-पहचान
करा दी। मैं यह देख रहा था कि इन नेताओं में गुप्त आन्दोलन की बाते जानने
का तीव्र कुतूहल हो रहा था। कुरेशी साहब मुझे बहुत प्रशान्त मालूम पड़े। वे
प्रफुल्लचित्त तो अवश्य दिखाई पड़ रहे थे किन्तु बातें उन्होंने बहुत कम कीं। जब
आपसे मेरी फिर मुलाकात हुई तो मैं अभियुक्त की दशा में काकोरी केस के
सिलसिले में अदालत के कटघरे के अन्दर बैठा था और कुरेशी साहब दर्शकों के
स्थान पर बैठे थे।
हिन्दुस्तानी सेवा दल के संस्थापक डाक्टर हर्डीकर महोदय एक समय
अमेरिका मे थे। उस समय भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन मे कुछ व्यक्तियों से
उनका परिचय हुआ था। उनके परिचित व्यक्तियों मे से एक सज्जन का नाम
पिंगले था। बन्दी जीवन के पाठकगण पिंगले के नाम से भली-भांति परिचित हैं।
पंजाब का विप्लव आन्दोलन विफल हो जाने के पश्चात् जिस समय श्री रास-
बिहारी बोस बनारस में रहकर फिर नये सिरे से विप्लव आन्दोलन का कार्य कर
रहे थे उस समय श्री हर्डीकर का संवाद श्री रासबिहारी के पास आया था। इस
बात को मैं जानता था। इसलिए दिल्ली कांग्रेस के अवसर पर मैं हर्डीकरजी
से बहुत मिलना चाहता था। परन्तु उनसे मिलकर मुझे तृप्ति नहीं हुई। मैंने
अनुभव किया कि हर्डीकर साहब अब पुराने रास्ते को छोड़ना चाहते हैं। सन्
1916 से लेकर आज सन् 1929 तक श्री हर्डीकरजी अपने ढंग पर देशसेवा के काम
में लगे हुए थे। हर्डीकरजी त्यागी समझदार तथा गभीर प्रकृति के विलक्षण व्यक्ति
हैं। लेकिन यदि हम ऐसे विलक्षण व्यक्ति के तेईस सालों के कामों की तुलना
सरदार भगतसिंह अथवा श्री यतीन्द्रनाथ दास अथवा चटगाँव आर्मरी केस के
श्री सूर्यकान्त सेन और बंगाल के दूसरे विप्लवी कार्यकर्ताओं के कार्यों से करें तो