बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री मोतीलालजी, जवाहरलालजी तथा श्री सी० आर० दास से भेंट / 275
वैसे ही बड़े-बड़े देशद्रोही निकलेंगे जिनकी स्वार्थान्धता के कारण देश को बड़ी-
बड़ी हानि पहुंचेगी । ‘अमेरिकन वार आफ इण्डिपेन्डेन्स’ अमेरिका के स्वातन्त्र्य
युद्ध के समय बड़े-बड़े जेनरल देश-द्रोहिता करके अंग्रेजों की तरफ चले गए थे ।
पंडितजी ने यह प्रश्न किया था कि “ब्रिटिश गवर्नमेण्ट के मुकाबिले में तुम लोग
कैसे अस्त्र-शस्त्र संग्रह कर सकते हो ? अंग्रेजों की सुशिक्षित सेना के मुकाबिले
में तुम क्या कर सकते हो ? तुम्हारे पास वह शिक्षा कहाँ है ?’’ मैंने इस बात को
भी स्वीकार कर लिया औरकहा कि हमारे सामने यही तो काम है कि हम अपने
आदमी विदेशों में भेजें जहाँ पर वे सामरिक शिक्षा एवं युद्ध सामग्री बनाने के
कारखानो में शिक्षा पा सकें । यह काम भी प्रकाश्य रूप मे कोई कर नही सकता ।
इसके लिए भी तो गुप्त रीति से षड्यन्त्र करने की आवश्यकता है ... अस्त्र-शस्त्र
संग्रह करने के बारे में मैने उनसे जो कुछ कहा था उसे आज भी प्रकाशित
करना उचित नही समझता हूँ । लेकिन पंडितजी को यह विश्वास नही हुआ कि
हम अंग्रेजों के मुकाबिले में सामरिक तैयारी या अस्त्र-शस्त्र ग्रहण कर सकते हैं ।
उन्होने कहा कि “मान लो तुम लोगों ने फ़ौजी अफ़सरों की शिक्षा भी पा ली
लेकिन फिर भी अंग्रेज सरकार की फ़ौज के मुकाबिले मे अपनी फौज कैसे तैयार
करोगे । अगर यह बात भी मान ली जाय कि राइफल और गोली भी बाहर से
मँगा मको गे तो फिर मशीनगन आर्मर्डकार टेंक, तोपखाना, हवाई जहाज़ इत्यादि
के मुकाबिले मे तुम क्या कर सकते हो ।” मैंने हँसकर इसका जवाब दिया था कि
आखिर जर्मन राष्ट्र के मुकाबिले में आधुनिक ससार में कोई राष्ट्र तो था नही ।
जर्मन जेनरलॉ के समान कार्यक्षम होना आमान बात नही है । फिर भी जर्मनी
की रियाया ने कैसे सफलतापूर्वक जर्मन राज्य को तोड़कर वहाँ प्रजातन्त्र क़ायम
किया ? वहाँ भी तो तोपखाने मशीनगन और हवाई जहाज़ थे । लेकिन प्रजा के
विद्रोह के सामने ‘कैसर’ को हॉलैण्ड भाग जाना पड़ा और ‘‘हिण्डेनवर्ग’’ को भी
तो झुकना पड़ा । जिस पलटन ने फ्रांस, इंगलैण्ड, इटली और अमेरिका की
सम्मिलित शक्ति का मुकाबला किया था, जब उसी पलटन ने प्रजा के विद्रोह का
साथ दिया तो वही मशीनगन, वही तोपखाने, वही हवाई जहाज़ कैसर के काम
मे न आकर विद्रोहियों के काम मे आये । उसी प्रकार से अंग्रेजों की शक्ति चाहे
जितनी बड़ी क्यो न हो लेकिन भीतरी विप्लव के कारण जो भावना उत्पन्न होगी
उसका मुकाबला करना उनके लिए बहुत कठिन बात है । यदि अपनी तैयारी के
साथ देशी पलटन हमारा साथ दे तो अंग्रेज़ो की तमाम शक्ति और उनके मशीन-
गन इत्यादि कोई काम नहीं दे सकती । लेकिन मेरी कोई युक्ति काम नही आई ।
पंडितजी को यह विश्वाम नही हुआ कि भारतवर्ष मे सशस्त्र क्रान्ति सम्भव है ।
अन्त मे पंडितजी ने अहिंसा की नीति पर बहुत जोर दिया और कहा कि ये तो
अहिंसा नीति पर विश्वास रखते है और यही मानवता है कि महात्माजी के
दर्शाये हुए मार्ग से ही भारतवर्ष का कल्याण हो सकेगा । इस प्रकार मे बातचीत
समाप्त होते समय सम्भव है मुझमें कुछ असहिष्णुता कुछ ऊष्णता आ गई हो ।