बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
पृष्ठ 280, कुल 408 में से
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किताब से यह पता चला है कि देशबन्धु के उद्योग से सितम्बर सन् 1921 में
महात्माजी से बंगाल के कुछ क्रान्तिकारियों की बातचीत हुई थी । इस बातचीत
में देशबन्धु दास भी उपस्थित थे । महात्माजी से बातचीत होने के बाद इन
क्रान्तिकारियों ने महात्माजी को यह वचन दिया था कि महात्माजी के कार्यक्रम
में वे लोग बाधा तो देंगे ही नहीं बल्कि कांग्रेस आन्दोलन में योगदान देकर उनके
कार्यक्रम को सफल बनाने की वे भरसक कोशिश करेंगे । जहाँ तक मुझे मालूम
है इन क्रान्तिकारियों में ढाका अनुशीलन समिति के कोई व्यक्ति नहीं थे और
सम्भव है कलकत्ता के दूसरे दलों के व्यक्तियों ने मुझे भी ढाका समिति का
आदमी समझकर मेरे साथ कोई सलाह नहीं की थी । मैं इस समय जमशेदपुर के
मजदूर आन्दोलन में काम कर रहा था । ढाका अनुशीलन समिति कांग्रेस आन्दो-
लन के विरुद्ध श्री सी० आर० दास के विरोधी दल के प्रमुख आदमियों की सहायता
लेकर सत्याग्रह आन्दोलन का विरोध करती थी। बंगाल के दूसरे दलों के व्यक्तियों
से मुझे यह संवाद मिला था । यह बात मैं पहले ही बता चुका हूँ ।
पंजाब से लौटकर मैंने भी देशबन्धु दास के साथ सम्बन्ध स्थापित करने का
निश्चय कर लिया । देशबन्धु दास से मेरा परिचय पहले ही हो चुका था ।
अण्डमन में रहते ही मैं अपने भाइयों के पास जो चिट्ठी भेजा करता था उसके
अनुसार मेरे भाई देश के सर्वमान्य नेताओं के पास राजनीतिक कैदियों को छुड़ाने
के लिए आवेदन-निवेदन पत्रादि भेजा करते थे । उस समय के राजनीतिक नेताओं
में से केवल सी० आर० दास एवं अखिलचन्द्र नियोगी ने उन आवेदन-निवेदनों के
उत्तर दिए थे । इस बात से भी देशबन्धु का महत्त्व व्यक्त होता है । इसके बाद
नागपुर कांग्रेस में सी० आर० दासजी के साथ मेरा साक्षात परिचय हुआ । कुछ
थोड़े आदमियो ने नागपुर मे देशबन्धु को यह आश्वासन दिलाया था कि यदि आप
वकालत छोड़कर राजनीतिक क्षेत्र में अवतीर्ण हो तो हवा ऐसी पलटेगी जिसकी
तुलना मिलनी मुश्किल है । इन थोडे आदमियों में मैं भी एक था । श्री सी०
आर० दास को यह भरोसा नही था कि उनके राष्ट्रीय क्षेत्र में पूर्णरूप से अवतीर्ण
होने पर भी बंगाली जनता ठीक प्रकार से उनके आह्वान का प्रत्युत्तर दे सकेगी ।
स्कूल, कालेज के लड़के भी सत्याग्रह आन्दोलन में यथार्थ रूप में भाग लेंगे या
नही, स्कूल-कालेज छोड़ेंगे या नही इसमें सी० आर० दासजी को काफ़ी संदेह
था । जिन व्यक्तियों ने सी० आर० दासजी से यह कहा था कि आपके वकालत
छोड़ने पर बंगाल के छात्रवृन्द अवश्य ही स्कूल-कालेज छोड़ देंगे उनमें बंगाल के
एक वकील श्री गिरजाप्रसन्न साम्याल और मैं थे । नागपुर कांग्रेस के अधिवेशन
के समय विषय समिति की बैठक में भी मैंने सी० आर० दास के पक्ष में दो-चार
बातें कही थीं । उस समय दासजी के साथ महात्माजी की तनातनी चल रही थी ।
इसलिए जो व्यक्ति दास के पक्ष में कुछ कहता था उसके प्रति उनकी दृष्टि
आकृष्ट होती थी । फिर खुले अधिवेशन में राजनीतिक बन्दियों के सिलसिले में
ही एक बंगाली था जो सर्वप्रथम हिन्दी में सफलतापूर्वक बोला था । बाद को