बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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श्री मोतीलालजी, जवाहरलालजी तथा
श्री सी० ऋार० दास से भेंट
इधर बंगाल की बातें कहने को बहुत कुछ रह गई हैं। जमशेदपुर के काम को
छोड़ देने के बाद और इलाहाबाद आने के पहले एवं इलाहाबाद से भी मैं कई
दफा कलकत्ता गया था। उसका विवरण देना अभी बाकी है।
पंजाब का समाचार लेकर के उस समय मैं बंगाल गया था। आज भी मुझे
यह ठीक-ठीक स्मरण है कि मैं देशबन्धु सी० आर० दास से कई बार मिला था
और पंजाब का संदेश लेकर उनसे बहुत बातचीत हुई थी। उसका सब वृतान्त
आज प्रकाश कर देने से किसी की भी कोई हानि नही है ऐसा मैं समझता हूँ।
इसके पहले पं० जवाहरलालजी से भी मेरी जो बातचीत हुई थी उसे भी यहाँ
लिख देना अप्रासंगिक नही होगा। विशेष करके पं० जवाहरलालजी ने अपनी
आपबीती (मेरी कहानी) में क्रान्तिकारी आन्दोलन के बारे में जगह-जगह पर
अपने बहुत कुछ मन्तव्य प्रकाशित किये हैं। जमशेदपुर के काम को छोड़ देने के
बाद इलाहाबाद मे मैंने पं० मोतीलालजी नेहरू एवं पं० जवाहरलालजी नेहरू से
मुलाकात की थी। उस समय पं० मोतीलालजी नेहरू स्वराज्य पार्टी बनाने में लगे
हुए थे। अभी तक देहली मे कांग्रेस का विशेष अधिवेशन नहीं हुआ था। मुझे
इस समय याद नही है कि गया में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन हो चुका था या
नही। मोतीलालजी से मैंने बहुत नम्रता एवं आन्तरिकता के साथ यह निवेदन
किया था कि कांग्रेस कार्यक्रम का यह एक प्रधान अंग होना चाहिए कि कांग्रेस
सदस्यों को लेकर जो संगठन हो उमका स्वरूप ऐसा होना आवश्यक है जैसा
आयरलैंड का 'शिनफीना' संगठन था अथवा जैसा यूरोप के अन्य देशों में राज-
नीतिक संगठन होते थे। यहाँ आवश्यकता पड़ने पर आदमियों की माँग की जाती
है और उस समय जाने कितने प्रकार के आदमी कितनी विभिन्न भावनाओं को
लेकर थोड़े दिन के लिए कांग्रेस के काम में भाग लेते हैं। लेकिन होना यह
चाहिए कि देश-सेवा के आदर्श को लेते हुए त्यागी मनुष्यों का ऐसा दल तैयार
हो जिसमें प्रत्येक व्यक्ति देश-सेवा के आदर्श को यथार्थ रूप में हृदयंगम करके
भ्रातृभाव से प्रणोदित होकर बहुकाल व्यापी त्याग का जीवन व्यतीत करने के लिए
तैयार हो। मेरे दिल में और भी बहुत-सी बातें थीं जिन्हें प्रकाश करने के पूर्व ही