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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 278, कुल 408 में से

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पृष्ठ 278

276 / बन्दी जीवन
क्योंकि आखिर में अहिंसा नीति के बारे में पं० जवाहरलालजी से मैंने कुछ ऐसे
व्यक्तिगत प्रश्न किये थे जिसका सम्बन्ध विप्लववाद की युक्ति धारा के साथ कुछ
भी न था। लेकिन पंडितजी ने मेरे सब प्रश्नों का उत्तर बड़ी शान्ति से दिया
और मुझसे जरा भी असन्तुष्ट नहीं हुए। कारण कि मेरे प्रश्न असंलग्न न थे और
मानसिक विश्लेषण की दृष्टि से व्यक्तिगत विकास को जानने के लिए वे यथेष्ठ
संगत थे।
पंडितजी के साथ बातचीत के सिलसिले में प्रसंग-क्रम से यह भी बात छिड़
गई थी कि हमारे गुप्त आन्दोलन से प्रकाश्य आन्दोलन का क्या सम्बन्ध रहेगा।
पंडितजी कहते थे कि प्रकाश्य रूप में व्यापक जन-आन्दोलन की सृष्टि किए बिना
जन-साधारण में जागृति नहीं हो सकती है और जाग्रत जनता को छोड़कर भारत
का राष्ट्रीय आन्दोलन सफल नहीं हो सकता है। गुप्त षड्यन्त्र से जनता में कोई
जागृति नहीं उत्पन्न हो सकती है। मैंने भी बहुत अंशों में पंडितजी की यह बात
मान ली थी लेकिन मैंने यह कहा था कि प्रकाश्य जन-आन्दोलन एवं गुप्त रूप में
विप्लव के लिए षड्यन्त्र का काम भी साथ-साथ चलना चाहिए। एक को छोड़कर
दूसरा काम अपरिपूर्ण रह जाएगा। पिछले दिनों के बंगाल के राष्ट्रीय आन्दोलन
का उल्लेख करते हुए मैंने पंडितजी से कहा था कि बंगाल के मॉडरेट नेतागण भी
बहुत दबी हुई जबान से विप्लव आन्दोलन की निन्दा तो करते थे लेकिन उनके
कहने का सदा यह तात्पर्य रहता था कि प्रकाश्य आन्दोलन विफल होने पर भारत
में भीषण रूप में ऐसा खूनी विप्लव आन्दोलन प्रारम्भ हो जाएगा जिसकी तुलना
में आयरलैण्ड की अवस्था भी तुच्छ मालूम पड़ेगी अर्थात् बंगाल के मॉडरेट नेता-
गण अपना आन्दोलन इस प्रकार से चलाते थे जिससे बंगाल के विप्लव आन्दोलन
का प्रभाव ब्रिटिश सरकार के ऊपर जरा भी कम न पड़े। जन-आन्दोलन की
आवश्यकता तो अत्यन्त है इसमें कोई सन्देह नहीं। बंगाल में भी जन-आन्दोलन
यथेष्ठ उग्र एवं प्रचण्ड हो चुका था, इसीलिए उस प्रान्त में क्रान्तिकारी आन्दोलन
ने भी खूब जोर पकड़ा। युक्तप्रान्त, बिहार और मद्रास में यथेष्ठ रूप में प्रकाश्य
आन्दोलन नही हुआ इसीलिए उन प्रान्तों में क्रान्तिकारी आन्दोलन भी प्रचण्ड
नहीं हुआ। इसलिए उनसे मेरा नम्र निवेदन यह था कि भविष्य में जन-आन्दोलन
का नियन्त्रण इस प्रकार से करें जिससे विप्लव आन्दोलन को कुछ भी आघात न
पहुँचे। ये दोनों आन्दोलन एक-दूसरेके परिपूरक हों। ऐसा होना हम लोग उचित
समझते हैं। लेकिन मुझे अत्यन्त दुःख हुआ जब पंडितजी ने कहा कि ऐसा होना
भी सम्भव नहीं है। कारण महात्मा गांधी के नेतृत्व में जो जन-आन्दोलन हो रहा
है, और होगा वह एकदम अहिंसा नीति पर चलेगा और इसके साथ विप्लव
आन्दोलन की कोई सहयोगिता नहीं हो सकती है। बल्कि विप्लव आन्दोलन के
कारण अहिंसात्मक आन्दोलन को यथेष्ठ धक्का पहुँचेगा। यहाँ तक कि यदि
विप्लव आन्दोलन चलता रहे तो अहिंसात्मक सत्याग्रह आन्दोलन के लिए
वातावरण एकदम बिगड़ जाएगा। इसलिए हम लोग कभी भी नहीं चाहेंगे कि