बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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श्री मोतीलालजी, जवाहरलालजी तथा
श्री सी० ऋार० दास से भेंट
इधर बंगाल की बातें कहने को बहुत कुछ रह गई हैं। जमशेदपुर के काम को
छोड़ देने के बाद और इलाहाबाद आने के पहले एवं इलाहाबाद से भी मैं कई
दफा कलकत्ता गया था। उसका विवरण देना अभी बाकी है।
पंजाब का समाचार लेकर के उस समय मैं बंगाल गया था। आज भी मुझे
यह ठीक-ठीक स्मरण है कि मैं देशबन्धु सी० आर० दास से कई बार मिला था
और पंजाब का संदेश लेकर उनसे बहुत बातचीत हुई थी। उसका सब वृतान्त
आज प्रकाश कर देने से किसी की भी कोई हानि नही है ऐसा मैं समझता हूँ।
इसके पहले पं० जवाहरलालजी से भी मेरी जो बातचीत हुई थी उसे भी यहाँ
लिख देना अप्रासंगिक नही होगा। विशेष करके पं० जवाहरलालजी ने अपनी
आपबीती (मेरी कहानी) में क्रान्तिकारी आन्दोलन के बारे में जगह-जगह पर
अपने बहुत कुछ मन्तव्य प्रकाशित किये हैं। जमशेदपुर के काम को छोड़ देने के
बाद इलाहाबाद मे मैंने पं० मोतीलालजी नेहरू एवं पं० जवाहरलालजी नेहरू से
मुलाकात की थी। उस समय पं० मोतीलालजी नेहरू स्वराज्य पार्टी बनाने में लगे
हुए थे। अभी तक देहली मे कांग्रेस का विशेष अधिवेशन नहीं हुआ था। मुझे
इस समय याद नही है कि गया में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन हो चुका था या
नही। मोतीलालजी से मैंने बहुत नम्रता एवं आन्तरिकता के साथ यह निवेदन
किया था कि कांग्रेस कार्यक्रम का यह एक प्रधान अंग होना चाहिए कि कांग्रेस
सदस्यों को लेकर जो संगठन हो उमका स्वरूप ऐसा होना आवश्यक है जैसा
आयरलैंड का 'शिनफीना' संगठन था अथवा जैसा यूरोप के अन्य देशों में राज-
नीतिक संगठन होते थे। यहाँ आवश्यकता पड़ने पर आदमियों की माँग की जाती
है और उस समय जाने कितने प्रकार के आदमी कितनी विभिन्न भावनाओं को
लेकर थोड़े दिन के लिए कांग्रेस के काम में भाग लेते हैं। लेकिन होना यह
चाहिए कि देश-सेवा के आदर्श को लेते हुए त्यागी मनुष्यों का ऐसा दल तैयार
हो जिसमें प्रत्येक व्यक्ति देश-सेवा के आदर्श को यथार्थ रूप में हृदयंगम करके
भ्रातृभाव से प्रणोदित होकर बहुकाल व्यापी त्याग का जीवन व्यतीत करने के लिए
तैयार हो। मेरे दिल में और भी बहुत-सी बातें थीं जिन्हें प्रकाश करने के पूर्व ही
श्री मोतीलालजी, जवाहरलालजी तथा श्री सी० आर० दास से भेंट / 273
पं० मोतीलालजी मेरे प्रस्ताव की हँसी उड़ाने लग गए। मैं पंडितजी को यह नहीं
समझा पाया कि फ्रांसीसी राज्य क्रान्ति के पहले फ्रांस में और विशेषकर पैरिस
में कितने राजनीतिक क्लबों की स्थापना हुई थी। पंडितजी ने मेरी बातों को पूरी
तरह से सुना भी नहीं और जब कभी अपने कामों से फुरसत पाते थे और मैं पास
होता था तो पंडितजी मेरी तरफ दृष्टि निक्षेप करके मुस्कराकर मुझसे पूछते थे,
"कहा मिस्टर सान्याल और कुछ ब्रिलियण्ट सजेशन हैं ?" मैं भी अपनी लज्जा
और झेंप को छिपाने के लिए कह दिया करता था, "जहाँ तो सभी ब्रिलियण्ट हैं
इन सब के सामने मैं क्या अपनी ब्रिलियन्सी दिखलाऊँ।" पं० मोतीलालजी से
तो इससे आगे बातचीत बढी नही । लेकिन पं० जवाहरलालजी से दो-तीन दिन
तक बहुत बातचीत हुई थी । यदि पडितजी की राय मेरी राय से मिल गई होती
तो आज ये सब बातें लिखने की आवश्यकता न होती। कारण उस अवस्था में
तो वे हमारे सहयोगी होने और अपने आदमियो की बात शत्रुओं के सामने
प्रकाशित कर देने का अर्थ होता है देशद्रोह करना । इसके अतिरिक्त पंडित
जवाहरलालजी ने अपनी आत्म-कहानी मे क्रान्तिकारियो के प्रति अपनी राय
व्यक्त करना उचित समझा है, तथा समय-समय पर भारत के राष्ट्रीय नेता की
हैसियत से क्रान्तिकारियो के बारे में उन्होंने बहुत-से वक्तव्य प्रकाशित किये हैं।
मैंने भी एक क्रान्तिकारी होने के नाते प० जवाहरलालजी से जो बातचीत की
थी राष्ट्रीय आन्दोलन के इतिहास मे उसका भी एक स्थान होना उचित है ऐसा
मैं समझता हूं। अण्डमन से लौटने के बाद राजनीतिक बन्दियो की मुक्ति के लिए
आन्दोलन मे उनसे सहायता पाने की इच्छा से एक दफा मैं प० जवाहरलालजी
से मिला था। इसका उल्लेख मैने पहले ही कर दिया है। इसलिए पण्डितजी से
मेरी कुछ थोडी बहुत पहचान हो गई थी। प० मोतीलालजी से निराश होकर मैंने
चाहा कि एक दफे पं० जवाहरलालजी से भी अच्छी तरह से बातचीत करके
क्यो न देख लूं। एक दफे मिलने की इच्छा प्रगट करने पर पं० जवाहरलालजी
ने मेरे मिलने के लिए एक समय नियत कर दिया । उस नियत समय पर एक दिन
प्रातःकाल मैं 'आनन्दभवन' भवन मे पं० जवाहरलालजी से मिला। वह समय
पडितजी का जलपान करने का समय था। बातचीत शुरू होते ही पंडितजी के
लिए कुछ फल इत्यादि आए थे। मुझसे भी उन्होंने पूछा, 'कुछ खाओगे?' मैंने
नम्रता से उत्तर दिया, 'नही, मेहरबानी है, मैं खाकर आया हूँ।' पंडितजी खाते-
खाते मेरे साथ बातचीत करते रहे। कम-से-कम डेढ घण्टे तो अवश्य बातचीत
हुई होगी । मैं पंडितजी को क्रान्तिकारी आन्दोलन की आवश्यकता और उसकी
सफलता के बारे मे विश्वास दिलाना चाहता था ।
प० जवाहरलालजी से जब मेरी बातचीत हो रही थी और मैं पंडितजी के
चेहरे की तरफ देखता था तो मुझे ऐसा अनुभव होता था कि मानो मैं एक अर्वा-
चीन अल्प बुद्धि बहका हुआ सरल लेकिन नासमझ युवक हूँ और पंडितजी मानो
निहायत कृपापूर्वक मेरे साथ बैठकर कुछ समय नष्ट कर रहे हैं। कुछ इस तौर
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पर कि विचारा एक सरल बहका हुआ युवक आया है, कुछ कहना चाहता है, क्या
करें, कुछ तो समय देना ही पड़ेगा। अच्छा कहो, सुनते हैं। नाश्ते का समय है
यों ही सही । लेकिन जैसे-जैसे बातचीत होने लगी वैसे-वैसे ही क्रमशः उनका
निःस्पृह उदासीन भाव चला गया और अपने पक्ष को लेकर पंडितजी ने भी वैसे
ही गम्भीरतापूर्वक तर्क किया जैसा मैंने अपने पक्ष को लेकर आन्तरिकता के साथ
उन्हें समझाना चाहा। पंडितजी ने बहुत शान्तिपूर्वक किसी बात को न छिपाकर
अपनी बात को निहायत स्पष्ट शब्दों में मेरे सामने रख दिया। पंडितजी का
कहना था कि आधुनिक काल में सुप्रतिष्ठित किसी भी राष्ट्र के विरुद्ध वहाँ की
प्रजा के लिए सशस्त्र क्रान्ति करना असम्भव है। मैंने रूस और जर्मनी का दृष्टान्त
दिया और कहा कि आधुनिक काल में इन देशों में सशस्त्र क्रान्ति सम्भव हुई है।
पंडितजी ने मुझे समझाना चाहा कि गुप्त रीति से षड्यन्त्र के मार्ग को ग्रहण करने
पर हम कभी भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकेंगे कारण एक तो हमें इस मार्ग में
बहुत थोड़े आदमी मिलेंगे और दूसरे यह कि जो आदमी मिलेंगे भी उनमें से
हमेशा मुखबिर पैदा होंगे। इन मुखबिरों की वजह से संगठन का कोई काम
पूर्ण नहीं हो पाएगा। हम लोग गुप्त रीति से षड्यन्त्र रचेंगे। थोड़े दिनों में सब
बातें खुल जाएँगी। जेलखाने तथा फाँसी के तख्तों पर हम लोगों की जानें
जाएँगी और इस मार्ग से हम लोग कुछ भी नहीं कर पाएँगे। मैंने उनकी यह बात
स्वीकार कर ली कि गुप्त रीति से काम करने पर मुखबिर तो अवश्य पैदा होंगे
और इन मुखबिरों के मारे बार-बार हमारा संगठन टूट जायगा और बार-
बार हमारे आदमी कालेपानी में तथा फाँसी के तख्तों पर जानें देंगे। तथापि
बार-बार क्रान्तिकारी संगठन पुनः तैयार होगा और हर बार यह संगठन पहले
की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली एवं व्यापक बनता जायगा और फाँसी के तख्तों
पर तथा कालेपानी में जीवन विसर्जन करने के परिणामतः देश-भर में लोगों के
दिलों में त्याग की भावना फैलेगी। प्राणों का मोह कटेगा, साहस एवं दृढ़ता
बढ़ेगी, एवं सर्वोपरि क्रान्ति की भावना अव्यर्थरूप में देश-भर में प्रसार-लाभ
करेगी। मैंने उनसे यह भी कहा कि पहले पहल तो बंगाल में ही एक गुप्त षड्यन्त्र
रचा गया। लेकिन इस क्रान्तिकारी षड्यन्त्र के मामले के परिणाम में क्रान्ति
की लहर बंगाल से लेकर पंजाब तक फैल गई। एक षड्यन्त्र के मामले के स्थान
पर प्रतिवर्ष बीसियों षड्यन्त्र मामले चले एवं दिन ब दिन यह षड्यन्त्रकारी दल
क्रमशः बढ़ता ही गया, घटा नही। जितनी फाँसियां हुईं, जितनी कालेपानी की
सजाएँ हुईं उतने ही प्रबल रूप में क्रान्ति की भावना देश-भर में फैली। फाँसी
या मुखबिरों के कारण क्रान्तिकारी आन्दोलन दबा नहीं बल्कि बढ़ता ही गया।
मुखबिरों के बारे मे सच बात तो यह है कि हम लोगों का काम जितना बढ़ेगा
उतने ही बड़े बड़े मुखबिर भी पैदा होंगे। तभी तो हम लोगों का काम थोड़े
पैमाने में हो रहा है इसलिए अभी जो मुखबिर पैदा होंगे उनसे हमारी हानि थोड़ी
ही होगी। लेकिन जैसे-जैसे हमारा काम अधिक व्यापक एवं प्रचंड होता जायगा
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वैसे ही बड़े-बड़े देशद्रोही निकलेंगे जिनकी स्वार्थान्धता के कारण देश को बड़ी-
बड़ी हानि पहुंचेगी । ‘अमेरिकन वार आफ इण्डिपेन्डेन्स’ अमेरिका के स्वातन्त्र्य
युद्ध के समय बड़े-बड़े जेनरल देश-द्रोहिता करके अंग्रेजों की तरफ चले गए थे ।
पंडितजी ने यह प्रश्न किया था कि “ब्रिटिश गवर्नमेण्ट के मुकाबिले में तुम लोग
कैसे अस्त्र-शस्त्र संग्रह कर सकते हो ? अंग्रेजों की सुशिक्षित सेना के मुकाबिले
में तुम क्या कर सकते हो ? तुम्हारे पास वह शिक्षा कहाँ है ?’’ मैंने इस बात को
भी स्वीकार कर लिया औरकहा कि हमारे सामने यही तो काम है कि हम अपने
आदमी विदेशों में भेजें जहाँ पर वे सामरिक शिक्षा एवं युद्ध सामग्री बनाने के
कारखानो में शिक्षा पा सकें । यह काम भी प्रकाश्य रूप मे कोई कर नही सकता ।
इसके लिए भी तो गुप्त रीति से षड्यन्त्र करने की आवश्यकता है ... अस्त्र-शस्त्र
संग्रह करने के बारे में मैने उनसे जो कुछ कहा था उसे आज भी प्रकाशित
करना उचित नही समझता हूँ । लेकिन पंडितजी को यह विश्वास नही हुआ कि
हम अंग्रेजों के मुकाबिले में सामरिक तैयारी या अस्त्र-शस्त्र ग्रहण कर सकते हैं ।
उन्होने कहा कि “मान लो तुम लोगों ने फ़ौजी अफ़सरों की शिक्षा भी पा ली
लेकिन फिर भी अंग्रेज सरकार की फ़ौज के मुकाबिले मे अपनी फौज कैसे तैयार
करोगे । अगर यह बात भी मान ली जाय कि राइफल और गोली भी बाहर से
मँगा मको गे तो फिर मशीनगन आर्मर्डकार टेंक, तोपखाना, हवाई जहाज़ इत्यादि
के मुकाबिले मे तुम क्या कर सकते हो ।” मैंने हँसकर इसका जवाब दिया था कि
आखिर जर्मन राष्ट्र के मुकाबिले में आधुनिक ससार में कोई राष्ट्र तो था नही ।
जर्मन जेनरलॉ के समान कार्यक्षम होना आमान बात नही है । फिर भी जर्मनी
की रियाया ने कैसे सफलतापूर्वक जर्मन राज्य को तोड़कर वहाँ प्रजातन्त्र क़ायम
किया ? वहाँ भी तो तोपखाने मशीनगन और हवाई जहाज़ थे । लेकिन प्रजा के
विद्रोह के सामने ‘कैसर’ को हॉलैण्ड भाग जाना पड़ा और ‘‘हिण्डेनवर्ग’’ को भी
तो झुकना पड़ा । जिस पलटन ने फ्रांस, इंगलैण्ड, इटली और अमेरिका की
सम्मिलित शक्ति का मुकाबला किया था, जब उसी पलटन ने प्रजा के विद्रोह का
साथ दिया तो वही मशीनगन, वही तोपखाने, वही हवाई जहाज़ कैसर के काम
मे न आकर विद्रोहियों के काम मे आये । उसी प्रकार से अंग्रेजों की शक्ति चाहे
जितनी बड़ी क्यो न हो लेकिन भीतरी विप्लव के कारण जो भावना उत्पन्न होगी
उसका मुकाबला करना उनके लिए बहुत कठिन बात है । यदि अपनी तैयारी के
साथ देशी पलटन हमारा साथ दे तो अंग्रेज़ो की तमाम शक्ति और उनके मशीन-
गन इत्यादि कोई काम नहीं दे सकती । लेकिन मेरी कोई युक्ति काम नही आई ।
पंडितजी को यह विश्वाम नही हुआ कि भारतवर्ष मे सशस्त्र क्रान्ति सम्भव है ।
अन्त मे पंडितजी ने अहिंसा की नीति पर बहुत जोर दिया और कहा कि ये तो
अहिंसा नीति पर विश्वास रखते है और यही मानवता है कि महात्माजी के
दर्शाये हुए मार्ग से ही भारतवर्ष का कल्याण हो सकेगा । इस प्रकार मे बातचीत
समाप्त होते समय सम्भव है मुझमें कुछ असहिष्णुता कुछ ऊष्णता आ गई हो ।
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क्योंकि आखिर में अहिंसा नीति के बारे में पं० जवाहरलालजी से मैंने कुछ ऐसे
व्यक्तिगत प्रश्न किये थे जिसका सम्बन्ध विप्लववाद की युक्ति धारा के साथ कुछ
भी न था। लेकिन पंडितजी ने मेरे सब प्रश्नों का उत्तर बड़ी शान्ति से दिया
और मुझसे जरा भी असन्तुष्ट नहीं हुए। कारण कि मेरे प्रश्न असंलग्न न थे और
मानसिक विश्लेषण की दृष्टि से व्यक्तिगत विकास को जानने के लिए वे यथेष्ठ
संगत थे।
पंडितजी के साथ बातचीत के सिलसिले में प्रसंग-क्रम से यह भी बात छिड़
गई थी कि हमारे गुप्त आन्दोलन से प्रकाश्य आन्दोलन का क्या सम्बन्ध रहेगा।
पंडितजी कहते थे कि प्रकाश्य रूप में व्यापक जन-आन्दोलन की सृष्टि किए बिना
जन-साधारण में जागृति नहीं हो सकती है और जाग्रत जनता को छोड़कर भारत
का राष्ट्रीय आन्दोलन सफल नहीं हो सकता है। गुप्त षड्यन्त्र से जनता में कोई
जागृति नहीं उत्पन्न हो सकती है। मैंने भी बहुत अंशों में पंडितजी की यह बात
मान ली थी लेकिन मैंने यह कहा था कि प्रकाश्य जन-आन्दोलन एवं गुप्त रूप में
विप्लव के लिए षड्यन्त्र का काम भी साथ-साथ चलना चाहिए। एक को छोड़कर
दूसरा काम अपरिपूर्ण रह जाएगा। पिछले दिनों के बंगाल के राष्ट्रीय आन्दोलन
का उल्लेख करते हुए मैंने पंडितजी से कहा था कि बंगाल के मॉडरेट नेतागण भी
बहुत दबी हुई जबान से विप्लव आन्दोलन की निन्दा तो करते थे लेकिन उनके
कहने का सदा यह तात्पर्य रहता था कि प्रकाश्य आन्दोलन विफल होने पर भारत
में भीषण रूप में ऐसा खूनी विप्लव आन्दोलन प्रारम्भ हो जाएगा जिसकी तुलना
में आयरलैण्ड की अवस्था भी तुच्छ मालूम पड़ेगी अर्थात् बंगाल के मॉडरेट नेता-
गण अपना आन्दोलन इस प्रकार से चलाते थे जिससे बंगाल के विप्लव आन्दोलन
का प्रभाव ब्रिटिश सरकार के ऊपर जरा भी कम न पड़े। जन-आन्दोलन की
आवश्यकता तो अत्यन्त है इसमें कोई सन्देह नहीं। बंगाल में भी जन-आन्दोलन
यथेष्ठ उग्र एवं प्रचण्ड हो चुका था, इसीलिए उस प्रान्त में क्रान्तिकारी आन्दोलन
ने भी खूब जोर पकड़ा। युक्तप्रान्त, बिहार और मद्रास में यथेष्ठ रूप में प्रकाश्य
आन्दोलन नही हुआ इसीलिए उन प्रान्तों में क्रान्तिकारी आन्दोलन भी प्रचण्ड
नहीं हुआ। इसलिए उनसे मेरा नम्र निवेदन यह था कि भविष्य में जन-आन्दोलन
का नियन्त्रण इस प्रकार से करें जिससे विप्लव आन्दोलन को कुछ भी आघात न
पहुँचे। ये दोनों आन्दोलन एक-दूसरेके परिपूरक हों। ऐसा होना हम लोग उचित
समझते हैं। लेकिन मुझे अत्यन्त दुःख हुआ जब पंडितजी ने कहा कि ऐसा होना
भी सम्भव नहीं है। कारण महात्मा गांधी के नेतृत्व में जो जन-आन्दोलन हो रहा
है, और होगा वह एकदम अहिंसा नीति पर चलेगा और इसके साथ विप्लव
आन्दोलन की कोई सहयोगिता नहीं हो सकती है। बल्कि विप्लव आन्दोलन के
कारण अहिंसात्मक आन्दोलन को यथेष्ठ धक्का पहुँचेगा। यहाँ तक कि यदि
विप्लव आन्दोलन चलता रहे तो अहिंसात्मक सत्याग्रह आन्दोलन के लिए
वातावरण एकदम बिगड़ जाएगा। इसलिए हम लोग कभी भी नहीं चाहेंगे कि
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विप्लव आन्दोलन का काम जनता के सामने आए । मैंने अवश्य ही पंडितजी को
यह बतला दिया था कि ऐसी आशा करके आप नितान्त दुराशा कर रहे हैं।
क्योंकि विप्लवीगण अब जो ठीक समझेंगे वही करेंगे। कारण, सिद्धान्तों का जब
भेद है तो कर्म-प्रणाली में भी भेद अवश्य होता है इसे कौन रोक सकता है।
पण्डितजी ने इस पर केवल यही कहा था कि ऐसा होना नहीं चाहिए।
सब बातें समाप्त होने पर हम एक-दूसरे के प्रति यथेष्ठ प्रीति की भावना
लेकर एक-दूसरे से विदा हुए। इस घटना के बाद भी पण्डितजी से बीच-बीच में
मैं मिलता रहा। 'बन्दी जीवन' प्रथम भाग छपने पर मैंने एक प्रति पंडितजी को
उपहार दी थी। पंडितजी ने स्वयं भी इस किताब को पढ़ा था एवं दूसरों को
इसे पढ़ने को कहा था। मुझसे पण्डितजी ने कहा था कि दूसरे भाग की भाषा
कुछ और सरल होनी चाहिए। नैनी जेल मे भी पण्डितजी से बहुत बातचीत हुई
थी। जिसका वर्णन जेल-जीवन के संदर्भ में ही करने की इच्छा है।
इलाहाबाद में जो दूसरे कांग्रेस के नेता थे उन सबसे भी मैं अच्छी तरह
मिला था। उनमें से एक-दो सज्जन विप्लव आन्दोलन के प्रति यथेष्ठ सहानुभूति
रखते थे। लेकिन व्यावहारिक रूप में इनमें से किसी ने भी हमें कुछ भी सहायता
नही दी।
विप्लव आन्दोलन के सम्पर्क के प्रकाश्य नेताओं में से पडित जवाहरलालजी
को छोड़कर देशबन्धु सी० आर० दासजी से सबसे अधिक एवं गम्भीर रूप में
बातचीत हुई थी। पंजाब से लौटने के बाद किस समय मैं कलकत्ता गया था एवं
सबसे पहले मैं कब देशबन्धु सी० आर० दासजी से मिला था यह मुझे इस समय
ठीक-ठीक याद नही है। मैंने अपनी नीति यह बना ली थी कि हम प्रकाश्य आन्दो-
लन के नेताओं से अपना ऐसा सम्बन्ध स्थापित करें जिससे देश के गण्यमान्य
व्यक्ति विप्लव आन्दोलन के प्रति यथेष्ठ रूप में सहानुभूतिपूर्ण हो जाएँ और
यदि सम्भव हो सके तो उनसे अपने आयोजन के अनुसार सहायता लेने की भी
चेष्टा करें। इस नीति के कारण एवं पंजाब के गुरुद्वारा आन्दोलन के नेता से
बातचीत हो जाने के कारण देशबन्धु सी० आर० दासजी से मिलना मेरे लिए
नितान्त आवश्यक हो गया था।
बड़े लाट साहब के ऊपर आक्रमण करने से प्रकाश्य राष्ट्रीय आन्दोलन को
किसी प्रकार से आघात पहुँचेगा या नहीं यह समझ लेना मेरे लिए उचित था।
और मैं यह भी नही चाहता था कि प्रकाश्य आन्दोलन के नेतागण हमारे ऊपर
यह लांछन लगाएँ कि हमारे ही काम के कारण प्रकाश्य आन्दोलन में विघ्न
पहुँचा। मैं यह भी चाहता था कि देशबन्धु से विप्लव आन्दोलन के लिए कुछ
आर्थिक सहायता लूं। इन सब कारणों से देशबन्धु सी० आर० दासजी से मैं
मिला, एकदम एकान्त में बातचीत हुई।
देशबंधुं सी० आर० दास के साथ बंगाल के कुछ क्रान्तिकारियों का सम्बन्ध
था। लेकिन मेरे साथ उनका कोई सम्बन्ध नहीं था। श्री सुभाषचन्द्र बोस की एक
278 / बन्दी जीवन
किताब से यह पता चला है कि देशबन्धु के उद्योग से सितम्बर सन् 1921 में
महात्माजी से बंगाल के कुछ क्रान्तिकारियों की बातचीत हुई थी । इस बातचीत
में देशबन्धु दास भी उपस्थित थे । महात्माजी से बातचीत होने के बाद इन
क्रान्तिकारियों ने महात्माजी को यह वचन दिया था कि महात्माजी के कार्यक्रम
में वे लोग बाधा तो देंगे ही नहीं बल्कि कांग्रेस आन्दोलन में योगदान देकर उनके
कार्यक्रम को सफल बनाने की वे भरसक कोशिश करेंगे । जहाँ तक मुझे मालूम
है इन क्रान्तिकारियों में ढाका अनुशीलन समिति के कोई व्यक्ति नहीं थे और
सम्भव है कलकत्ता के दूसरे दलों के व्यक्तियों ने मुझे भी ढाका समिति का
आदमी समझकर मेरे साथ कोई सलाह नहीं की थी । मैं इस समय जमशेदपुर के
मजदूर आन्दोलन में काम कर रहा था । ढाका अनुशीलन समिति कांग्रेस आन्दो-
लन के विरुद्ध श्री सी० आर० दास के विरोधी दल के प्रमुख आदमियों की सहायता
लेकर सत्याग्रह आन्दोलन का विरोध करती थी। बंगाल के दूसरे दलों के व्यक्तियों
से मुझे यह संवाद मिला था । यह बात मैं पहले ही बता चुका हूँ ।
पंजाब से लौटकर मैंने भी देशबन्धु दास के साथ सम्बन्ध स्थापित करने का
निश्चय कर लिया । देशबन्धु दास से मेरा परिचय पहले ही हो चुका था ।
अण्डमन में रहते ही मैं अपने भाइयों के पास जो चिट्ठी भेजा करता था उसके
अनुसार मेरे भाई देश के सर्वमान्य नेताओं के पास राजनीतिक कैदियों को छुड़ाने
के लिए आवेदन-निवेदन पत्रादि भेजा करते थे । उस समय के राजनीतिक नेताओं
में से केवल सी० आर० दास एवं अखिलचन्द्र नियोगी ने उन आवेदन-निवेदनों के
उत्तर दिए थे । इस बात से भी देशबन्धु का महत्त्व व्यक्त होता है । इसके बाद
नागपुर कांग्रेस में सी० आर० दासजी के साथ मेरा साक्षात परिचय हुआ । कुछ
थोड़े आदमियो ने नागपुर मे देशबन्धु को यह आश्वासन दिलाया था कि यदि आप
वकालत छोड़कर राजनीतिक क्षेत्र में अवतीर्ण हो तो हवा ऐसी पलटेगी जिसकी
तुलना मिलनी मुश्किल है । इन थोडे आदमियों में मैं भी एक था । श्री सी०
आर० दास को यह भरोसा नही था कि उनके राष्ट्रीय क्षेत्र में पूर्णरूप से अवतीर्ण
होने पर भी बंगाली जनता ठीक प्रकार से उनके आह्वान का प्रत्युत्तर दे सकेगी ।
स्कूल, कालेज के लड़के भी सत्याग्रह आन्दोलन में यथार्थ रूप में भाग लेंगे या
नही, स्कूल-कालेज छोड़ेंगे या नही इसमें सी० आर० दासजी को काफ़ी संदेह
था । जिन व्यक्तियों ने सी० आर० दासजी से यह कहा था कि आपके वकालत
छोड़ने पर बंगाल के छात्रवृन्द अवश्य ही स्कूल-कालेज छोड़ देंगे उनमें बंगाल के
एक वकील श्री गिरजाप्रसन्न साम्याल और मैं थे । नागपुर कांग्रेस के अधिवेशन
के समय विषय समिति की बैठक में भी मैंने सी० आर० दास के पक्ष में दो-चार
बातें कही थीं । उस समय दासजी के साथ महात्माजी की तनातनी चल रही थी ।
इसलिए जो व्यक्ति दास के पक्ष में कुछ कहता था उसके प्रति उनकी दृष्टि
आकृष्ट होती थी । फिर खुले अधिवेशन में राजनीतिक बन्दियों के सिलसिले में
ही एक बंगाली था जो सर्वप्रथम हिन्दी में सफलतापूर्वक बोला था । बाद को
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मैंने सुना कि बंगाल कांग्रेस के लेबर-विभाग में मुझे लेने के लिए सी० आर०
दासजी ने इच्छा प्रकट की थी। इन सब बातों के अतिरिक्त और भी एक बड़ी
बात यह थी कि सी० आर० दास के सम्पादन में 'नारायण' नाम से जो मासिक
पत्र निकलता था उसमे 'बन्दी जीवन' नाम का मेरा लेख प्रकाशित होता था। इस
लेख के प्रति भी सी० आर० दासजी की दृष्टि प्रबल रूप में आकृष्ट हुई थी ऐसा
मैंने सुना है। श्री हेमन्तकुमार सरकार उस समय देशबन्धु के अन्तरंग कार्यकर्ताओं
में से थे। इन्ही की जबानी मैंने ये सब बातें सुनी थी। नागपुर काग्रेस के बाद
देशबन्धु दास ने कुछ कार्यकर्ताओं को अपने यहाँ दावत दी थी। उस दावत में मै
भी निमन्त्रित था। मुझे नितान्त दुःख है कि उस समय वर्दवान जिले के कालना
नामक स्थान में मैं ईंट के कारोबार मे बुरी तरह फँस गया था। इसलिए
ऐसे सुनहले अवसर पर मैं देशबन्धु के साथ मिलकर काम करके अपने कर्मजीवन
को सार्थक नही कर पाया। इन सब कारणों से देशबन्धु दास से मेरा यथेष्ठ
परिचय हो चुका था। इसलिए जब मैंने देशबन्धु से एकान्त मे बातचीत करने के
लिए कुछ समय चाहा तो दासजी ने सहर्ष मुझे इसके लिए समय दिया।
मेरे साथ देशबन्धु सी० आर० दास जी की बातचीत दो-तीन बार हुई थी।
जहाँ तक मुझे स्मरण है मैने उनसे जो पहली बार बातचीत की थी वह सबसे
महत्त्वपूर्ण थी और उसी बातचीत मे मैंने पजाब के बारे में भी बातचीत की थी।
जब निर्दिष्ट समय पर दासजी के मकान पर आया तो वे विशेष स्नेह के साथ
मुझे एक निर्जन कमरे मे ले गए। सबसे पहले मैंने उन्हें बताया कि उनके साथ
जिनका मतभेद भी है उन्हें भी वे उदारता के साथ सहायता देते हैं यह बात सर्व-
विदित है। अतः मैं भी आपके पास कुछ सहायता पाने की इच्छा से आया हूँ।
सम्भव है वे मेरे आदर्श से सहमत न हो तथापि मैंने यह हिम्मत की कि उनमे
सहायता की प्रार्थना करूँ। फिर मैंने दासजी को अपना गुप्त गयक्रम बताया।
फिर पंजाब के अकाली नेता के बारे मे बातचीत की और कहा कि यदि वे समझें
कि बड़े लाट साहब के ऊपर आक्रमण करने पर प्रकाश्य आन्दोलन को धक्का नही
पहुँचेगा और यदि इस बात पर उनको कोई आपत्ति न हो तो हम लोग वाइसराय
पर आक्रमण करना चाहते हैं। और यदि वे समझे कि ऐसा करने से उनके
आन्दोलन मे विघ्न पैदा होगा तो हम लोग ऐसा काम नही करेगे। यदि हम लोग
यह काम करते है और यदि हमारा आदमी पंजाबियों और विशेष करके सिक्खों
के साथ सहानुभूति प्रकट करने के लिए पंजाब में जाकर आत्मबलिदान करता है
तो इस प्रकार से हम सिक्खों के हृदय पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। वाइसराय
पर आक्रमण करने के परिणामतः जब हमारा आदमी अदालत के सामने कटघरे
के अन्दर खडे होकर वीरत्व व्यंजक शब्दो मे पंजाबियो के प्रति सहानुभूति
दिखलाते हुए यह कहेगा कि राष्ट्र की समस्त शक्ति से तुम वाइसराय हमारे
राष्ट्रीय आन्दोलन को बलपूर्वक कुचलना चाहते हो तो हमारा भी कर्तव्य हो जाना
है कि हम भी दिखला दें कि बलपूर्वक किसी राष्ट्रीय आन्दोलन को कुचला नही
280 / बन्दी जीवन
जा सकता। अंग्रेज ! तुम यदि समझते हो कि अकालियों के पीछे दूसरे भारतवासी
नहीं हैं तो तुम अत्यन्त भ्रम में हो । इस भ्रम को दूर करने के लिए ही मैंने अपने
प्राणों की बाजी लगाकर यह प्रमाणित करना चाहा कि भारतवर्ष में अकाली
अकेले नहीं हैं। श्री सी० आर० दासजी सब बातें सुनकर गम्भीर हो गए और
बाद में कहा, 'आज का दिन और रात मुझे समय दो। कल फिर मेरे साथ मिलो ।
सब बातें समझ-बूझकर कल मैं अपनी राय दूंगा।'
वायसराय के प्रश्न को छोड़कर सिक्ख नेताओं ने एक और बात मुझे बताइ
थी । इसे भी मैंने श्री सी० आर० दासजी के सामने रख दिया था । सिक्खों ने
मुझ से कहा था कि अंग्रेज की नीति यह हो रही है कि काश्मीर को किसी-न-किसी
बहाने से ब्रिटिश इण्डिया से अन्तर्भुक्त कर लिया जाय और काश्मीर को अंग्रेजों
की एक कालोनी के रूप में परिणत कर दिया जाय । अंग्रेज चाहते थे कि काश्मीर
में अधिक-से-अधिक संख्या में अंग्रेजी पल्टन रखी जाय। इसके विरुद्ध किस प्रकार
से आन्दोलन खड़ा किया जाय यह भी सिक्ख नेतागण जानना चाहते थे । मैंने
सिक्ख नेताओं से कह दिया था कि देशबन्धु सी० आर० दासजी से परामर्श किये
बिना मैं कोई काम नहीं करूँगा । वे भी यह चाहते थे कि काश्मीर का प्रश्न सी०
आर० दास के कानों तक पहुँच जाय ।
सी० आर० दासजी ने काश्मीर के प्रश्न को विशेष महत्त्व नही दिया और
इसके बारे में मुझसे कुछ कहा था या नहीं मुझे आज याद नहीं है । दूसरे दिन
नियत समय पर मैं सी० आर० दासजी के मकान पर बहुत उत्सुकता के साथ
पहुँचा । सी० आर० दासजी ने कहा 'तमाम रात मुझे नींद नही आई, तुम्हारे प्रश्न
को लेकर बहुत गम्भीरता के साथ मैने दिन और रात सोचा । लेकिन अन्त में मैं
इसी परिणाम पर पहुँचा हूँ कि अभी वायसराय के ऊपर कोई आक्रमण होना
उचित नही है । तथापि यदि मैं गिरफ्तार हो गया तो मेरी गिरफ्तारी के बाद
तुम लोग इस काम को कर सकते हो ।' मैं सब बातें समझ गया । और क्या
कहता ? लेकिन फिर भी राजनीतिक क्षेत्र में यदि काम करना है तो हरएक प्रकार
के व्यक्ति से जितना लाभ हो सके उठाना चाहिए । फिर एक तो मैं सी० आर०
दासजी से सहायता पाने की आशा कर रहा था और दूसरी बात यह थी कि अभी
हमारा संगठन थोड़े दिन का था, इसलिए मैं नही चाहता था कि अभी हम लोग
ऐसा कोई काम करें जिससे सरकार की तमाम शक्ति हमे मिटाने मे लग जाय ।
इन सब कारणों से मैंने पंजाब के नेताओं को अपनी परिस्थिति समझा दी ।
परिस्थिति के सामने उन्हें भी झुकना पड़ा ।
एक बात मुझे ठीक से याद नही है कि देशबन्धुदासजी से मैंने सहायता के
लिए जो प्रार्थना की थी वह पंजाब की बातों की आलोचना करते समय की थी
अथवा उसके बाद, मैं ठीक से नही कह सकता । जहाँ तक मुझे याद है मैं समझता
हूँ अनुशीलन समिति के साथ मेरा कोई समझौता होने के पहले ही मैंने सी०आर०
दास जी से ये सब बातें की थीं । सहायता देने के बारे में दासजी ने मुझसे कहा
श्री मोतीलालजी जवाहरलालजी तथा सी० आर० दास से भेंट / 281
था कि ऐसा कोई सिलसिला निकालो जिसके जरिए मैं तुम्हें सहायता दे सकूं ।
फिर थोड़ा सोचकर उन्होंने कहा कि बड़ा बाजार की तरफ़ यदि तुम्हारा कोई
प्रभावशाली आदमी हो तो उसे मैं मासिक वेतन के रूप में कुछ दिया करूंगा । वह
व्यक्ति प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी की तरफ से बड़ा बाजार में कांग्रेस का कार्य करेगा ।
बड़ा बाजार में तुम्हारा कोई आदमी है। दासजी जानते थे कि मेरा कार्य-क्षेत्र
युक्त प्रान्त है। सम्भव है इसीलिए वे चाहते थे कि मेरा कोई परिचित व्यक्ति
बड़ा बाजार में कांग्रेस का काम करे। बड़ा बाजार में जो लोग कांग्रेस का कार्य
कर रहे थे उनमें से अधिकांश व्यक्ति महारमाजी के कट्टर अनुयायी थे । इसलिए
संभव है दासजी यह चाहते थे कि मेरी सहायता से उन्हें बड़ा बाजार में कोई
आदमी मिल जाय । दासजी बड़ा बाजार में एक प्रभावशाली व्यक्ति चाहते थे।
मैंने ऐसे व्यक्ति का परिचय दिया। सी० आर० दासजी ने इस प्रकार से मुझे
तीन सौ रुपया मासिक देने का वचन दिया था। लेकिन दुर्भाग्य से गया कांग्रेस के
बाद मैंने एक परचे में सी० आर० दासजी का कुछ विरोध किया था। गया कांग्रेस
के सभापति के पद से देशबन्धु दासजी ने विप्लव आन्दोलन की चर्चा करते हुए
विप्लव नीति के विपक्ष में कुछ कहा था। उसी सिलसिले में दासजी ने यह भी
कहा था 'विप्लव आन्दोलन कभी भी सफल नहीं हो सकता । यदि मुझे विश्वास
होता कि विप्लव आन्दोलन सफल होगा तो मैं भी सशस्त्र क्रान्तिकारी आन्दोलन
में अवश्य भाग लेता । मुझे बिल्कुल विश्वास नहीं है कि विप्लव आन्दोलन सफल
हो सकता है। इसलिए मैं विप्लव आन्दोलन में योगदान नहीं करता।' मैंने अपने
पर्चे में यह लिखा था कि जिस दिन लोग यह समझने लगेंगे कि विप्लव आन्दोलन
सफल होने जा रहा है उस दिन हमें यह परवाह नहीं रहेगी कि सी० आर० दास
जी हमारे साथ आते हैं या नहीं। राजनीतिक होने का अर्थ तो यह है कि सफलता
की आशा दिखाई देने के पहले ही वह जान जाय कि वह आन्दोलन आगे चलकर
सफल होगा या नहीं । यह लिखते समय मैंने इस बात पर ध्यान रखा था कि जहाँ
तक सिद्धान्त का सम्बन्ध है वहाँ कोई भी किसी से भी समझौता नहीं कर सकता ।
अपने सिद्धान्तों को स्पष्ट करने के लिए एवं उसके प्रचार के लिए बड़े-बड़े नेताओं
का भी विरोध करना हमारा परम कर्त्तव्य है। लेकिन कार्य-क्षेत्र में हम सबके साथ
मिलकर काम कर सकते हैं। केवल सिद्धान्त के बारे में हम किसी से भी कोई
समझौता नहीं करेंगे, यह हमारा प्रण था । इसलिए देशबन्धु सी० आर० दासजी
ने कांग्रेस के सभापति के आसन से विप्लव आन्दोलन पर जब कटाक्ष किया तब
हमारा भी कर्त्तव्य हो गया कि हम उसका उत्तर दें। लेकिन इस उत्तर से दास
जी मेरे ऊपर अत्यन्त असन्तुष्ट हो गए थे । यहाँ तक कि जब मैंने फिर उनसे
मिलना चाहा तो उन्होंने मेरे साथ मिलने से भी इन्कार कर दिया ।
मुझे ऐसा जान पड़ता है कि देशबन्धुजी के साथ मेरा यह बिगाड़ उस समय
की घटना है कि जब मैं युक्तप्रान्त को छोड़कर फरार हालत में कलकत्ता में
आकर रहने लग गया था। बड़े लाट साहब के ऊपर, आक्रमण करने की बात
282 / बन्दी जीवन
पर देशबन्धुदासजी से परामर्श किया था उस समय मैं कलकत्ता फरार हालत में
नहीं आया था। परिपक्व बुद्धि न रहने के कारण एवं दुनियादारी की बातों से
एकदम अपरिचित रहने के कारण मैंने देशबन्धुदास को अपना विरोधी बना लिया
था। मेरी गिरफ्तारी के बाद बंगाल प्रान्तीय राजनीतिक कांफ्रेंस के अवसर पर
विचारालय से दण्ड प्राप्त न होने पर भी जो सैकड़ों युवकों को जेलों में बन्द कर
दिया गया था उस सम्बन्ध में जो आलोचना हुई थी उस समय देशबन्धु दासजी
ने खुले जलसे में यह कहा था कि नज़रबन्द राजबन्दियों में सभी व्यक्ति निर्दोष
नहीं हैं इसलिए सब नज़रबन्दों की मुक्ति के लिए प्रयत्न करना युक्ति-संगत एवं
न्याय-संगत नहीं होगा। प्रान्तीय कांफ्रेंस में देशबन्धु दासजी की इन बातों का
प्रचंड विरोध हुआ था। विरोध होने पर भी देशबन्धु दासजी ने स्पष्ट शब्दों में
कांफ्रेंस के सामने यह प्रश्न रखा था कि क्या आप लोग कहना चाहते हैं कि शचीन्द्र-
नाथ सान्याल निर्दोष व्यक्ति हैं। इस बात पर कांफ्रेंस में घोर वाद-विवाद हुआ
था एवं देशबन्धुदासजी से यह कहा गया था कि यदि श्री सान्याल निर्दोष व्यक्ति
नहीं हैं तो खुले इजलास में उनका विचार क्यों नही होता। सम्भव है कि सरकार
के खुफिया विभाग से आपको कुछ खबर मिली हो। लेकिन कांफ्रेंस के सामने ऐसी
कोई बात नही है जिससे हम शचीन्द्रबाबू के विरुद्ध खुले सम्मेलन में आपकी तरह
कुछ कहें। खुले सम्मेलन मे सभी पार्टियों के व्यक्तियों ने मेरे पक्ष मे सी० आर०
दास जी के विरुद्ध आवाजें उठाईं थी। हमारे देश के गण्यमान्य नेताओं की मनो-
वृत्ति का परिचय इन सब बातों से खूब मिल सकता है। क्रान्तिकारी आन्दोलन
प्रधान रूप में गुप्त रीति से ही चल रहा था। इस आन्दोलन के विरुद्ध प्रकाश्य
रूप में कटूक्ति करना बहुत आसान बात थी। कारण कि इन कटूक्तियों का उत्तर
देना सब समय क्रान्तिकारियों के लिए आसान नही होता था क्योकि उन्हे तो
गुप्त रीति से ही काम करना पड़ता था। हमारे देश के प्रायः सभी गण्यमान्य
नेताओं ने इस आन्दोलन के प्रति अनेकों बार अनेकों प्रकार से कटूक्ति की है।
यदि किसी ने इन सब कटूक्तियों के विरुद्ध कुछ कहने का साहस किया तो हमारे
देश के गण्यमान्य लब्ध-प्रतिष्ठित नेता गणों ने उसकी खबर लेने की खूब चेष्टा की
है। लेकिन इसमे एक विशेष अपवाद अवश्य है वह है महात्मा गांधी। महात्मा
गांधी ने भी बेलगांव कांग्रेस मे क्रान्तिकारियो के प्रति भीषण कटूक्ति की थी।
लेकिन जब मैंने उन कटूक्तियों का प्रत्युत्तर महात्माजी के पास भेजा तो महात्माजी
ने विशेष उदारता एवं न्याय निष्ठा के साथ मेरे प्रत्युत्तर को ज्यों-का-त्यों 12
फरवरी सन् 1925 के 'यंग इंडिया' में छाप दिया था और बाद को उन्होंने अपने
मन्तव्य को भी उसी प्रत्युत्तर के अन्त मे छाप दिया था। इसके लिए आज भी
मेरा हृदय महात्माजी के श्री चरणों का स्पर्श करता है।
एक दफे की बात है, किसी काम से मैं कलकत्ता आया था। श्री सी० आर०
दासजी से मेरी खूब बहस हुई थी। दास और मुझे छोड़कर उस कमरे में एक
व्यक्ति और थे। ये सज्जन बंगाल के प्रसिद्ध नेता श्री अश्विनीकुमार दत्त के भाई
श्री मोतीलालजी, जवाहरलालजी तथा श्री सी० आर० दास से भेंट / 283
अथवा भतीजे थे । सब बातें आज याद नहीं हैं लेकिन इतना याद है कि देशबन्धु
अत्यन्त उत्तेजित होकर तीव्र स्वर से भर्त्सना व्यंजक शब्दों में मेरे प्रत्येक प्रश्न
का उत्तर दे रहे थे । उत्तेजित होने से युक्ति स्थिर नहीं रहती है । अन्त में उस
तीसरे सज्जन से रहा नहीं गया । मेरे पक्ष को लेकर उन्होंने भी श्री सी० आर०
दासजी से बहस की । मुझे इस समय अपना एक प्रत्युत्तर याद है । दासजी अहिंसा
नीति के पक्ष में तीव्र रूप से वाद-विवाद कर रहे थे और उन्होंने अन्त में यह कहा
था कि पाशविक बल से आत्मिक बल कहीं अधिक प्रबल है । तुम लोग शारीरिक
बल पर अत्यधिक ध्यान दे रहे हो आत्मिक बल पर नहीं । इस पर मैंने यह उत्तर
दिया था कि "आप हम लोगों को गलत समझ रहे हैं । आप समझते हैं कि पिस्तौल
या बन्दूक का चलाना एक पाशविक बल मात्र है । आप भूल जाते हैं कि ट्रीगर
(Triger) का खींचना पाशविक बल से नहीं होता है । ट्रीगर को खींचने के पीछे
कुछ कम आत्मिक बल की आवश्यकता नहीं होती । एक पहलवान भी तो ट्रीगर
खींच सकता है लेकिन पहलवान होने से ही वह क्रान्तिकारी आन्दोलन में भाग
लेगा ऐसी बात नहीं है । आत्मिक बल रहे बिना क्या कोई व्यक्ति क्रांतिकारी
आन्दोलन मे सम्मिलित हो सकता है । एक तरुण वयस्क युवक पहलवान की अपेक्षा
कही कम शारीरिक बल रखता है लेकिन विप्लवकार्य में यह तरुण युवक महज ही
मे ट्रीगर खींच सकेगा लेकिन पहलवान वह ट्रीगर नही खींच सकता । ट्रीगर
खींचने को आप पाशविक बल क्यों समझ रहे हैं ।"
इसी प्रकार से एक और बात मुझे अब भी खूब याद है । यह बात सहायता
पाने के सिलसिले में ही हुई थी । किस नीति के अनुसार क्रान्तिकारी आन्दोलन
सफल होगा उसके बारे मे बातचीत हो रही थी । जब सब प्रश्नों का उत्तर मैंने
सफलता पूर्वक दे दिया तो अन्त में दास जी ने यह प्रश्न किया कि "अच्छा मान लो
और सब बात ठीक है, लेकिन आम जनता को किस प्रकार से तुम लोग अपने
साथ लोगे ? तुम लोगों के कार्यक्रम में जनता का साथ लेने का कोई विधान नही
है । जनता को साथ लिये बिना कोई भी क्रान्तिकारी आन्दोलन सफल नही हो
सकता ।" मैंने इसके उत्तर मे कहा था, "आम जनता को साथ लेना हम लोग अधिक
कठिन बात नही समझते है । इस बात को ले लीजिए, कलकत्ता के आसपास दस-
पन्द्रह मील के अन्दर जितने कारखाने है उनमें कम-से-कम दस-ग्यारह लाख
मजदूर काम करते होगे । तीन-चार महीने के परिश्रम से इन कारखानों मे हड़ताल
करा देना विशेष कठिन बात नही है । इतनी बडी हड़ताल के अवसर पर
मिलिटरी, पुलिस और पलटन कारखानों की रक्षा के लिए अवश्य आ जाएगी ।
ऐसे मोकों पर मजदूरों को भडका देना कोई कठिन बात नही है । ऐसी परिस्थिति
में यदि हमारे पास फ़ौजी शिक्षा प्राप्त किये हुए उपयुक्त व्यक्ति आवश्यक संख्या में
हों और अपने प्रयोजन के अनुसार उपयुक्त संख्या में अस्त्र-शस्त्र भी हो तो क्या,
क्रान्ति का प्रारम्भ करना कुछ कठिन बात है । ऐसी अवस्था में क्या जनना हमारा
साथ नही देगी ?" मुझे याद है दासजी इसका कोई उत्तर नही दे पाए थे ।
284 / बन्दी जीवन
इस प्रसंग में एक बात और बता देना अप्रासंगिक न होगा। मेरे साथ बात-
चीत करने के परिणामतः देशबन्धुदास इतने प्रबल रूप से प्रभावान्वित हुए थे कि
उन्हीं दिनों में एक प्रकाश्य सभा में उन्होंने अंग्रेज सरकार को चेतावनी देकर
कहा था कि यदि सरकार समझती है कि क्रान्तिकारी आन्दोलन दब गया है तो
वह भारी भूल में पड़ी हुई है, यह आन्दोलन इतना व्यापक एवं गंभीर रूप धारण
किये हुए है कि यदि सरकार जनमत की अवहेलना करेगी तो उसे बुरी तरह
पछताना पड़ेगा।
इस वक्तृता के बाद बंगाल सरकार की तरफ से खुफिया विभाग के एक
पुलिस सुपरिटेंडेंट श्री भूपेन्द्र चटर्जी को श्री देशबन्धु के पास भेजा गया था। सर-
कार जानना चाहती थी कि दासजी के उस वक्तव्य का आधार क्या है। भूपेन्द्र
चटर्जी बहुत देर तक सी० आर० दासजी को प्रश्न पूछ-पूछकर परेशान करते रहे।
सरकार जानना चाहती थी कि क्या वर्तमान परिस्थिति वैसी नाजुक है जैसी
कि सन् 1915-16 में हुई थी।
भूपेन्द्र चटर्जी के मिलने के बाद मैं फिर सी० आर० दासजी से मिला था
और उन्ही की जबानी ये सब बातें सुनी थी। कलकत्ता शहर-भर मे यह बात
फैल गई थी कि बंगाल सरकार सी० आर० दासजी की बातों से विचलित हो
गई थी।
जिस समय दासजी ने ऐसी वक्तृता दी थी उस समय ढाका समिति के साथ
मेरा समझौता हो चुका था। मैं सी० आर० दासजी के साथ जो सम्बन्ध स्थापित
करना चाहता था ढाका अनुशीलन समिति के नेतागण उसे पसन्द नहीं करते थे।
उनका कहना था कि दासजी के वक्तव्य से सरकार और चौकन्नी हो जाएगी
इससे हमारे कार्य में बहुत बाधा पहुँचेगी और लाभ कुछ न होगा। मैं इनकी बातो
से सहमत न था। मैं कहता था कि इससे क्रान्तिकारी आन्दोलन भी प्रबल होता
जा रहा है और इससे हमारे आन्दोलन को लाभ होगा। इस प्रकार से राष्ट्रीय
आन्दोलन के ऊपर क्रान्तिकारी आन्दोलन की एक गहरी छाप पड़ रही है।
लेकिन ढाका समिति के नेताओं ने मेरे दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया।
11
उत्तर भारत में दल का विस्तार
मुझे युक्तप्रान्त एवं पंजाब का बार-बार दौरा करना पड़ा और जब मैंने
समझ लिया कि उन प्रदेशों का काम अन्य व्यक्तियों पर छोड़कर दूसरी जगह
जाया जा सकता है तब मैं अपने बाल-बच्चों को साथ लेकर फरार हालत में
कलकत्ता चला आया। लेकिन इसके पहले पंजाब में और विशेष रूप से युक्तप्रान्त
में क्रान्ति का कार्य बहुत कुछ आगे बढ़ा था। यहाँ अपने साध्य के अनुसार उसका
परिचय देने की मैं चेष्टा करता हूँ।
सन् 1923 के प्रारम्भ में युक्तप्रान्त एवं पंजाब में मैंने कम-से-कम बीस या
पच्चीस विप्लव केन्द्र स्थापित कर लिए थे। सन् 1923 में मैंने दिल्ली में कांग्रेस
के विशेष अधिवेशन में भाग लिया था। उस समय तक ढाका अनुशीलन समिति के
साथ मेरा कोई सम्बन्ध नही था। देहली में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन के बाद
ही मैंने अपने संगठन का नाम 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' रख दिया था
और इस नामकरण के अवसर पर ही अपने संगठन का लक्ष्य एवं साधन इत्यादि
को लेते हुए एक परिपूर्ण नियमावली बनाई थी। इस प्रकार पौर्वापर्य निर्णय करने
के लिए मेरे पास कुछ साधन मौजूद हैं
जब मैं जमशेदपुर मे श्रमजीवियों के आन्दोलन में काम कर रहा था उसी
समय मैं क्रान्तिकारी आन्दोलन के लिए धन मिलने की व्यवस्था भी कर रहा था।
मेरे परम सौभाग्य से एक महानुभाव धनी व्यक्ति ने मुझे मासिक एक सौ पचास
रुपए देने का वचन दिया था। मेरी गिरफ्तारी के बाद भी ये महानुभाव नियम-
पूर्वक प्रति मास एक सौ पचास रुपए देते गए। इन्ही रुपयो से हम लोगों का रेल
खर्च इत्यादि निकल आता था। ढाका अनुशीलन समिति के साथ सम्बन्ध स्थापित
होने के पहले तक युक्तप्रान्त या पंजाब में हम लोगों ने कभी कोई डकैती नही
की। जो सज्जन हमे प्रतिमास एक सौ-पचास रुपए देते थे उन्होंने कभी भी हम
लोगों से इसका कोई हिसाब नही माँगा। विश्वास के ऊपर हम लोगों का काम
चलता था। इस प्रकार से और कुछ आदमी भी थोड़ी रकमों से हम लोगों की
सहायता करते थे। एक दफे मैं मेरठ के वैश्य अनाथालय में श्री विष्णुशरणजी
दुबलिस के यहाँ ठहरा था। विष्णुशरणजी उस समय वैश्य अनाथालय के अध्यक्ष
थे। एक दिन अनाथालय में अलीगढ़ के प्रसिद्ध व्यक्ति ठाकुर टोडरसिंहजी आए।
286 / बन्दी जीवन
मैं एक पेड़ के नीचे चारपाई पर बैठा हुआ था। चारपाई पर बन्दी जीवन की दो-
एक प्रतियाँ पड़ी थीं। ठाकुर साहब मुझे पहचानते नहीं थे। टोडरसिंहजी बन्दी-
जीवन की एक प्रति को उठाकर लेखक के प्रति बहुत प्रशंसासूचक शब्द कहने लग
गए। इसके पहले दुबलिसजी ने मुझे बताया था कि ठाकुर टोडरसिंहजी एक धनी
जमींदार हैं, अच्छे व्यक्ति हैं। लेकिन यह भी कह दिया था कि अपना परिचय इन्हें
अभी न देना। दुबलिसजी समझते थे कि सम्भव है टोडरसिंहजी क्रान्तिकारी
आन्दोलन के प्रति सहानुभूति न प्रकट करे। दुबलिसजी किसी काम से घर के
अन्दर गए थे। बाहर चारपाई पर बैठे-बैठे टोडरसिंहजी से मेरी बातचीत होने
लगी। बातचीत के प्रसंग में मेरा परिचय पूछने पर टोडरसिंहजी को मैंने अपना
परिचय दे दिया। मैंने समझ लिया था कि टोडरसिंहजी से सहायता लेनी
असम्भव बात नहीं थी। लेकिन दुबलिसजी ने मेरा इस प्रकार से परिचय देना
पसन्द नहीं किया और बाद को यह कहकर मेरी खूब हँसी उड़ाई कि ज्योंही टोडर-
सिंहजी ने कहा कि बन्दी जीवन के लेखक को यदि मैं सामने पाता तो उनका पैर
छूता त्योंही सान्यालजी लपककर कह उठे कि मैं ही लेखक हूँ। आज भी दुबलिसजी
इस बात पर चुटकी लेते हैं यद्यपि यह बात सच नहीं है कि मैंने एकदम से
अपना परिचय टोडरसिंहजी को दे दिया था। टोडरसिंहजी से बात करते समय
मैंने यह अनुभव किया था कि ठाकुरसाहब पर प्रभाव डालने से कुछ काम निकल
सकता है। इसी गरज से उनके पूछने पर मैंने अपना परिचय दे दिया। परिणामतः
टोडरसिंहजी मुझे अपने स्थान पर ले गए। उन्होंने मुझे प्रेम से भोजन कराया,
और अन्त में मेरे एक आदमी को चालीस रुपया मासिक वेतन पर अपने यहाँ के
एक स्कूल में शिक्षक रखने के लिए वे राजी हो गए। टोडरसिंहजी क्रान्तिकारी
आन्दोलन के विशेष पक्षपाती नहीं थे तथापि इस प्रकार से उन्होंने हम लोगों को
चालीस रुपए मासिक देना स्वीकार किया था। टोडरसिंहजी महात्माजी के अनु-
रक्त अनुयायियों में से थे तथापि उनसे हम लोग यह सहायता लेने में समर्थ हुए
थे। लेकिन दुर्भाग्यवश जिस व्यक्ति को मैंने टोडरसिंहजी के स्कूल में भेजा था
वह व्यक्ति हम लोगों के काम के उपयुक्त न था। दो महीनों के बाद वह व्यक्ति
विप्लव कार्य से अलग हो गया। इसी व्यक्ति ने बनारस में मेरे विवाह के अवसर
पर मुझे चुभती हुई बातें सुनाई थीं। गनीमत यह थी कि सरल रूप से एक पत्र
द्वारा मुझे उन्होंने यह सूचना दी कि विप्लव कार्य से अब मैं अलग हो रहा हूँ
क्योंकि इस काम के लिए मैं अपने को उपयुक्त नहीं समझ रहा हूँ। यह घटना
सितम्बर सन् 1923 के पहले हुई। टोडरसिंहजी से हम लोगों ने और कोई विशेष
सहायता नहीं पाई।
मेरठ की एक और घटना विशेष उल्लेख योग्य है। यह घटना भी ढाका अनु-
शीलन समिति के साथ सम्बन्ध स्थापित होने के पहले ही हुई थी। मेरठ होकर मैं
लाहौर जानेवाला था। मेरे मनीबेग में पाँच सौ रुपए के नोट और कुछ रेज़गारी
थे। मेरठ स्टेशन से मनीबेग से दो दस-दस रुपए के नोट निकाले। मनीबेग को
उत्तर भारत में दल का विस्तार / 287
फिर कोट के ऊपरी जेब में रख दिया। टिकट लेने गया। उस समय खिड़की के
सामने दो ही चार आदमी थे लेकिन फिर भी उन दो-चार आदमियों में ही जाते
समय कुछ धक्कम-धक्का हुआ। उस समय मैं समझ नहीं पाया कि धक्कम-धक्का
करना गिरहकटों की एक तरकीब है। बाद को जेल में इस तरकीब का पता
चला था। एक आदमी यदि किसी को धक्का देता है तो स्वभावतः ही धक्का खाने
वाला धक्का देने वाले की तरफ देखता है। थोड़ी देर के लिए उसका पूर्ण ध्यान
धक्का देने वाले के प्रति आकृष्ट रहता है। इसी अवसर पर गिरहकट अपनी
कारीगरी दिखला देते हैं। उस ज़रा-सा ही धक्कम धक्के के बाद जब मैंने खिड़की
के सामने आकर लाहौर का टिकट माँगा तो टिकट बाबू ने कहा कि गाड़ी आने
में अभी देर है टिकट अभी नहीं बटेगा। जब मैंने खिड़की से बाहर आकर नोट
अपने मनीबेग में रखना चाहा तो देखा मनीबेग गायब है। मेरे होश-हवास
बिलकुल उड़ गए। किंकर्तव्यविमूढ की तरह रह गया, क्या कहूँ और क्या न
कहूँ कुछ समझ में नहीं आया। अवश्य मेरे मुँह से यह निकला होगा कि अरे
मनीबेग गायब है क्योंकि किसी ने मुझसे कहा कि जाओ पुलिस में इत्तला दे दो।
इत्तला भी देता तो पुलिस को अपना नाम-धाम क्या बताता। यदि मैं अपना असल
नाम बताता हूँ और यह कहता हूँ कि मेरठ में आकर वैश्य अनाथालय में मैं
ठहरा था तो भविष्य में आवश्यकता पड़ने पर पुलिस को इस बात का प्रमाण मिल
जाता कि दुबलिसजी के साथ मेरा सम्बन्ध है। लेकिन फिर भी मैं रेलवे थाने में
गया एक पुलिस का हेडकानस्टेबुल दौड़कर मेरे साथ टिकट बाँटने के जंगले के
सामने आया। वहीं के लोगों से कुछ पूछताछ की कि कौन टाँगावाला यहाँ था
कौन गया है, उसका कोई जान-पहचान का आदमी उस समय उस स्थान पर था
या नहीं इत्यादि बातों को जानकर फिर हम लोग रेलवे थाने में वापस आए।
मुझसे पूछा गया कि मेरठ में मैं कहाँ ठहरा था। मैंने बता दिया कि वैश्य यतीम-
खाने में ठहरा था। पुलिसवालों ने मुझसे पूछा कि रिपोर्ट लिखूँ या नहीं। मैंने
बताया कि झूठ-मूठ लिखने से क्या फायदा, रुपया मिलना तो है नहीं। लेकिन यह
भी मैंने बताया कि मनीबेग में पाँच सौ रुपए के नोट थे। यदि रुपया वापस मिल
जाय तो पता लगानेवाले को आधा दे दूंगा। रिपोर्ट नहीं लिखवाई। दिल छोटा
करके पुलिस के दफ्तर से फिर उसी टिकटघर के सामने आकर खड़ा हो गया और
सोचा कि मैं कितना बड़ा बेवकूफ हूँ। अब कौन-सा मुँह लेकर कहाँ वापस जाऊँ।
कितनी मुश्किल से तो रुपये मिलते हैं। बड़ी मुसीबत है। थोड़ी देर तक इस
प्रकार के विमर्श के बाद दुबलिसजी के यहाँ वापस जाना ही ठीक समझा। मेरे
दिल में यह एक अत्यन्त भय हो रहा था कि दुबलिसजी और मेरे अन्य साथी मेरे
ऊपर यह सन्देह न करने लग जाएँ कि मैं रुपए हजम कर बैठा हूँ। यदि ऐसा
होता तो मैं मिट्टी में मिल जाता। लेकिन ये रुपए मैं जहाँ से लाता था उसका
पता हमारे दल के और किसी को न था। मुझे छोड़कर और दो व्यक्तियों को
इसका पता रहता था। एक तो देने वाले और दूसरा वह जिसके जरिए से मैं कभी-
288 / बन्दी जीवन
कभी रुपया जाता था। इसके अलावा मुझसे प्रश्न करनेवाला तो कोई था नही।
मनीबेग गायब होने का किस्सा यदि मैं प्रकाश न करता तो किसी को क्या मालूम
होता। ये सब बातें होते हुए भी मेरे मन में एकाएक भय और लज्जा उत्पन्न हुई
थी।
मुझे वापस आते देखकर दुबलिसजी मेरे पास आकर हँसते हुए खड़े हो
गए और पूछा क्या बात है। गाड़ी छूट गई। मैंने कहा टाँगेवाले को तो कुछ दे दो
फिर बताता हूँ। टाँगेवाले को पैसे दे दिए और मैंने अपनी बेवकूफी की कहानी
कह सुनाई। सब बातें सुनकर क्रोध का और अविश्वास के स्थान पर मेरे प्रति
दुबलिसजी के हृदय मे दया का उद्रेक हुआ। मुझे आश्वासन दिलाकर दुबलिसजी
ने कहा कि आप आज रात-भर ठहर जाइए। मैं आपको कुछ रुपया लाकर देता
हूँ। मेरे लिए दुबलिसजी ने एक बण्डी भी दी जिसकी भीतरी तरफ एक जेब
थी। दूसरे दिन दुबलिसजी ने कही से दो सौ रुपए लाकर मुझे दिए। उस दिन से
आज तक मैं कभी भी मनीबेग कोट या कमीज के ऊपरी हिस्से मे नही रखता हूँ।
मेरे बदन में हमेशा एक बण्डी रहती है। उस बण्डी को छोडकर और कही मैं
पैसा नहीं रखता। जीवन में यह दूसरी बार हुआ था, जब मेरे जेब से रुपया
निकल गया। पहली बार हावडा स्टेशन मे एक दफे मेरे जेब से और कुछ रुपए
निकल गए थे।
मेरठ में रहते समय एक और सज्जन से मेरी जान-पहचान हुई थी जिसका
उल्लेख करना यहाँ पर अप्रासंगिक न होगा। उन सज्जन का नाम था चौधरी
विजयपालसिंह। हम लोगों के साथ उनकी गहरी सहानुभूति थी लेकिन हम लोगों
की सहायता करने का उन्हे अवसर नही मिला। उनके पास से मैंने एक किताब
ली थी उसका नाम है सोवियत कन्स्टिट्यूशन। सितम्बर सन् 1923 के पहले ही
मैंने इस प्रकार से सोवियत कन्स्टिट्यूशन को समझाने की चेष्टा की थी। सन्
1923 में दिल्ली कांग्रेस के बाद मैंने कम्युनिज्म को समझने के लिए अच्छी तरह
से चेष्टा की उसी समय सोवियत कन्स्टिट्यूशन से भी यथेष्ठ लाभ उठाया। यह
किस्सा बाद का है। दुबलिसजी के साथ मेरी गहरी मित्रता हो गई थी। दुबलिस-
जी का घर था मेरठ जिले के मवाना ग्राम में। मवाना से हस्तिनापुर बहुत क़रीब
है। दुबलिसजी ने अपने घर ले जाने के लिए मुझसे विशेष आग्रह किया था और
कहा था कि मवाना से हस्तिनापुर बहुत क़रीब है ओर हस्तिनापुर देखने योग्य
स्थान है। ऐसा कौन-सा भारतवासी होगा जिसके हृदय मे हस्तिनापुर का नाम
सुनकर चांचल्य पैदा न हो। इन्द्रप्रस्थ हस्तिनापुर और दिल्ली ये तीन नाम
भारत के इतिहास में मानो एक सूत्र में ग्रथित है। लेकिन मुझमें एक बुरी आदत है
कि जिस काम के लिए जहाँ जाता हूँ उसको छोड़कर एक तिल-भर भी इधर-उधर
जाना मुझसे नहीं होता। यह एक त्रुटि है। व्यापक रूप मे किसी चीज को न देखना
एक अपूर्णता है। मैं अपने कामों मे ऐसा उलझा हुआ रहता था कि दो दिन की
जगह तीन दिन एक स्थान पर रहना मेरे लिए कठिन हो जाता था। मैं आज
उत्तर भारत में दल का विस्तार / 289
तक भी हस्तिनापुर नहीं गया। सन् 1937 में छूटने के बाद मैं दो दफा मेरठ
गया। मेरे कुछ साथी हस्तिनापुर हो आए हैं। लेकिन मुझे हस्तिनापुर जाने का
अवकाश नही मिला।
मेरठ में मैं कई बार आया-गया। दुबलिसजी की सहायता से मेरठ में दो-
चार आदमी और मिलने लग गए थे। लेकिन मेरी गिरफ्तारी के कारण मेरठ का
संगठन कुछ अधिक अग्रसर नही हो पाया। एक आर्यसमाजी प्रचारक वैश्य
अनाथालय मे आया करते थे। उनसे मेरी बहुत बातचीत हुई थी। बातचीत
के बाद वह आर्यसमाज के प्रचारक मेरे साथ काम करने को तैयार हो गए। वह
सज्जन पंजाब तक जाते थे। लेकिन दुख की बात है कि मेरी अनुपस्थिति में
इन सज्जन से किसी ने कोई काम नही लिया।
मेरठ के बाद मुझे पंजाब जाना था। लेकिन जेब से रुपया निकल जाने के
कारण फिलहाल पजाब जाना स्थगित किया किन्तु पजाब जाना तो था ही, इस-
लिए बनारस और इलाहाबाद घूमकर मैं फिर पंजाब गया।
पजाब मे जाकर लाहौर के प्रोफेसर जयचन्द्रजी विद्यालकार के यहाँ ठहरता
था। अब की बार भी विद्यालंकारजी के ही यहाँ ठहरा। मुझे ठीक स्मरण नही है
कि अब की बार या इसके पहले ही मुझे पता लग गया था कि सरदार गुरुमुखसिंह
इत्यादि जो अपना अलग सगठन कर रहे थे यह नही चाहते थे कि अबकी बार
सिख गैर सिक्ख सस्थाओ के साथ मिलकर भारतीय विप्लववादी आन्दोलन मे भाग
लें। यहाँ तक कि सरदार गुरुमुखसिंहजी ने चाहा कि हमारे सच्चे साथी सरदार
भगतसिंह को हम लोगो से तोडकर अपनी संस्था मे मिला लें। इस कारण गुरुमुख-
सिंह ने भगतसिंहजी को बहुतेरा समझाया कि तुम बंगालियो के फेर में मत पड़ो
इनके फेर मे पड़ोगे तो फाँसी पर लटक जाओगे काम कुछ भी नही कर पाओगे।
इस प्रकार से गुरुमुखसिंहजी जितनी बाते भगतसिंहजी से कहते थे वे हम लोगों
से सब कह देते थे। बहुत बहकाने पर भी भगतसिंहजी ने हम लोगों का साथ नही
छोडा। मैं भी गुरुमुखसिंहजी से मिलता रहा। अपनी संस्था के छपे हुए कानून-
कायदे गुरुमुखसिंहजी ने मुझे दिए थे। उन सबसे मुझे पता चला कि उनकी सस्था
रूस की साम्यवादी नीति पर सगठित है। साम्यवाद की नीति पर गुरुमुखसिंहजी
से बहुत बातचीत हुई। जहाँ तक मुझे आज याद है उस समय गुरुमुखसिंहजी पूर्ण
रीति से मार्क्सिस्ट नही थे कारण कि भौतिकबाद मे उनका पूरा विश्वास नही
था। यदि मैं भूल नही कर रहा हूँ तो सम्भव है गुरुमुखसिंहजी ने मुझसे यह भी कहा
था कि रूस की पूरी नकल करने की कोई आवश्यकता नही है। सरदार सन्तोष-
सिंह नामक एक सज्जन रूस से वापस आये हुए थे। मैं जिस समय पंजाब गया
था उस समय सरदार सन्तोषसिंहजी एक गाँव मे नजरबन्द थे। लेकिन मुझे
ऐसा मालूम हुआ कि सरदार सन्तोषसिंह ही यथार्थ में गुरुमुखसिंह आदि के संस्था
के संचालक, व्यवस्थापक या संस्थापक थे,। उनकी सलाह से ही गुरुमुखसिंह
इत्यादि काम करते थे। इसके बहुत पहले से ही मैं कम्यूनिज्म का साहित्य पढ़ने
290 / बन्दी जीवन
लग गया था। लेकिन अभी भी कम्यूनिज्म का पूरा स्वरूप मेरी समझ मे नहीं
आया था। गुरुमुखसिंहजी से बातचीत करने के बाद एवं सोवियत कांस्टिट्यूशन
(शासन विधान) पढ़ने के कारण कम्यूनिज्म के बारे मे मेरी धारणा और भी
स्पष्ट हो गई। सरदार गुरुमुखसिंह की संस्था के बारे में जयचन्द्रजी से मेरी
बातचीत हुई और यह विचार किया गया कि कम्यूनिज्म के सिद्धान्त का कितना
अंश हम अपनी संस्था में ग्रहण कर सकते हैं। उस समय अध्यापक जयचन्द्रजी भी
कुछ अधिक नहीं जानते थे। इस प्रकार हम लोग कम्यूनिज्म के बारे में धीरे-धीरे
सोचने लग गए। उस समय तक बंगाल के पुराने क्रान्तिकारी श्री नरेन्द्रनाथ
भट्टाचार्य उर्फ मानवेन्द्र राय यूरोप के कम्यूनिज्म के बारे मे लेख इत्यादि भारत
में भेजा करते थे। उनके प्रकाशित 'वेङ्गाडं आफ इण्डियन इण्डिपेन्डेन्स' नामक
साप्ताहिक पत्र हम लोगों के हाथ में आए। उन पत्रों एवं पर्चों से भी कम्यूनिज्म
के बारे में हम लोग कुछ-कुछ समझने लग गए ।
अबकी बार पंजाब आकर जैसा एक तरफ रूस की साम्यवादी नीति के
संस्पर्श में आए उसी
प्रकाशित कर दूँ। मुझे जहाँ तक पता है उससे मैं कह सकता हूँ कि भारत के और
किसी भी विप्लव दल ने ऐसी चेष्टा नहीं की थी जैसी कि हमारे दल के द्वारा
हुई थी ! सरदार गुरुमुखसिंह के दल में अवश्य ऐसी चेष्टा सफलतापूर्वक हुई
थीं।
उस व्यक्ति का नाम आज मैं भूल गया हूँ जिसे हम लोगों ने काश्मीर की
प्रसिद्ध सरहद गिलगिट में एवं पेशावर की सरहद जमरूद इत्यादि की तरफ भेजा
था। हम लोगों का उद्देश्य यह था कि इन सरहदों के जरिए से बाह्य जगत् से
भारत के विप्लव आन्दोलन का योग सूत्र स्थापन किया जाय। इस व्यक्ति ने कई
महीनों तक भीषण कष्ट सहन करते हुए गिलगिट के आसपास में मुसीबत के
दिन बिताए थे। उनकी सहायता से हम लोगों को यह पता चला था कि भारत
और चीन के लिए गिलगिट के रास्ते से व्यापारी आते-जाते हैं, लेकिन उनकी
बड़ी सख्त निगरानी होती है। महीनों तक का रसद साथ लेकर इन रास्तों से
गुज़रना पड़ता था। धन और बुद्धि से काम लेने पर इस रास्ते से अस्त्र-शस्त्र
मंगाना असंभव बात नहीं थी। आज अवश्य इन रास्तों से अस्त्र मँगाने की
आवश्यकता नहीं है। लेकिन जिन दिनों की बात यहाँ लिख रहा हूँ उन दिनों में
हम लोग विदेश से बड़े पैमाने में अस्त्र-शस्त्र मँगाने का रास्ता ढूंढ़ रहे थे। यदि
मैं शीघ्र पकड़ा गया न होता तो संभव है, हमारा विप्लव आन्दोलन कुछ और ही
रंग-रूप ग्रहण किए होता। गिलगिट के रास्ते के अलावा पेशावर के रास्ते का
भी हम लोगों ने भली प्रकार से निरीक्षण कर लिया था। अवश्य ही ब्रिटिश
सरकार को यह पता है कि पेशावर के रास्ते से बाहर के विप्लवकारियों का
गुजरना संभव एवं स्वाभाविक है।
सन् 1923 के सितम्बर मास में देहली में कांग्रेस का विशेष अधिवेशन हुआ
था। ऐसे अवसरों पर भारत के प्रत्येक प्रांत से हर प्रकार के मनुष्य आया करते
हैं। इस कारण कांग्रेस के अधिवेशन के समय अन्तर प्रांतीय संगठन का कार्य बहुत
आगे बढ़ जाता है। देहली के कांग्रेस के विशेष अधिवेशन के समय मैंने कराची के
अध्यापक गिडवानी साहब, श्री कुरेशी साहब (जो कि एक समय महात्मा गांधी
के 'यंग इंडिया' के सम्पादक भी रह चुके थे), महाराष्ट्र के हार्डीकर साहब
मिर्जापुर के बैरिस्टर श्री यूसुफ इमाम साहब, बुन्देलखण्ड के दीवान शत्रुघ्नसिंह
आदि से बातचीत की थी। अध्यापक गिडवानी साहब जानना चाहते थे कि
क्रान्तिकारी आन्दोलन के साथ देशबन्धु चितरंजनदास का कहाँ तक सम्बन्ध था।
मैं भी जानना चाहता था कि क्रान्तिकारी आन्दोलन के बारे में गिडवानी साहब
की क्या धारणा है। उनसे बातचीत करने पर मुझे यह निश्चय हो गया था कि
गिडवानी साहब अहिंसा नीति को सिद्धान्त के तौर पर नहीं मानते थे। नीति
के हिसाब से भी हिंसा और अहिंसा के रास्ते पर उनकी कोई निश्चयात्मक
धारणा नहीं थी। जिस समय की बात मैं लिख रहा हूँ उस समय गिडवानी
साहब राष्ट्रीय विद्यालय के अध्यापक थे। अपने प्रांत के नवयुवकों में उनकी