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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 276, कुल 408 में से

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पृष्ठ 276

274 / बन्दी जीवन

पर कि विचारा एक सरल बहका हुआ युवक आया है, कुछ कहना चाहता है, क्या
करें, कुछ तो समय देना ही पड़ेगा। अच्छा कहो, सुनते हैं। नाश्ते का समय है
यों ही सही । लेकिन जैसे-जैसे बातचीत होने लगी वैसे-वैसे ही क्रमशः उनका
निःस्पृह उदासीन भाव चला गया और अपने पक्ष को लेकर पंडितजी ने भी वैसे
ही गम्भीरतापूर्वक तर्क किया जैसा मैंने अपने पक्ष को लेकर आन्तरिकता के साथ
उन्हें समझाना चाहा। पंडितजी ने बहुत शान्तिपूर्वक किसी बात को न छिपाकर
अपनी बात को निहायत स्पष्ट शब्दों में मेरे सामने रख दिया। पंडितजी का
कहना था कि आधुनिक काल में सुप्रतिष्ठित किसी भी राष्ट्र के विरुद्ध वहाँ की
प्रजा के लिए सशस्त्र क्रान्ति करना असम्भव है। मैंने रूस और जर्मनी का दृष्टान्त
दिया और कहा कि आधुनिक काल में इन देशों में सशस्त्र क्रान्ति सम्भव हुई है।
पंडितजी ने मुझे समझाना चाहा कि गुप्त रीति से षड्यन्त्र के मार्ग को ग्रहण करने
पर हम कभी भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकेंगे कारण एक तो हमें इस मार्ग में
बहुत थोड़े आदमी मिलेंगे और दूसरे यह कि जो आदमी मिलेंगे भी उनमें से
हमेशा मुखबिर पैदा होंगे। इन मुखबिरों की वजह से संगठन का कोई काम
पूर्ण नहीं हो पाएगा। हम लोग गुप्त रीति से षड्यन्त्र रचेंगे। थोड़े दिनों में सब
बातें खुल जाएँगी। जेलखाने तथा फाँसी के तख्तों पर हम लोगों की जानें
जाएँगी और इस मार्ग से हम लोग कुछ भी नहीं कर पाएँगे। मैंने उनकी यह बात
स्वीकार कर ली कि गुप्त रीति से काम करने पर मुखबिर तो अवश्य पैदा होंगे
और इन मुखबिरों के मारे बार-बार हमारा संगठन टूट जायगा और बार-
बार हमारे आदमी कालेपानी में तथा फाँसी के तख्तों पर जानें देंगे। तथापि
बार-बार क्रान्तिकारी संगठन पुनः तैयार होगा और हर बार यह संगठन पहले
की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली एवं व्यापक बनता जायगा और फाँसी के तख्तों
पर तथा कालेपानी में जीवन विसर्जन करने के परिणामतः देश-भर में लोगों के
दिलों में त्याग की भावना फैलेगी। प्राणों का मोह कटेगा, साहस एवं दृढ़ता
बढ़ेगी, एवं सर्वोपरि क्रान्ति की भावना अव्यर्थरूप में देश-भर में प्रसार-लाभ
करेगी। मैंने उनसे यह भी कहा कि पहले पहल तो बंगाल में ही एक गुप्त षड्यन्त्र
रचा गया। लेकिन इस क्रान्तिकारी षड्यन्त्र के मामले के परिणाम में क्रान्ति
की लहर बंगाल से लेकर पंजाब तक फैल गई। एक षड्यन्त्र के मामले के स्थान
पर प्रतिवर्ष बीसियों षड्यन्त्र मामले चले एवं दिन ब दिन यह षड्यन्त्रकारी दल
क्रमशः बढ़ता ही गया, घटा नही। जितनी फाँसियां हुईं, जितनी कालेपानी की
सजाएँ हुईं उतने ही प्रबल रूप में क्रान्ति की भावना देश-भर में फैली। फाँसी
या मुखबिरों के कारण क्रान्तिकारी आन्दोलन दबा नहीं बल्कि बढ़ता ही गया।
मुखबिरों के बारे मे सच बात तो यह है कि हम लोगों का काम जितना बढ़ेगा
उतने ही बड़े बड़े मुखबिर भी पैदा होंगे। तभी तो हम लोगों का काम थोड़े
पैमाने में हो रहा है इसलिए अभी जो मुखबिर पैदा होंगे उनसे हमारी हानि थोड़ी
ही होगी। लेकिन जैसे-जैसे हमारा काम अधिक व्यापक एवं प्रचंड होता जायगा