बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री मोतीलालजी, जवाहरलालजी तथा श्री सी० आर० दास से भेंट / 277
विप्लव आन्दोलन का काम जनता के सामने आए । मैंने अवश्य ही पंडितजी को
यह बतला दिया था कि ऐसी आशा करके आप नितान्त दुराशा कर रहे हैं।
क्योंकि विप्लवीगण अब जो ठीक समझेंगे वही करेंगे। कारण, सिद्धान्तों का जब
भेद है तो कर्म-प्रणाली में भी भेद अवश्य होता है इसे कौन रोक सकता है।
पण्डितजी ने इस पर केवल यही कहा था कि ऐसा होना नहीं चाहिए।
सब बातें समाप्त होने पर हम एक-दूसरे के प्रति यथेष्ठ प्रीति की भावना
लेकर एक-दूसरे से विदा हुए। इस घटना के बाद भी पण्डितजी से बीच-बीच में
मैं मिलता रहा। 'बन्दी जीवन' प्रथम भाग छपने पर मैंने एक प्रति पंडितजी को
उपहार दी थी। पंडितजी ने स्वयं भी इस किताब को पढ़ा था एवं दूसरों को
इसे पढ़ने को कहा था। मुझसे पण्डितजी ने कहा था कि दूसरे भाग की भाषा
कुछ और सरल होनी चाहिए। नैनी जेल मे भी पण्डितजी से बहुत बातचीत हुई
थी। जिसका वर्णन जेल-जीवन के संदर्भ में ही करने की इच्छा है।
इलाहाबाद में जो दूसरे कांग्रेस के नेता थे उन सबसे भी मैं अच्छी तरह
मिला था। उनमें से एक-दो सज्जन विप्लव आन्दोलन के प्रति यथेष्ठ सहानुभूति
रखते थे। लेकिन व्यावहारिक रूप में इनमें से किसी ने भी हमें कुछ भी सहायता
नही दी।
विप्लव आन्दोलन के सम्पर्क के प्रकाश्य नेताओं में से पडित जवाहरलालजी
को छोड़कर देशबन्धु सी० आर० दासजी से सबसे अधिक एवं गम्भीर रूप में
बातचीत हुई थी। पंजाब से लौटने के बाद किस समय मैं कलकत्ता गया था एवं
सबसे पहले मैं कब देशबन्धु सी० आर० दासजी से मिला था यह मुझे इस समय
ठीक-ठीक याद नही है। मैंने अपनी नीति यह बना ली थी कि हम प्रकाश्य आन्दो-
लन के नेताओं से अपना ऐसा सम्बन्ध स्थापित करें जिससे देश के गण्यमान्य
व्यक्ति विप्लव आन्दोलन के प्रति यथेष्ठ रूप में सहानुभूतिपूर्ण हो जाएँ और
यदि सम्भव हो सके तो उनसे अपने आयोजन के अनुसार सहायता लेने की भी
चेष्टा करें। इस नीति के कारण एवं पंजाब के गुरुद्वारा आन्दोलन के नेता से
बातचीत हो जाने के कारण देशबन्धु सी० आर० दासजी से मिलना मेरे लिए
नितान्त आवश्यक हो गया था।
बड़े लाट साहब के ऊपर आक्रमण करने से प्रकाश्य राष्ट्रीय आन्दोलन को
किसी प्रकार से आघात पहुँचेगा या नहीं यह समझ लेना मेरे लिए उचित था।
और मैं यह भी नही चाहता था कि प्रकाश्य आन्दोलन के नेतागण हमारे ऊपर
यह लांछन लगाएँ कि हमारे ही काम के कारण प्रकाश्य आन्दोलन में विघ्न
पहुँचा। मैं यह भी चाहता था कि देशबन्धु से विप्लव आन्दोलन के लिए कुछ
आर्थिक सहायता लूं। इन सब कारणों से देशबन्धु सी० आर० दासजी से मैं
मिला, एकदम एकान्त में बातचीत हुई।
देशबंधुं सी० आर० दास के साथ बंगाल के कुछ क्रान्तिकारियों का सम्बन्ध
था। लेकिन मेरे साथ उनका कोई सम्बन्ध नहीं था। श्री सुभाषचन्द्र बोस की एक