बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री मोतीलालजी जवाहरलालजी तथा सी० आर० दास से भेंट / 281
था कि ऐसा कोई सिलसिला निकालो जिसके जरिए मैं तुम्हें सहायता दे सकूं ।
फिर थोड़ा सोचकर उन्होंने कहा कि बड़ा बाजार की तरफ़ यदि तुम्हारा कोई
प्रभावशाली आदमी हो तो उसे मैं मासिक वेतन के रूप में कुछ दिया करूंगा । वह
व्यक्ति प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी की तरफ से बड़ा बाजार में कांग्रेस का कार्य करेगा ।
बड़ा बाजार में तुम्हारा कोई आदमी है। दासजी जानते थे कि मेरा कार्य-क्षेत्र
युक्त प्रान्त है। सम्भव है इसीलिए वे चाहते थे कि मेरा कोई परिचित व्यक्ति
बड़ा बाजार में कांग्रेस का काम करे। बड़ा बाजार में जो लोग कांग्रेस का कार्य
कर रहे थे उनमें से अधिकांश व्यक्ति महारमाजी के कट्टर अनुयायी थे । इसलिए
संभव है दासजी यह चाहते थे कि मेरी सहायता से उन्हें बड़ा बाजार में कोई
आदमी मिल जाय । दासजी बड़ा बाजार में एक प्रभावशाली व्यक्ति चाहते थे।
मैंने ऐसे व्यक्ति का परिचय दिया। सी० आर० दासजी ने इस प्रकार से मुझे
तीन सौ रुपया मासिक देने का वचन दिया था। लेकिन दुर्भाग्य से गया कांग्रेस के
बाद मैंने एक परचे में सी० आर० दासजी का कुछ विरोध किया था। गया कांग्रेस
के सभापति के पद से देशबन्धु दासजी ने विप्लव आन्दोलन की चर्चा करते हुए
विप्लव नीति के विपक्ष में कुछ कहा था। उसी सिलसिले में दासजी ने यह भी
कहा था 'विप्लव आन्दोलन कभी भी सफल नहीं हो सकता । यदि मुझे विश्वास
होता कि विप्लव आन्दोलन सफल होगा तो मैं भी सशस्त्र क्रान्तिकारी आन्दोलन
में अवश्य भाग लेता । मुझे बिल्कुल विश्वास नहीं है कि विप्लव आन्दोलन सफल
हो सकता है। इसलिए मैं विप्लव आन्दोलन में योगदान नहीं करता।' मैंने अपने
पर्चे में यह लिखा था कि जिस दिन लोग यह समझने लगेंगे कि विप्लव आन्दोलन
सफल होने जा रहा है उस दिन हमें यह परवाह नहीं रहेगी कि सी० आर० दास
जी हमारे साथ आते हैं या नहीं। राजनीतिक होने का अर्थ तो यह है कि सफलता
की आशा दिखाई देने के पहले ही वह जान जाय कि वह आन्दोलन आगे चलकर
सफल होगा या नहीं । यह लिखते समय मैंने इस बात पर ध्यान रखा था कि जहाँ
तक सिद्धान्त का सम्बन्ध है वहाँ कोई भी किसी से भी समझौता नहीं कर सकता ।
अपने सिद्धान्तों को स्पष्ट करने के लिए एवं उसके प्रचार के लिए बड़े-बड़े नेताओं
का भी विरोध करना हमारा परम कर्त्तव्य है। लेकिन कार्य-क्षेत्र में हम सबके साथ
मिलकर काम कर सकते हैं। केवल सिद्धान्त के बारे में हम किसी से भी कोई
समझौता नहीं करेंगे, यह हमारा प्रण था । इसलिए देशबन्धु सी० आर० दासजी
ने कांग्रेस के सभापति के आसन से विप्लव आन्दोलन पर जब कटाक्ष किया तब
हमारा भी कर्त्तव्य हो गया कि हम उसका उत्तर दें। लेकिन इस उत्तर से दास
जी मेरे ऊपर अत्यन्त असन्तुष्ट हो गए थे । यहाँ तक कि जब मैंने फिर उनसे
मिलना चाहा तो उन्होंने मेरे साथ मिलने से भी इन्कार कर दिया ।
मुझे ऐसा जान पड़ता है कि देशबन्धुजी के साथ मेरा यह बिगाड़ उस समय
की घटना है कि जब मैं युक्तप्रान्त को छोड़कर फरार हालत में कलकत्ता में
आकर रहने लग गया था। बड़े लाट साहब के ऊपर, आक्रमण करने की बात