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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 275, कुल 408 में से

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पृष्ठ 275

श्री मोतीलालजी, जवाहरलालजी तथा श्री सी० आर० दास से भेंट / 273
पं० मोतीलालजी मेरे प्रस्ताव की हँसी उड़ाने लग गए। मैं पंडितजी को यह नहीं
समझा पाया कि फ्रांसीसी राज्य क्रान्ति के पहले फ्रांस में और विशेषकर पैरिस
में कितने राजनीतिक क्लबों की स्थापना हुई थी। पंडितजी ने मेरी बातों को पूरी
तरह से सुना भी नहीं और जब कभी अपने कामों से फुरसत पाते थे और मैं पास
होता था तो पंडितजी मेरी तरफ दृष्टि निक्षेप करके मुस्कराकर मुझसे पूछते थे,
"कहा मिस्टर सान्याल और कुछ ब्रिलियण्ट सजेशन हैं ?" मैं भी अपनी लज्जा
और झेंप को छिपाने के लिए कह दिया करता था, "जहाँ तो सभी ब्रिलियण्ट हैं
इन सब के सामने मैं क्या अपनी ब्रिलियन्सी दिखलाऊँ।" पं० मोतीलालजी से
तो इससे आगे बातचीत बढी नही । लेकिन पं० जवाहरलालजी से दो-तीन दिन
तक बहुत बातचीत हुई थी । यदि पडितजी की राय मेरी राय से मिल गई होती
तो आज ये सब बातें लिखने की आवश्यकता न होती। कारण उस अवस्था में
तो वे हमारे सहयोगी होने और अपने आदमियो की बात शत्रुओं के सामने
प्रकाशित कर देने का अर्थ होता है देशद्रोह करना । इसके अतिरिक्त पंडित
जवाहरलालजी ने अपनी आत्म-कहानी मे क्रान्तिकारियो के प्रति अपनी राय
व्यक्त करना उचित समझा है, तथा समय-समय पर भारत के राष्ट्रीय नेता की
हैसियत से क्रान्तिकारियो के बारे में उन्होंने बहुत-से वक्तव्य प्रकाशित किये हैं।
मैंने भी एक क्रान्तिकारी होने के नाते प० जवाहरलालजी से जो बातचीत की
थी राष्ट्रीय आन्दोलन के इतिहास मे उसका भी एक स्थान होना उचित है ऐसा
मैं समझता हूं। अण्डमन से लौटने के बाद राजनीतिक बन्दियो की मुक्ति के लिए
आन्दोलन मे उनसे सहायता पाने की इच्छा से एक दफा मैं प० जवाहरलालजी
से मिला था। इसका उल्लेख मैने पहले ही कर दिया है। इसलिए पण्डितजी से
मेरी कुछ थोडी बहुत पहचान हो गई थी। प० मोतीलालजी से निराश होकर मैंने
चाहा कि एक दफे पं० जवाहरलालजी से भी अच्छी तरह से बातचीत करके
क्यो न देख लूं। एक दफे मिलने की इच्छा प्रगट करने पर पं० जवाहरलालजी
ने मेरे मिलने के लिए एक समय नियत कर दिया । उस नियत समय पर एक दिन
प्रातःकाल मैं 'आनन्दभवन' भवन मे पं० जवाहरलालजी से मिला। वह समय
पडितजी का जलपान करने का समय था। बातचीत शुरू होते ही पंडितजी के
लिए कुछ फल इत्यादि आए थे। मुझसे भी उन्होंने पूछा, 'कुछ खाओगे?' मैंने
नम्रता से उत्तर दिया, 'नही, मेहरबानी है, मैं खाकर आया हूँ।' पंडितजी खाते-
खाते मेरे साथ बातचीत करते रहे। कम-से-कम डेढ घण्टे तो अवश्य बातचीत
हुई होगी । मैं पंडितजी को क्रान्तिकारी आन्दोलन की आवश्यकता और उसकी
सफलता के बारे मे विश्वास दिलाना चाहता था ।
प० जवाहरलालजी से जब मेरी बातचीत हो रही थी और मैं पंडितजी के
चेहरे की तरफ देखता था तो मुझे ऐसा अनुभव होता था कि मानो मैं एक अर्वा-
चीन अल्प बुद्धि बहका हुआ सरल लेकिन नासमझ युवक हूँ और पंडितजी मानो
निहायत कृपापूर्वक मेरे साथ बैठकर कुछ समय नष्ट कर रहे हैं। कुछ इस तौर