बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री मोतीलालजी, जवाहरलालजी तथा श्री सी० आर० दास से भेंट / 279
मैंने सुना कि बंगाल कांग्रेस के लेबर-विभाग में मुझे लेने के लिए सी० आर०
दासजी ने इच्छा प्रकट की थी। इन सब बातों के अतिरिक्त और भी एक बड़ी
बात यह थी कि सी० आर० दास के सम्पादन में 'नारायण' नाम से जो मासिक
पत्र निकलता था उसमे 'बन्दी जीवन' नाम का मेरा लेख प्रकाशित होता था। इस
लेख के प्रति भी सी० आर० दासजी की दृष्टि प्रबल रूप में आकृष्ट हुई थी ऐसा
मैंने सुना है। श्री हेमन्तकुमार सरकार उस समय देशबन्धु के अन्तरंग कार्यकर्ताओं
में से थे। इन्ही की जबानी मैंने ये सब बातें सुनी थी। नागपुर काग्रेस के बाद
देशबन्धु दास ने कुछ कार्यकर्ताओं को अपने यहाँ दावत दी थी। उस दावत में मै
भी निमन्त्रित था। मुझे नितान्त दुःख है कि उस समय वर्दवान जिले के कालना
नामक स्थान में मैं ईंट के कारोबार मे बुरी तरह फँस गया था। इसलिए
ऐसे सुनहले अवसर पर मैं देशबन्धु के साथ मिलकर काम करके अपने कर्मजीवन
को सार्थक नही कर पाया। इन सब कारणों से देशबन्धु दास से मेरा यथेष्ठ
परिचय हो चुका था। इसलिए जब मैंने देशबन्धु से एकान्त मे बातचीत करने के
लिए कुछ समय चाहा तो दासजी ने सहर्ष मुझे इसके लिए समय दिया।
मेरे साथ देशबन्धु सी० आर० दास जी की बातचीत दो-तीन बार हुई थी।
जहाँ तक मुझे स्मरण है मैने उनसे जो पहली बार बातचीत की थी वह सबसे
महत्त्वपूर्ण थी और उसी बातचीत मे मैंने पजाब के बारे में भी बातचीत की थी।
जब निर्दिष्ट समय पर दासजी के मकान पर आया तो वे विशेष स्नेह के साथ
मुझे एक निर्जन कमरे मे ले गए। सबसे पहले मैंने उन्हें बताया कि उनके साथ
जिनका मतभेद भी है उन्हें भी वे उदारता के साथ सहायता देते हैं यह बात सर्व-
विदित है। अतः मैं भी आपके पास कुछ सहायता पाने की इच्छा से आया हूँ।
सम्भव है वे मेरे आदर्श से सहमत न हो तथापि मैंने यह हिम्मत की कि उनमे
सहायता की प्रार्थना करूँ। फिर मैंने दासजी को अपना गुप्त गयक्रम बताया।
फिर पंजाब के अकाली नेता के बारे मे बातचीत की और कहा कि यदि वे समझें
कि बड़े लाट साहब के ऊपर आक्रमण करने पर प्रकाश्य आन्दोलन को धक्का नही
पहुँचेगा और यदि इस बात पर उनको कोई आपत्ति न हो तो हम लोग वाइसराय
पर आक्रमण करना चाहते हैं। और यदि वे समझे कि ऐसा करने से उनके
आन्दोलन मे विघ्न पैदा होगा तो हम लोग ऐसा काम नही करेगे। यदि हम लोग
यह काम करते है और यदि हमारा आदमी पंजाबियों और विशेष करके सिक्खों
के साथ सहानुभूति प्रकट करने के लिए पंजाब में जाकर आत्मबलिदान करता है
तो इस प्रकार से हम सिक्खों के हृदय पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। वाइसराय
पर आक्रमण करने के परिणामतः जब हमारा आदमी अदालत के सामने कटघरे
के अन्दर खडे होकर वीरत्व व्यंजक शब्दो मे पंजाबियो के प्रति सहानुभूति
दिखलाते हुए यह कहेगा कि राष्ट्र की समस्त शक्ति से तुम वाइसराय हमारे
राष्ट्रीय आन्दोलन को बलपूर्वक कुचलना चाहते हो तो हमारा भी कर्तव्य हो जाना
है कि हम भी दिखला दें कि बलपूर्वक किसी राष्ट्रीय आन्दोलन को कुचला नही