बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
क्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन / 261
हम किसी की कोई सहायता नही कर सकते हैं और न ऐसा करना सम्भव ही है।
इसलिए डकैती के रुपये सदस्यों में बाँट दिए जाते हैं। और इस प्रकार से सहा-
यता देने पर अपने दल का संगठन कार्य बहुत सहज हो जाता है। स्वामीजी की
सब बातें सुनकर मैंने नम्रतापूर्वक उनमे निवेदन किया कि ऐसी सस्था के साथ
हम लोग कोई सम्बन्ध नही रखना चाहते है। मैने बता दिया कि हम लोगो का
क्रान्तिकारी आन्दोलन दूसरे प्रकार के सिद्धान्तो पर प्रतिष्ठित है। हम लोग
पुरस्कार के आधार पर सगठन-कार्य नही करते। यहाँ तो सर्वस्व खोने का प्रण
करके कार्यक्षेत्र में अवतीर्ण होना पडता है। यहाँ तो व्यक्ति गत चरित्र एव समाज
सेवा के मार्ग से नये आन्दोलन की सृष्टि करना हमारा काम है। समय आने पर
केवल मात्र सिपाहियो की आवश्यकता होगी तब हम लोग पुरस्कार की बात
सोचेगे। अभी तो हम लोगो का काम है सर्वस्व त्यागी नौजवानो की टोली तैयार
करना। जब समग्र भारतवर्ष मे ऐसी टोली बन जाएगी तब हम लोग दूसरे काम
के बारे मे सोचेगे। मुझे इस बात पर बहुत आश्चर्य हुआ कि उन नवीन सन्यासी
महोदय ने मेरे साथ प्रचड तर्क किया यह प्रमाणित करने के लिए उनके सिद्धान्त
हम लोगो के सिद्धान्त से कही अधिक कार्यकारी और समयोपयोगी है। सन्यासी
जी चाहते थे हम सब उनके साथ मिलकर एक विराट् क्रान्तिकारी दल बनावे।
मुझे इस बात से बहुत आश्चर्य हुआ कि हमारे साथी श्री छेदालालजी भी कुछ हद
तक सन्यासीजी की बातो का समर्थन करते थे। मैने यह तो नही कहा कि पेशे-
वर डकैतो के साथ हम लोगो का कोई सम्बन्ध नही रह सकता लेकिन मैंने स्वामी
जी को यह अच्छी तरह समझा दिया कि हम दोनो के सिद्धान्तो मे आकाश-पाताल
का अन्तर है। हम दोनो के दल एक साथ काम नही कर सकते। स्वामीजी अन्त
मे कुछ होश मे आकर यह कहकर चल दिए कि आप लोग कुछ भी नही कर
पाएँगे। मैने मुस्कराकर नम्रता के साथ उन्हे विदा किया। फिर श्री छेदालाल
को भी क्रान्तिकारी आन्दोलन के बारे मे बहुत कुछ कहा और समझा दिया कि
किसी भी अवस्था मे हमे मामूली डाकुओ को अपने साथ नही लेना है। हमे
भूलना उचित नही है कितने बडे ध्येय को सामने रखकर समाज मे नये सिरे से
जान लाने के लिए हम लोग कार्यक्षेत्र मे अवतीर्ण हुए हैं।
इसी समय किसी विश्वस्त सूत्र से मुझे पता चला कि यू० पी० मे फिर एक
क्रान्तिकारी षड्यन्त्र का मामला चलने वाला है और मुझे भी षड्यन्त्र मे घसीटा
जाएगा। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। अभी तो मुश्किल से सालभर ही काम किया
होगा। इतने मे ही फिर षड्यन्त्र का मामला चलने वाला है। मुझे अपने आदमियो
मे से किसी-किसी पर कुछ सन्देह होने लगा। गुप्त रीति से काम मे यह एक बड़ा
भारी दोष है कि जरा-सी बात से ही अपने विश्वस्त आदमियों पर भी सन्देह
उत्पन्न हो जाता है। मुझे इस खबर पर कुछ सन्देह हुआ, कुछ डर भी हुआ।
इस अवस्था मे मैंने यह उचित समझा कि अब घर मे नही रहना चाहिए। जाने
खबर सच है या झूठ फिर भी उचित यही है कि सावधानी से काम लिया जाय।
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मैं भी श्री छेदालाल और श्री बनवारीलाल के साथ रहने लग गया, अवसर देख-
कर घर ही में भोजन कर आता था, क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि दल का खर्च
अनावश्यक रूप से बढ़ जाय ।
मुझे इस समय ठीक स्मरण नहीं है, संभव है, इसी के कुछ पहले निजी सांसा-
रिक कारणों से कुछ अर्थोपार्जन की भावना से मैं व्यस्त हो उठा था। मुझे
सैण्ड्स साहब की बातें याद आईं। सैण्ड्स साहब ने मुझे अण्डमन से लौटते ही
कह दिया था कि यदि भविष्य में कभी भी किसी सहायता की आवश्यकता
अनुभव करो तो मुझसे कह देना। मुझसे बन पड़ा तो मैं अवश्य ही तुम्हारी सहायता
करूँगा। इस बात को ध्यान मे रखते हुए मैंने सैण्ड्स साहबे के पास एक चिट्ठी
भेजी। सैण्ड्स साहब उस समय सी० आई० डी० (C. I. D.) से अलग होकर
मामूली पुलिस विभाग में डी० आई० जी० आफ पुलिस (D.I.G. of Police)
थे इनसे मैं अण्डमन से लौटते ही फैजाबाद में मिला था। सैण्ड्स साहब ने पत्रोत्तर
मे मुझको लिखा अमुक तारीख को मैं बनारस जाऊंगा और उस समय मुझसे
मुलाकात करो। मेरे पीछे सदा सर्वदा खुफिया पुलिस के सिपाही लगे रहते थे।
जिस समय मैं दल के काम से जाता था तो इनकी दृष्टि बचाकर मैं अक्सर खिसक
जाया करता था। लेकिन जब निर्दोष काम में कही जाता था तो मुझे इस बात
की परवाह नही रहती थी कि खुफिया पुलिस के आदमी मेरा पीछा कर रहे हैं।
बनारस मे सैण्ड्स साहब से मिला। सैण्ड्स साहब जानना चाहते थे कि मैं किसी
विभाग मे कितनी तनख्वाह पर काम कर सकता हूँ। कोई विशेष जगह कही पर
खाली हो तो मैं उन्हें बताऊँ। यदि उनका कोई हाथ रहता है तो वह अवश्य मेरी
मदद करेगे। मैने उन्हें बताया कि किसी विशेष जगह के बारे मे मैं नहीं जानता
इत्यादि। सैण्ड्स साहब ने बाद को मुझसे यह कहा कि जैसी परिस्थिति होगी
और मैं जो कुछ सहायता दे सकूँगा इसके बारे में मैं पत्र द्वारा तुम्हें सूचना दूंगा।
कुछ दिन बाद मेरे पास उनका एक पत्र आया जिसमे लिखा था कि मुझे एक
अच्छी जगह दी जा सकती है। करीब एक सौ रुपया तनख्वाह भी मुझे मिल
सकती है। लेकिन मुझे एक शर्त स्वीकार करनी पड़ेगी कि भविष्य में जब तक मैं
इस मुलाजमत मे रहूँगा तब तक किसी प्रकार के भी राजनैतिक आन्दोलन मे
भाग नही लूँगा। सैण्ड्स साहब ने यह भी आशा दिलाई थी कि मुझे बहुत अच्छे
डिपार्टमेन्ट में काम दिया जाएगा जिससे भविष्य में मेरे लिए बहुत उन्नति का
मार्ग खुला रहेगा। मैंने देखा कि मुझे एक अच्छा अवसर मिल रहा है लेकिन
किसी प्रकार की भी शर्त कबूल करने में मेरे दिल ने गवाही नही दी। मैंने सोचा
कि आजन्म कालेपानी की सजा से मैं जब मुक्त हुआ तो उस समय भी मैंने कोई
शर्त नही मानी थी। इस समय किसी प्रकार की शर्त मानना मेरे लिए उचित
नही होगा यद्यपि मैं यह देख रहा था कि सैण्ड्स साहब के प्रस्ताव में एक बहुत
ही न्याययुक्त बात यह थी कि जितने दिन तक मैं मुलाजमत में रहूँ उतने दिन
तक किसी प्रकार के राजनैतिक आन्दोलन में भाग न लूँ। मैंने सैण्ड्स साहब को
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एक पत्र भेजा और उसमें बहुत नम्रता के साथ यह लिखा कि "सैण्ड्स साहब
आपने एक सच्चे अंग्रेज (Englishman) की हैसियत से जो उदारता दिखलाई
है उसके लिए मैं जन्म-भर आपका कृतज्ञ रहूँगा । लेकिन बहुत दुख के साथ यह
कहना पड़ता है कि अण्डमन से छूटते समय भी जब मैंने कोई शर्तें स्वीकार नहीं
की है तो मेरे लिए उचित है कि अब भी मैं कोई शर्तें स्वीकार न करूँ । लेकिन
सरकारी मुलाजमत जब मैं स्वीकार करता हूँ तो उसका अर्थ यह होता ही है कि
सरकारी क़ायदे-क़ानून को भी मैं स्वीकार करता हूँ । इसके अतिरिक्त मैं और
कोई शर्तें कबूल करना उचित नहीं समझता ।" इस पत्र का कोई उत्तर मुझे नहीं
मिला और मिलना आवश्यक भी नहीं था। जब मैं बाल-बच्चों को साथ लेकर
घरबार छोड़कर फरार हो गया था उस समय भी सैण्ड्स साहब की चिट्ठी आदि
मेरे पास थी । लेकिन मेरी गिरफ्तारी के बाद ये सब चीजें एवं और भी बहुतेरे
आवश्यकीय कागजात—पत्र एवं मेरी बहुत-सी किताबें—जाने कितनी जगह
घूमघाम कर आज सब-के-सब खो गए हैं।
मुझे ठीक याद नही है, सम्भव है, थोड़े दिन श्री छेदालाल और श्री बनवारी-
लाल के साथ रहकर जब मैंने देखा कि पुलिस की तरफ से कोई विशेष उत्पात
की सम्भावना नहीं है तो मैं भी ढीला पड़ गया ।
श्री छेदालालजी के साथ संगठन-कार्य के सिलसिले में मैं फतेहगढ़ गया हुआ
था। शहर के कुछ हिस्सों में एवं देहात में भी जाना पड़ा था। हमारे संगठन-कार्य
का यह तरीका था कि जितनी जगहों में हो सके उतनी जगहों में दृढ़ चित्त कर्त्तव्य-
परायण त्यागी साहसी युवकों को बैठाया जाय। इन्हीं को केन्द्र करके क्रमशः एक
विराट् दल संगठित हो जाता है। गांव और शहर से वापस आकर गंगाजी के
किनारे सुस्ता रहे थे। थोड़ी देर में गगाजी के किनारे-किनारे घाट-घाट घूमना
प्रारम्भ किया और यह देखना चाहा कि कोई ऐसा स्थान मिलता है या नहीं
जहाँ पर मनुष्य विदेश से आकर टिक सकता है। उस समय फतेहगढ़ जिले के
'साध' नामक कौम के पुरुष और स्त्री बहुत संख्या में एकत्र हुए थे । बैलगाड़ी में
लदकर परिवार के परिवार चले आ रहे थे। इनको देखने से मालूम पड़ता था
कि ये लोग बड़े सुखी हैं निर्द्वन्द्व हैं। इनमे अधिकांश स्त्रियाँ थी । ये अधिक पर्दा
नही करती थीं । निःसंकोच होकर गंगाजी में नहाती थी, किनारे पर आकर
खाती-पीती थी । टोलियों में बैठकर संसार की सुख-दुख की बातें करती थी ।
कभी-कभी कुछ स्त्री-पुरुष एक टोली से दूसरी टोली में आते-जाते थे । सुनने में
आया कि अब 'साध' लोग बड़े अमीर होते हैं। और इनका पेशा है व्यापार करना ।
दिनान्त में कुछ बैलगाड़ी में लदकर और कुछ पैदल घर को वापस आते थे ।
उस समय मालूम होता था मानो किसी मेला से सब लौट रहे हैं। हम एक घाट
से दूसरे घाट को जा रहे थे और इधर-उधर तीक्ष्ण दृष्टि से देखते जा रहे थे कि
इस मेले के सदृश आदमियों की भीड़ में बुड्ढों, औरतों और बाल-बच्चों को
छोड़कर नौजवान भी यहाँ पर हैं या नहीं और यदि हैं तो वे शिक्षित हैं या नहीं।
सेल्यूलर जेल की अमानवीय यातनाएँ, भूख-हड़ताल एवं बन्दियों का संघर्ष
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अर्थात् मेरे लायक भी कोई युवक इस भीड मे मिल सकता है या नही यह भी मैं
देखता जा रहा था। एक दफा अचानक ही मैंने एक खुले कमरे के अन्दर एक
युवक को बैठकर किताब पढते हुए देखा । मेरा दिल उल्लसित हो उठा । मैं सीधा
उस कमरे के अन्दर चला गया । मेरे साथ मेरे दो-एक साथी भी कमरे के भीतर
चले आए । हम लोगो को देखकर वह नौजवान किताब की तरफ से अपनी दृष्टि
हटाकर हम लोगो की तरफ देखने लगा । मैंने उस नवयुवक की दो आँखो मे ऐसी
चीजे देखी जिससे मैने अनुमान किया कि यह युवक नितान्त निविष्ट चित्त होकर
अपनी किताब पढ रहा था । किताब की तरफ दृष्टि आकृष्ट होते ही मैंने देखा कि वह
एक अग्रेजी किताब थी । मैंने उस युवक से क्षमा प्रार्थना करते हुए कहा कि इस
स्थान पर एक नवयुवक को दत्तचित्त होकर किताब पढते हुए देखकर हम लोग
आकृष्ट हुए है और इसलिए आपके पास आए हैं। युवक ने सहृदयता के साथ हम
लोगो को अपने तख्त पर बैठाया । यह बिचारा भी तो नितान्त अकेला ही था ।
मनुष्य समागम से वह युवक कुछ असन्तुष्ट हुआ हो ऐसा मालूम नही पडा ।
अग्रेजी किताब को उठाकर मैंने देखा वह भारतीय इतिहास पर परजिटर साहब
का आधुनिकतम ग्रन्थ था । भारतीय इतिहास पर युवक से बातचीत होने लगी ।
इस प्रकार कुछ देर तक बातचीत होने के बाद यह मालूम हुआ कि उस युवक की
एक बहन श्रीमती पार्वतीदेवी सत्याग्रह आन्दोलन के सिलसिले मे राजद्रोहात्मक
भाषण देने के कारण दो साल की कडी कैद की सजा फतेहगढ की सेण्ट्रल जेल मे
भुगत रही है । अपनी बहन से मिलने के लिए वह युवक फतेहगढ आया
क्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन / 265
खूब बातचीत हुई। जयचन्द्रजी को जब मालूम हुआ कि मैं अण्डमन गया हुआ था
और क़रीब चार साल तक वहाँ पर रहा तो वह मेरे प्रति बहुत आकृष्ट हो गए।
उन्होंने बतलाया कि फतेहगढ़ से वह इलाहाबाद आएंगे। उस समय 'बन्दी जीवन
नामक मेरी पुस्तक छप चुकी थी। मैं चाहता था कि जयचन्द्रजी मेरी किताब
पढ़ें। किताब मेरे पास नही थी। इसलिए तथा जयचन्द्रजी से बातचीत और
आगे बढ़ाने के लिए यह तय पाया कि इलाहाबाद मे राष्ट्रीय स्कूल मे जयचन्द्रजी
से मेरी फिर मुलाकात होगी। इलाहाबाद मे फिर मुलाकात हुई। 'बन्दी जीवन'
पढकर जयचन्द्रजी अत्यन्त प्रभावित हुए। इस प्रकार से जयचन्द्रजी हमारे दल
मे सम्मिलित हुए। उन्होने मुझे लाहौर बुलाया। मैं लाहौर गया। अध्यापक
जयचन्द्रजी के मकान मे ही अतिथि हुआ। लाहौर मे मैं कुछ नौजवानो से परि-
चित हुआ। इन नौजवानो मे एक का नाम था सरदार भगतसिंह। लाहौर के
नौजवानो मे से कोई तो रावलपिंडी का रहनेवाला था कोई था गुजरानवाला
का, कोई था गुरदासपुर का और कोई होशियारपुर का। ये सब लाजपतराय के
प्रतिष्ठित 'तिलक स्कूल आफ पालिटिक्स' के छात्र थे। एक-एक करके इन सब
नवयुवको से देर तक बातचीत होती रही। सशस्त्र क्रान्ति के मार्ग को छोड़कर
भारतवर्ष कभी भी स्वाधीन नही हो सकता, और सशस्त्र क्रान्ति होना निश्चय ही
सम्भव है, इन सब बातो पर विशेष रूप से ज़ोर देते हुए और पिछले क्रान्ति युग
के इतिहास को बतलाते हुए मैंने इन सब नवयुवको को क्रान्ति मार्ग में दीक्षित
किया।
लाहौर मे हम लोगो के एक बहुत पुराने साथी थे श्री केदारनाथजी सहगल ।
इनसे भी मैं मिलने गया। ये व्यक्ति बारहो महीना, तीसो दिन, हर घडी सिर से
पैर तक काले कपडे पहने रहते थे। भारतवर्ष जब तक स्वाधीन नही होता है तब
तक इनका प्रण था कि सफेद कपडा नही पहनेंगे।
श्री केदारनाथ के यहाँ और भी पुराने साथियो के साथ बातचीत हुई ।
श्री केदारनाथ और ये सब दूसरे पुराने साथी काम करने के लिए आगे नही बढे।
श्री केदारनाथजी के जरिये यह मालूम हुआ कि पहले लाहौर षड्यन्त्र केस के
श्री पृथ्वीसिंहजी के साथ उनका कुछ सम्बन्ध है। मैने बार-बार आन्तरिक चेष्टा
की कि पृथ्बीसिंहजी से मेरी मुलाकात हो जाय लेकिन मेरे दुर्भाग्य से उनसे मुला-
कात नही हो सकी।
इस वक्त मुझे ठीक से याद नही है, यदि उस समय के सवादपत्रो आदि मे
सहायता ली जाय तो सम्भव है, सिलसिले को ठीक रखते हुए सब बाते मै बता
सकूँ। इस समय कुछ आगे की बाते पीछे कह रहा हूँ या पीछे की बात आगे बता
रहा हूँ या नही इसके बारे मे कुछ निश्चयपूर्वक मैं कह नही सकता। जिस समय
नाभा मे अकालियो का सत्याग्रह हो रहा था उस समय मैं अमृतसर आया हुआ
था। सम्भवतः जयचन्द्रजी से मिलकर मैं सीधा अमृतसर आया था। सिक्खों का
जो महान् दृश्य उस समय मैंने देखा उसकी तुलना भारतवर्ष के किसी प्रान्त से
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भी नहीं हो सकती। नाभा में प्रतिदिन गोली चल रही थी। उसके मुकाबले में
प्रतिदिन सिक्ख जत्थे गोली का सामना करने के लिए नाभा जाते थे। पंजाब के
हरएक प्रान्त से किसान, मजदूर, छात्र, नौजवान, बूढ़े, प्रौढ़ हरएक प्रकार के
सिक्ख इन जत्थों में आ-आकर शामिल होते थे। मैंने स्वयं देखा है कि अमृतसर
में जब ये जत्थे पहुँचते थे तो बिलकुल सामरिक रीति से इन जत्थों का स्वागत
होता था। और इनकी कितनी ही माताएँ, बहनें, स्त्रियाँ इनसे आकर मिलती
थीं। अपने प्रेम से, अपनी उमंग से, हृदय के अन्तस्तल से ये माताएँ, बहनें और
स्त्रियाँ इन सिक्खों के गलों में प्रीति के, स्नेहाशीर्वाद के, मंगल कामना के प्रतीक-
स्वरूप मालाएँ पहनाती थीं। अमृतसर मे एक तरफ रसद का इंतजाम था, अस्प-
ताल की व्यवस्था थी। नाभा से चोट खाए कितने व्यक्ति इन अस्पतालो मे
आकर आश्रय लेते थे। एक अस्त्र को छोड़कर और सब बातो में पूरी लडाई की
तैयारी थी। इन सिक्खों के पीछे महात्माजी का आशीर्वाद नहीं था, इस सिक्ख
आन्दोलन के पीछे कांग्रेस की प्रेस्टीज भी नहीं थी। कांग्रेस का कोई भी गण्यमान्य
नेता इस सिक्ख आन्दोलन के साथ नहीं था। लेकिन एक बात अवश्य थी जिसे
स्वीकार करना पडेगा कि सिक्ख लोग अपने नेतृत्व मे अपनी क़ौम के लिए जैसा
असाध्य साधन करके दिखला सकते हैं, दूसरी क़ौम के साथ मिलकर, अखिल
भारतवर्षीय आन्दोलन में उस आन्तरिकता के साथ वे वैसा नही करते।
इस अवसर पर एक सर्वमान्य सिक्ख नेता के साथ मेरी खूब बातचीत हुई
थी। उसका नाम यहाँ पर उल्लेख करना कदापि उचित नही होगा। जिस दिन
भारत स्वाधीन हो जाएगा उस दिन उनका नाम प्रकाशित किया जा सकता है। इस
नेता ने बहुत आन्तरिकता के साथ मेरे पास एक प्रस्ताव किया था। उन्होने यह
बतलाया था कि सिख आन्दोलन अब ऐसी स्थिति पर आ पहुँचा है कि अब यह
आन्दोलन आगे चलाना प्रायः असम्भव-सा हो गया है। सिक्खों के खेती का काम
नष्टप्राय हो चला है। उनके सब व्यापार एवं काम-धंधे चौपट हो चुके हैं। सरकार
से समझौते का भी कोई लक्षण नही दिखलाई देता। सिक्खो के गुरुद्वारा आन्दोलन
का परिणाम क्या होगा, यह कहना बहुत ही कठिन हो गया है। ऐसी परिस्थिति
में यदि प्रचण्ड रूप से आतंकवाद की सृष्टि की जा सके तो बहुत सम्भव है कि
सरकार के ऊपर खूब दबाव पड़े। मैंने उन्हें यह आश्वासन दिलाया कि यदि कांग्रेस
के कुछ नेतागण इस बात का विरोध न करें तो जैसा आप कहते हैं हम वैसा ही
करेंगे। लेकिन हम यह नही चाहते है कि हमारे काम से कांग्रेस के आन्दोलन को
कुछ भी धक्का पहुँचे।
इसी समय एक और विशेष महत्वपूर्ण बात हुई। लाहौर षड्यन्त्र केस के एक
व्यक्ति सरदार गुरुमुखसिंह सरकार की हिरासत से भाग निकले थे। आपसे मेरी
पहली मुलाकात अण्डमन जेल में हुई थी। मेरे छूट जाने के बाद सरदार गुरुमुख
सिंह को भारत के जेल में वापस भेज दिया गया था। आपको मद्रास के एक जेल
से दूसरे जेल में ले जाया जा रहा था। पैरों में लोहे की बेड़ी थी लेकिन इनके
•क्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन / 267
दुर्लभ साहस को ले देखिए कि चलती ट्रेन से मौका देखकर सरदार गुरुमुखसिंह
अन्धकार में कूद पड़े । पुलिस गफलत में पड़ी रही सरदार गुरुमुखसिंह उन्मत्त
उत्ताल तरंग समाकीर्ण जीवन समुद्र में अदृश्य हो गए । किस प्रकार से बाद को
बह अपनी बेड़ी से मुक्त हुए, एवं कैसे किधर गए इसका पूर्ण वर्णन मैंने 'विचार
विनिमय' नामक अपनी पुस्तक में किया है। इसलिए इस बात को यहाँ पर दुहराने
की कोई आवश्यकता नही है । लाहौर के सर्वमान्य नेता के साथ बातचीत करने
के पश्चात् मुझे पता चला कि सरदार गुरुमुखसिंह भी इस समय अमृतसर में
उपस्थित है; और फिर मै उनसे मिलने गया ।
अमृतसर गुरुद्वारा के पास ही एक गली में एक छोटे-से मकान में आ पहुँचा ।
नीचे दुकानें थी, ऊपर सरदार गुरुमुखसिंह रहते थे । अकाली आन्दोलन के सर्व-
मान्य नेता भी मेरे साथ इस स्थान पर आए थे। सन् 1920 में सरदार गुरुमुखसिंह
को अण्डमन में छोडकर आया था। इतने दिन के बाद फिर फरार हालत में सरदार
गुरुमुखसिंह से मिलकर विचित्र आनन्द का अनुभव कर रहा था । एक तरफ
साम्राज्य की तमाम शक्ति विप्लववादियों को कुचलने के लिए निर्मम रूप से लगी
हुई है दूसरी तरफ अज्ञात कुलशील असहाय सम्पदहीन होते हुए भी आत्मविश्वास
के कारण ही अपने आदर्श में अविचलित श्रद्धा रखने के कारण ही, विप्लववादी
जीवन की बाजी लगाकर असंख्य बाधाओं का सामना करते हुए भी कैसी निष्ठा
के साथ अपनेकाम में कैसे निर्भीक होकर उत्साह के साथ लगे हुए हैं। एक और विशेष
महत्त्वपूर्ण बात ध्यान में रखने की यह है कि अकाली आन्दोलन एक प्रकाश्यजन-
आन्दोलन था, वह आन्दोलन सशस्त्र क्रान्तिकारी आन्दोलन न था । उस आन्दोलन
के नेतागण भी क्रान्तिकारी नही थे । लेकिन इम आन्दोलन के नेतागण अहिंसा
नीति को आसमान पर नही चढ़ाते थे । जैसी परिस्थिति थी उसी के अनुकूल वाता-
वरण में जन-आन्दोलन को जिस प्रकार से निर्भीक रूप मे चलाया जा रहा था
उसी प्रकार से भारत के दूसरे राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रति अकाली आन्दोलन के
नेतागण उदासीन न रहकर उसके प्रति अपनी स्पष्ट सहानुभूति की अविचलित
स्वर मे घोषणा करने मे हिचकते नही थे । इसीलिए सशस्त्र क्रान्तिकारी आन्दोलन-
कारियों के प्रति अकाली आन्दोलन के नेतागणों ने कोई भी असम्मानसूचक अथवा
निरुत्साह-व्यंजक शब्दों का व्यवहार नहीं किया । अपनी काफ्रेंस मे अकालियों ने
स्पष्ट शब्दों में यह घोषणा की कि अभी क्रान्ति का समय नही आया है, इसलिए
हम मलाह देते हैं कि जो वीर और त्यागी नवयुवकगण क्रान्तिकारी कार्य मे लगे
हुए हैं वे अपने कार्य से विरत हों । उनकी वीरता, उनका त्याग, उनका साहस
सराहनीय है । लेकिन उनके कार्य अभी समयोपयोगी नही हैं। इस मनोवृत्ति के
साथ यदि हम कांग्रेस के नेतागणों की मनोवृत्ति की तुलना करते हैं तो मन में
ऐसा लगता है कि ये लोग विशेष करके महात्माजी और उनके अनुयायीगण मानो
क्रान्तिकारियों को अपना और अपने देश का शत्रु समझते है। काग्रेस के प्लेट-
फार्म से, एवं सभापति के आसन से भी, ऐसे विषवत् वाक्यों के उद्गार किए जाते
268 / बन्दी जीवन
हैं जिससे देश में क्रूर एवं प्रबल दलबन्दी की भावना उत्पन्न होती है। ऐसा मालूम
पड़ता है कि इन नेताओं के दिल में क्रान्तिकारियों के प्रति एक उग्र कटुता-सी है।
कभी तो ये नेतागण क्रान्तिकारी आन्दोलन को उसे इफेंटाइल (Infantile) अर्थात्
बालकोचित कहकर निन्दा करते हैं और कभी क्रान्तिकारी आन्दोलन को फैसि-
स्टक कहकर अपनी जलन को शान्त करते हैं। और कभी ऐसा भी कह देते हैं कि
क्रान्तिकारियो ने देश की प्रगति को पचास साल पीछे हटा दिया है। यह भी
आक्षेप किया जाता है कि क्रान्तिकारीगण बलपूर्वक असहाय निर्दोष व्यक्तियो को
शहीद बना देते हैं। इस मनोवृत्ति के पीछे शान्त युक्ति नहीं है, इसके पीछे ऐति-
हासिक प्रेरणा भी नहीं है और सर्वोपरि इसके पीछे देश-हित की कल्याणमयी
कामना भी नहीं है। इसके पीछे केवल अहंकार का एक उग्र रूप विद्यमान है।
कांग्रेस के नेताओ ने भी सरलतापूर्वक आत्यन्तिक रूप से भारत की स्वाधीनता के
प्रश्न को न स्वीकार किया और न उसका विचार किया । जिस समय संसार का
प्रत्येक पराधीन राष्ट्र अपनी स्वाधीनता को प्राप्त करने के लिए बेचैन है, तड़प
रहा है, असाध्य साधन के लिए सर्वस्व विसर्जन करने को भी तैयार हो रहा है
एवं अद्भुत साहस और निष्ठा के साथ अपने ध्येय के पीछे लगा हुआ है, उस
समय भारतवर्ष के लब्ध-प्रतिष्ठित नेतागण अपने सामर्थ्य को अपने ध्यान में
रखते हुए ही भारतवासियों को रास्ता दिखाने की हिम्मत करते हैं और उनके
नेतृत्व में जो विश्वास नहीं करते हैं, ऐसे क्रान्तिकारियों के प्रति वे कटुतापूर्ण
उद्गार करते हैं। लेकिन जैसे अकाली नेतागण एक तरफ क्रान्तिकारियों के प्रति
सहानुभूति सूचक शब्द व्यवहार करते थे इसी प्रकार दूसरी तरफ अकाली नेतागण
सरदार गुरुमुखसिंह जैसे विद्रोहियों का छिपकर साथ देते थे और उनकी सहायता
भी करते थे।
सरदार गुरुमुखसिंह के कमरे में अकालियों के एक सर्वमान्य नेता थे। सलाह
हो रही थी कि आतंकवाद की सृष्टि करके अकाली आन्दोलन को सहायता
पहुँचाई जा सकती है या नहीं। मैं जानता था कि अपना दल अभी पूर्ण रीति से
संगठित नहीं हुआ है तथापि यह भी मैं जानता था कि दो-चार सरकारी अफसरों
को यम-धाम पहुँचाने के लिए जितनी शक्ति की आवश्यकता है उतनी शक्ति हमने
प्राप्त कर ली है। मैं यह भी जानता था कि आतंकवाद के चक्कर में पड़कर
क्रान्तिकारी आन्दोलन को काफी धक्का लग सकता है। मैं यह भी खूब जानता
था कि आतंकवाद के द्वारा कभी भी देश को स्वाधीन नहीं किया जा सकता।
लेकिन देशवासियों की सहानुभूति आकृष्ट करने के लिए जनान्दोलन के नेतागणों
की सहायता पाने के लिए हम लोगों को बार-बार आतंकवाद के चक्कर में पड़ना
पड़ा है। इस पहलू को विचार-विनिमय नामक अपनी पुस्तक में पाठकों के सामने
रखना मैं भूल गया हूँ। भारत के आतंकवाद के मूल में यह भी एक प्रबल बात थी
कि बहुत-से धनी व्यक्ति क्रान्तिकारियों को सहायता देने के लिए इस शर्त पर
तैयार हो जाते थे कि क्रूर अत्याचारी राजपुरुषों को समाप्त कर दिया जाय।
क्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन / 269
बारीन्द्र ने इस बात को प्रकाश्य रूप में स्वीकार किया है। पंजाब में भी अकाली
नेता की मनोवृत्ति को देखकर वही बंगाल की बात याद आती है। सरदार
गुरुमुखसिंह के कमरे में बैठकर यह तय हुआ कि भारत के बड़े लाट के ऊपर बम
और पिस्तौल से हमला किया जाय। उस समय सरदार गुरुमुखसिंह भी पंजाब में
बोलशेविक नीति पर एक दल के संगठन कार्य में लगे हुए थे। लेकिन उनके दल
में यह सामर्थ्य न थी कि लाट साहब के ऊपर आक्रमण का कोई इन्तजाम कर सके।
जैसा मैं पहले बता चुका हूँ मैंने युक्त प्रान्त में एक छोटा-सा दल खड़ा कर लिया
था। मैंने इन लोगों से वादा किया कि बंगाल के देशबन्धु सी० आर० दास से
सलाह करने के बाद ही मैं यह बता सकता हूँ कि लाट साहब के ऊपर हमले का
दायित्व मैं ले सकता हूँ या नही। पंजाब के नेताओं को मैंने स्पष्ट शब्दों में समझा
दिया कि हम ऐसा कोई काम करना नहीं चाहते जिससे जन-आन्दोलन को कोई
धक्का पहुँचे। महात्मा गांधी से बंगाल के कुछ क्रान्तिकारियों ने वादा किया था
कि सालभर महात्माजी के कार्य में वे लोग बाधा नहीं देंगे। मैंने अपने दिल में
यह आशा बांधी थी कि देशबन्धु सी० आर० दास और उनके ऐसे दूसरे कांग्रेसी
नेताओ को विप्लव आन्दोलन के प्रति सक्रिय रूप में आकृष्ट करूँगा। इस मनोवृत्ति
के कारण मैं यह नही चाहता था कि सी० आर० दास की इच्छा के विरुद्ध आतंक-
वाद की सृष्टि की जाय। मुझे ऐसा भी मालूम था कि अभी थोडे दिन पहले ही
सी० आर० दास में और ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधि में राजनीतिक मामलों के
बारे मे कुछ समझौते की बातचीत चल रही थी। अकाली नेता एवं गुरुमुखसिंह ने
मेरे दृष्टिकोण का समर्थन किया।
कहाँ पर लाट साहब के ऊपर हमला किया जाय इस पर भी विचार हुआ।
पाठक सुनकर हैरान हो जाएँगे कि सिख आन्दोलन इतना व्यापक एवं गम्भीर हो
चुका था कि बड़े-से-बड़े सिख अफ़सर भी इस आन्दोलन को हर प्रकार से
सहायता देने के लिए तैयार हो गए थे। गुरुमुखसिंह के कमरे में जो सिख अफ़सर
मौजूद था उसने मुझसे कहा कि शिमला मे ही हमला हो सकता है। और लाट
साहब के चलने-फिरने के बारे मे एक घण्टे की खबर हमको दी जा सकती है। मैं
शिमला के बारे मे थोड़ा-बहुत परिचित था क्योकि मैं एक साल तक शिमला में
रह चुका था। मै जानता था कि शिमला से बाहर निकल जाने के लिए सैकड़ों
रास्ते है। शिमला मे मेरे आने-जाने का इन्तजाम होने लगा।
एक और विशेष महत्वपूर्ण बात यहाँ बता देना अप्रासंगिक न होगा। मुझे
एक तार की नकल दिखलाई गई। यह तार जंगी लाट की तरफ से नाभा के जंगी
अफसर के पास जा रहा था। यह तार संकेत मे लिखा हुआ था। मुझसे कहा
गया कि मैं इस तार का मर्मोद्घाटन करूँ। मैने देखा हजार की संख्या मे (एकाई-
दहाई सैकड़ा हजार ऐसे हजार की संख्या मे) कई एक अंक तीन लम्बी-लम्बी
कतारों में सजाये हुए हैं –अर्थात् मान लीजिए कि ऐसा है : पहले 4516 लिखा
हुआ है, उसके नीचे 3721 लिखा है और उसके नीचे 7528 लिखा है इसी प्रकार
270 / बन्दी जीवन
से तीन लम्बी-लम्बी कतारों में ऐसे आंकड़े सजाये हुए हैं। ऐसा गोपनीय तार भी
सिख अफ़सर ने तार घर से नकल करके विप्लववादियों के हाथ में लाकर रख
दिया है। मैंने इन्हें समझाया कि इस तार के अर्थ को समझने के लिए कई महीनों
'तक परिश्रम करना पड़ेगा। फिर संकेत विज्ञान से भी खूब परिचित रहना नितांत
आवश्यक है। और मैं ऐसा परिचित नहीं हूँ। मैंने यह भी बतलाया था कि हम
लोगों के सांकेतिक चिह्न आज भी सी० आई० डी० वाले समझ नहीं पाए हैं।
हम लोगों के एक साथी श्री विनायक राव कापले के मृत-शरीर के साथ एक
चिट्ठी भी पाई गई थी। उस चिट्ठी में कुछ सांकेतिक चिह्न थे आज भी
सी० आई० डी० वाले इन चिह्नों का अर्थ समझ नहीं पाए हैं। तार की नकल तो
और बात रही लाटसाहब के दफ़्तर से नाभा के सम्बन्ध में पूरी फाइल-की-फाइल
(कागजात) अकालियों ने ग़ायब करा दी। इसका नाम है जन-आन्दोलन,
इसको कहते हैं क़ौम की प्रीति ! सिख लोग सरकारी नौकरी भी करते थे और
अपनी जाति की सेवा के लिए भी सब कुछ करने के लिए तैयार रहते थे। भारत-
वर्ष की दूसरी जातियों में इसकी तुलना मिलनी कठिन ही नहीं, असम्भव है।
अकाली नेता और सिख अफ़सर से मिलने के बाद सरदार गुरुमुखसिंह से
संगठन के बारे में बहुत बातचीत हुई। मुझे पता चला कि सरदार गुरुमुखसिंह
रूस होकर आए हैं, काबुल में भी इनके अड्डे मौजूद हैं। काबुल में पंजाब कौ
आने-जाने का विशेष उपाय निर्धारित है। गुरुमुखसिंहजी कई बार काबुल से
पजाब आए हैं और गए हैं। सरदार गुरुमुखसिंहजी बोलशेविकों के सिद्धान्त के
आधार पर सिखों में ही अपना संगठन करमा चाहते हैं। उनसे बातचीत करके
मैंने यह अनुभव किया कि सिखों को छोड़कर दूसरी किसी क़ौम के साथ मिलकर
अब ये लोग कुछ काम नहीं करना चाहते। मुझे बहुत दुःख हुआ। लेकिन मैं
समझ गया कि क्रान्तिकारी आन्दोलन में भी साम्प्रदायिकता का विष अपना
असर दिखाने लग गया है। मैंने यह खूब समझ लिया कि गुरुमुखसिंह अब मेरे
साथ मिलकर कोई काम नहीं करेंगे।
अमृतसर से मैं लाहोर लौट आया। भविष्य में गुरुमुखसिंह से सम्बन्ध क़ायम
रखने के लिए प्रयोजन कर लिया। अध्यापक जयचन्द्रजी को गुरुमुखसिंह के बारे
मे सब बातें बता दीं, लेकिन जहाँ तक मुझे आज याद है लाट साहब के ऊपर हमले
की बात इन्हें नहीं बताई।
इधर भगतसिंह से बातचीत करने पर मालूम पड़ा कि भगतसिंह के पिता
भगतसिंह की शादी कराने का तमाम आयोजन कर रहे हैं। मैंने खुद तो शादी
कर ली थी लेकिन मैं यह खूब अनुभव कर रहा था कि मैंने शादी करके बड़ी भारी
ग़लती की है। मैंने भगतसिंह को समझा दिया कि यदि शादी कर लोगे तो
भविष्य में क्रान्तिकारी आन्दोलन में तुम अधिक काम नही कर पाओगे। भगत-
सिंह शादी करना नहीं चाहते थे। मेरा यह एक नियम था कि दल के आदमी की
परीक्षा करने की गरज से मैं यह देखना चाहता था कि अपने दल का व्यक्ति त्याग
क्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन / 271
करने के लिए कहाँ तक तैयार है। हम लोग तो उसी को अपने दल का आदमी
समझते थे जो व्यक्ति हर घड़ी इस बात के लिए तैयार हो कि जब कभी कहा
जाय तभी घर-बार छोड़कर काम करने के लिए मैदान में उतर पड़े। इस नीति
के अनुसार मैंने भगतसिंह से कहा कि "क्या तुम घर-बार छोड़ने को तैयार हो।
यदि तुम शादी कर लोगे तो आगे चलकर अधिक काम करने की आशा तुमसे
नही रहेगी। और तुम यदि घर में रहते हो तो उन्हें शादी करनी पड़ेगी। मैं नहीं
चाहता कि तुम शादी करो। इसलिए मेरी इच्छा है कि तुम घर छोड़कर मैं जहाँ
कहूँ वहाँ रहने लग जाओ।" भगतसिंह घर छोड़ने के लिए तैयार हो गए। मैंने
एक दफा चाहा था कि सरदार किशनसिंह (भगतसिंह के पिताजी) से मिल मिला
लें। क्योंकि अतीत युग में सरदार किशनसिंह से हम लोगों का कुछ सम्बन्ध रहा
था। लेकिन भगतसिंह के घर से बाहर चले जाने की बात से मैंने यह निर्णय
किया कि सरदार किशनसिंह से नहीं मिलूंगा। मुझे यह याद है कि एक दफा एक
बंगले के सदृश मकान में मैं लाहौर शहर की बाहरी तरफ सरदार किशनसिंहजी
से मिला था, किस बार मिला था मुझे इस बात का स्मरण नहीं है। मेरे कहने
पर भगतसिंहजी घर छोड़कर युक्तप्रांत चले गए थे। पहले-पहल कानपुर में
मन्नीलालजी अवस्थी के मकान पर उनके रहने का इन्तजाम किया गया था।
10
श्री मोतीलालजी, जवाहरलालजी तथा
श्री सी० ऋार० दास से भेंट
इधर बंगाल की बातें कहने को बहुत कुछ रह गई हैं। जमशेदपुर के काम को
छोड़ देने के बाद और इलाहाबाद आने के पहले एवं इलाहाबाद से भी मैं कई
दफा कलकत्ता गया था। उसका विवरण देना अभी बाकी है।
पंजाब का समाचार लेकर के उस समय मैं बंगाल गया था। आज भी मुझे
यह ठीक-ठीक स्मरण है कि मैं देशबन्धु सी० आर० दास से कई बार मिला था
और पंजाब का संदेश लेकर उनसे बहुत बातचीत हुई थी। उसका सब वृतान्त
आज प्रकाश कर देने से किसी की भी कोई हानि नही है ऐसा मैं समझता हूँ।
इसके पहले पं० जवाहरलालजी से भी मेरी जो बातचीत हुई थी उसे भी यहाँ
लिख देना अप्रासंगिक नही होगा। विशेष करके पं० जवाहरलालजी ने अपनी
आपबीती (मेरी कहानी) में क्रान्तिकारी आन्दोलन के बारे में जगह-जगह पर
अपने बहुत कुछ मन्तव्य प्रकाशित किये हैं। जमशेदपुर के काम को छोड़ देने के
बाद इलाहाबाद मे मैंने पं० मोतीलालजी नेहरू एवं पं० जवाहरलालजी नेहरू से
मुलाकात की थी। उस समय पं० मोतीलालजी नेहरू स्वराज्य पार्टी बनाने में लगे
हुए थे। अभी तक देहली मे कांग्रेस का विशेष अधिवेशन नहीं हुआ था। मुझे
इस समय याद नही है कि गया में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन हो चुका था या
नही। मोतीलालजी से मैंने बहुत नम्रता एवं आन्तरिकता के साथ यह निवेदन
किया था कि कांग्रेस कार्यक्रम का यह एक प्रधान अंग होना चाहिए कि कांग्रेस
सदस्यों को लेकर जो संगठन हो उमका स्वरूप ऐसा होना आवश्यक है जैसा
आयरलैंड का 'शिनफीना' संगठन था अथवा जैसा यूरोप के अन्य देशों में राज-
नीतिक संगठन होते थे। यहाँ आवश्यकता पड़ने पर आदमियों की माँग की जाती
है और उस समय जाने कितने प्रकार के आदमी कितनी विभिन्न भावनाओं को
लेकर थोड़े दिन के लिए कांग्रेस के काम में भाग लेते हैं। लेकिन होना यह
चाहिए कि देश-सेवा के आदर्श को लेते हुए त्यागी मनुष्यों का ऐसा दल तैयार
हो जिसमें प्रत्येक व्यक्ति देश-सेवा के आदर्श को यथार्थ रूप में हृदयंगम करके
भ्रातृभाव से प्रणोदित होकर बहुकाल व्यापी त्याग का जीवन व्यतीत करने के लिए
तैयार हो। मेरे दिल में और भी बहुत-सी बातें थीं जिन्हें प्रकाश करने के पूर्व ही
श्री मोतीलालजी, जवाहरलालजी तथा श्री सी० आर० दास से भेंट / 273
पं० मोतीलालजी मेरे प्रस्ताव की हँसी उड़ाने लग गए। मैं पंडितजी को यह नहीं
समझा पाया कि फ्रांसीसी राज्य क्रान्ति के पहले फ्रांस में और विशेषकर पैरिस
में कितने राजनीतिक क्लबों की स्थापना हुई थी। पंडितजी ने मेरी बातों को पूरी
तरह से सुना भी नहीं और जब कभी अपने कामों से फुरसत पाते थे और मैं पास
होता था तो पंडितजी मेरी तरफ दृष्टि निक्षेप करके मुस्कराकर मुझसे पूछते थे,
"कहा मिस्टर सान्याल और कुछ ब्रिलियण्ट सजेशन हैं ?" मैं भी अपनी लज्जा
और झेंप को छिपाने के लिए कह दिया करता था, "जहाँ तो सभी ब्रिलियण्ट हैं
इन सब के सामने मैं क्या अपनी ब्रिलियन्सी दिखलाऊँ।" पं० मोतीलालजी से
तो इससे आगे बातचीत बढी नही । लेकिन पं० जवाहरलालजी से दो-तीन दिन
तक बहुत बातचीत हुई थी । यदि पडितजी की राय मेरी राय से मिल गई होती
तो आज ये सब बातें लिखने की आवश्यकता न होती। कारण उस अवस्था में
तो वे हमारे सहयोगी होने और अपने आदमियो की बात शत्रुओं के सामने
प्रकाशित कर देने का अर्थ होता है देशद्रोह करना । इसके अतिरिक्त पंडित
जवाहरलालजी ने अपनी आत्म-कहानी मे क्रान्तिकारियो के प्रति अपनी राय
व्यक्त करना उचित समझा है, तथा समय-समय पर भारत के राष्ट्रीय नेता की
हैसियत से क्रान्तिकारियो के बारे में उन्होंने बहुत-से वक्तव्य प्रकाशित किये हैं।
मैंने भी एक क्रान्तिकारी होने के नाते प० जवाहरलालजी से जो बातचीत की
थी राष्ट्रीय आन्दोलन के इतिहास मे उसका भी एक स्थान होना उचित है ऐसा
मैं समझता हूं। अण्डमन से लौटने के बाद राजनीतिक बन्दियो की मुक्ति के लिए
आन्दोलन मे उनसे सहायता पाने की इच्छा से एक दफा मैं प० जवाहरलालजी
से मिला था। इसका उल्लेख मैने पहले ही कर दिया है। इसलिए पण्डितजी से
मेरी कुछ थोडी बहुत पहचान हो गई थी। प० मोतीलालजी से निराश होकर मैंने
चाहा कि एक दफे पं० जवाहरलालजी से भी अच्छी तरह से बातचीत करके
क्यो न देख लूं। एक दफे मिलने की इच्छा प्रगट करने पर पं० जवाहरलालजी
ने मेरे मिलने के लिए एक समय नियत कर दिया । उस नियत समय पर एक दिन
प्रातःकाल मैं 'आनन्दभवन' भवन मे पं० जवाहरलालजी से मिला। वह समय
पडितजी का जलपान करने का समय था। बातचीत शुरू होते ही पंडितजी के
लिए कुछ फल इत्यादि आए थे। मुझसे भी उन्होंने पूछा, 'कुछ खाओगे?' मैंने
नम्रता से उत्तर दिया, 'नही, मेहरबानी है, मैं खाकर आया हूँ।' पंडितजी खाते-
खाते मेरे साथ बातचीत करते रहे। कम-से-कम डेढ घण्टे तो अवश्य बातचीत
हुई होगी । मैं पंडितजी को क्रान्तिकारी आन्दोलन की आवश्यकता और उसकी
सफलता के बारे मे विश्वास दिलाना चाहता था ।
प० जवाहरलालजी से जब मेरी बातचीत हो रही थी और मैं पंडितजी के
चेहरे की तरफ देखता था तो मुझे ऐसा अनुभव होता था कि मानो मैं एक अर्वा-
चीन अल्प बुद्धि बहका हुआ सरल लेकिन नासमझ युवक हूँ और पंडितजी मानो
निहायत कृपापूर्वक मेरे साथ बैठकर कुछ समय नष्ट कर रहे हैं। कुछ इस तौर
274 / बन्दी जीवन
पर कि विचारा एक सरल बहका हुआ युवक आया है, कुछ कहना चाहता है, क्या
करें, कुछ तो समय देना ही पड़ेगा। अच्छा कहो, सुनते हैं। नाश्ते का समय है
यों ही सही । लेकिन जैसे-जैसे बातचीत होने लगी वैसे-वैसे ही क्रमशः उनका
निःस्पृह उदासीन भाव चला गया और अपने पक्ष को लेकर पंडितजी ने भी वैसे
ही गम्भीरतापूर्वक तर्क किया जैसा मैंने अपने पक्ष को लेकर आन्तरिकता के साथ
उन्हें समझाना चाहा। पंडितजी ने बहुत शान्तिपूर्वक किसी बात को न छिपाकर
अपनी बात को निहायत स्पष्ट शब्दों में मेरे सामने रख दिया। पंडितजी का
कहना था कि आधुनिक काल में सुप्रतिष्ठित किसी भी राष्ट्र के विरुद्ध वहाँ की
प्रजा के लिए सशस्त्र क्रान्ति करना असम्भव है। मैंने रूस और जर्मनी का दृष्टान्त
दिया और कहा कि आधुनिक काल में इन देशों में सशस्त्र क्रान्ति सम्भव हुई है।
पंडितजी ने मुझे समझाना चाहा कि गुप्त रीति से षड्यन्त्र के मार्ग को ग्रहण करने
पर हम कभी भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकेंगे कारण एक तो हमें इस मार्ग में
बहुत थोड़े आदमी मिलेंगे और दूसरे यह कि जो आदमी मिलेंगे भी उनमें से
हमेशा मुखबिर पैदा होंगे। इन मुखबिरों की वजह से संगठन का कोई काम
पूर्ण नहीं हो पाएगा। हम लोग गुप्त रीति से षड्यन्त्र रचेंगे। थोड़े दिनों में सब
बातें खुल जाएँगी। जेलखाने तथा फाँसी के तख्तों पर हम लोगों की जानें
जाएँगी और इस मार्ग से हम लोग कुछ भी नहीं कर पाएँगे। मैंने उनकी यह बात
स्वीकार कर ली कि गुप्त रीति से काम करने पर मुखबिर तो अवश्य पैदा होंगे
और इन मुखबिरों के मारे बार-बार हमारा संगठन टूट जायगा और बार-
बार हमारे आदमी कालेपानी में तथा फाँसी के तख्तों पर जानें देंगे। तथापि
बार-बार क्रान्तिकारी संगठन पुनः तैयार होगा और हर बार यह संगठन पहले
की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली एवं व्यापक बनता जायगा और फाँसी के तख्तों
पर तथा कालेपानी में जीवन विसर्जन करने के परिणामतः देश-भर में लोगों के
दिलों में त्याग की भावना फैलेगी। प्राणों का मोह कटेगा, साहस एवं दृढ़ता
बढ़ेगी, एवं सर्वोपरि क्रान्ति की भावना अव्यर्थरूप में देश-भर में प्रसार-लाभ
करेगी। मैंने उनसे यह भी कहा कि पहले पहल तो बंगाल में ही एक गुप्त षड्यन्त्र
रचा गया। लेकिन इस क्रान्तिकारी षड्यन्त्र के मामले के परिणाम में क्रान्ति
की लहर बंगाल से लेकर पंजाब तक फैल गई। एक षड्यन्त्र के मामले के स्थान
पर प्रतिवर्ष बीसियों षड्यन्त्र मामले चले एवं दिन ब दिन यह षड्यन्त्रकारी दल
क्रमशः बढ़ता ही गया, घटा नही। जितनी फाँसियां हुईं, जितनी कालेपानी की
सजाएँ हुईं उतने ही प्रबल रूप में क्रान्ति की भावना देश-भर में फैली। फाँसी
या मुखबिरों के कारण क्रान्तिकारी आन्दोलन दबा नहीं बल्कि बढ़ता ही गया।
मुखबिरों के बारे मे सच बात तो यह है कि हम लोगों का काम जितना बढ़ेगा
उतने ही बड़े बड़े मुखबिर भी पैदा होंगे। तभी तो हम लोगों का काम थोड़े
पैमाने में हो रहा है इसलिए अभी जो मुखबिर पैदा होंगे उनसे हमारी हानि थोड़ी
ही होगी। लेकिन जैसे-जैसे हमारा काम अधिक व्यापक एवं प्रचंड होता जायगा
श्री मोतीलालजी, जवाहरलालजी तथा श्री सी० आर० दास से भेंट / 275
वैसे ही बड़े-बड़े देशद्रोही निकलेंगे जिनकी स्वार्थान्धता के कारण देश को बड़ी-
बड़ी हानि पहुंचेगी । ‘अमेरिकन वार आफ इण्डिपेन्डेन्स’ अमेरिका के स्वातन्त्र्य
युद्ध के समय बड़े-बड़े जेनरल देश-द्रोहिता करके अंग्रेजों की तरफ चले गए थे ।
पंडितजी ने यह प्रश्न किया था कि “ब्रिटिश गवर्नमेण्ट के मुकाबिले में तुम लोग
कैसे अस्त्र-शस्त्र संग्रह कर सकते हो ? अंग्रेजों की सुशिक्षित सेना के मुकाबिले
में तुम क्या कर सकते हो ? तुम्हारे पास वह शिक्षा कहाँ है ?’’ मैंने इस बात को
भी स्वीकार कर लिया औरकहा कि हमारे सामने यही तो काम है कि हम अपने
आदमी विदेशों में भेजें जहाँ पर वे सामरिक शिक्षा एवं युद्ध सामग्री बनाने के
कारखानो में शिक्षा पा सकें । यह काम भी प्रकाश्य रूप मे कोई कर नही सकता ।
इसके लिए भी तो गुप्त रीति से षड्यन्त्र करने की आवश्यकता है ... अस्त्र-शस्त्र
संग्रह करने के बारे में मैने उनसे जो कुछ कहा था उसे आज भी प्रकाशित
करना उचित नही समझता हूँ । लेकिन पंडितजी को यह विश्वास नही हुआ कि
हम अंग्रेजों के मुकाबिले में सामरिक तैयारी या अस्त्र-शस्त्र ग्रहण कर सकते हैं ।
उन्होने कहा कि “मान लो तुम लोगों ने फ़ौजी अफ़सरों की शिक्षा भी पा ली
लेकिन फिर भी अंग्रेज सरकार की फ़ौज के मुकाबिले मे अपनी फौज कैसे तैयार
करोगे । अगर यह बात भी मान ली जाय कि राइफल और गोली भी बाहर से
मँगा मको गे तो फिर मशीनगन आर्मर्डकार टेंक, तोपखाना, हवाई जहाज़ इत्यादि
के मुकाबिले मे तुम क्या कर सकते हो ।” मैंने हँसकर इसका जवाब दिया था कि
आखिर जर्मन राष्ट्र के मुकाबिले में आधुनिक ससार में कोई राष्ट्र तो था नही ।
जर्मन जेनरलॉ के समान कार्यक्षम होना आमान बात नही है । फिर भी जर्मनी
की रियाया ने कैसे सफलतापूर्वक जर्मन राज्य को तोड़कर वहाँ प्रजातन्त्र क़ायम
किया ? वहाँ भी तो तोपखाने मशीनगन और हवाई जहाज़ थे । लेकिन प्रजा के
विद्रोह के सामने ‘कैसर’ को हॉलैण्ड भाग जाना पड़ा और ‘‘हिण्डेनवर्ग’’ को भी
तो झुकना पड़ा । जिस पलटन ने फ्रांस, इंगलैण्ड, इटली और अमेरिका की
सम्मिलित शक्ति का मुकाबला किया था, जब उसी पलटन ने प्रजा के विद्रोह का
साथ दिया तो वही मशीनगन, वही तोपखाने, वही हवाई जहाज़ कैसर के काम
मे न आकर विद्रोहियों के काम मे आये । उसी प्रकार से अंग्रेजों की शक्ति चाहे
जितनी बड़ी क्यो न हो लेकिन भीतरी विप्लव के कारण जो भावना उत्पन्न होगी
उसका मुकाबला करना उनके लिए बहुत कठिन बात है । यदि अपनी तैयारी के
साथ देशी पलटन हमारा साथ दे तो अंग्रेज़ो की तमाम शक्ति और उनके मशीन-
गन इत्यादि कोई काम नहीं दे सकती । लेकिन मेरी कोई युक्ति काम नही आई ।
पंडितजी को यह विश्वाम नही हुआ कि भारतवर्ष मे सशस्त्र क्रान्ति सम्भव है ।
अन्त मे पंडितजी ने अहिंसा की नीति पर बहुत जोर दिया और कहा कि ये तो
अहिंसा नीति पर विश्वास रखते है और यही मानवता है कि महात्माजी के
दर्शाये हुए मार्ग से ही भारतवर्ष का कल्याण हो सकेगा । इस प्रकार मे बातचीत
समाप्त होते समय सम्भव है मुझमें कुछ असहिष्णुता कुछ ऊष्णता आ गई हो ।
276 / बन्दी जीवन
क्योंकि आखिर में अहिंसा नीति के बारे में पं० जवाहरलालजी से मैंने कुछ ऐसे
व्यक्तिगत प्रश्न किये थे जिसका सम्बन्ध विप्लववाद की युक्ति धारा के साथ कुछ
भी न था। लेकिन पंडितजी ने मेरे सब प्रश्नों का उत्तर बड़ी शान्ति से दिया
और मुझसे जरा भी असन्तुष्ट नहीं हुए। कारण कि मेरे प्रश्न असंलग्न न थे और
मानसिक विश्लेषण की दृष्टि से व्यक्तिगत विकास को जानने के लिए वे यथेष्ठ
संगत थे।
पंडितजी के साथ बातचीत के सिलसिले में प्रसंग-क्रम से यह भी बात छिड़
गई थी कि हमारे गुप्त आन्दोलन से प्रकाश्य आन्दोलन का क्या सम्बन्ध रहेगा।
पंडितजी कहते थे कि प्रकाश्य रूप में व्यापक जन-आन्दोलन की सृष्टि किए बिना
जन-साधारण में जागृति नहीं हो सकती है और जाग्रत जनता को छोड़कर भारत
का राष्ट्रीय आन्दोलन सफल नहीं हो सकता है। गुप्त षड्यन्त्र से जनता में कोई
जागृति नहीं उत्पन्न हो सकती है। मैंने भी बहुत अंशों में पंडितजी की यह बात
मान ली थी लेकिन मैंने यह कहा था कि प्रकाश्य जन-आन्दोलन एवं गुप्त रूप में
विप्लव के लिए षड्यन्त्र का काम भी साथ-साथ चलना चाहिए। एक को छोड़कर
दूसरा काम अपरिपूर्ण रह जाएगा। पिछले दिनों के बंगाल के राष्ट्रीय आन्दोलन
का उल्लेख करते हुए मैंने पंडितजी से कहा था कि बंगाल के मॉडरेट नेतागण भी
बहुत दबी हुई जबान से विप्लव आन्दोलन की निन्दा तो करते थे लेकिन उनके
कहने का सदा यह तात्पर्य रहता था कि प्रकाश्य आन्दोलन विफल होने पर भारत
में भीषण रूप में ऐसा खूनी विप्लव आन्दोलन प्रारम्भ हो जाएगा जिसकी तुलना
में आयरलैण्ड की अवस्था भी तुच्छ मालूम पड़ेगी अर्थात् बंगाल के मॉडरेट नेता-
गण अपना आन्दोलन इस प्रकार से चलाते थे जिससे बंगाल के विप्लव आन्दोलन
का प्रभाव ब्रिटिश सरकार के ऊपर जरा भी कम न पड़े। जन-आन्दोलन की
आवश्यकता तो अत्यन्त है इसमें कोई सन्देह नहीं। बंगाल में भी जन-आन्दोलन
यथेष्ठ उग्र एवं प्रचण्ड हो चुका था, इसीलिए उस प्रान्त में क्रान्तिकारी आन्दोलन
ने भी खूब जोर पकड़ा। युक्तप्रान्त, बिहार और मद्रास में यथेष्ठ रूप में प्रकाश्य
आन्दोलन नही हुआ इसीलिए उन प्रान्तों में क्रान्तिकारी आन्दोलन भी प्रचण्ड
नहीं हुआ। इसलिए उनसे मेरा नम्र निवेदन यह था कि भविष्य में जन-आन्दोलन
का नियन्त्रण इस प्रकार से करें जिससे विप्लव आन्दोलन को कुछ भी आघात न
पहुँचे। ये दोनों आन्दोलन एक-दूसरेके परिपूरक हों। ऐसा होना हम लोग उचित
समझते हैं। लेकिन मुझे अत्यन्त दुःख हुआ जब पंडितजी ने कहा कि ऐसा होना
भी सम्भव नहीं है। कारण महात्मा गांधी के नेतृत्व में जो जन-आन्दोलन हो रहा
है, और होगा वह एकदम अहिंसा नीति पर चलेगा और इसके साथ विप्लव
आन्दोलन की कोई सहयोगिता नहीं हो सकती है। बल्कि विप्लव आन्दोलन के
कारण अहिंसात्मक आन्दोलन को यथेष्ठ धक्का पहुँचेगा। यहाँ तक कि यदि
विप्लव आन्दोलन चलता रहे तो अहिंसात्मक सत्याग्रह आन्दोलन के लिए
वातावरण एकदम बिगड़ जाएगा। इसलिए हम लोग कभी भी नहीं चाहेंगे कि
श्री मोतीलालजी, जवाहरलालजी तथा श्री सी० आर० दास से भेंट / 277
विप्लव आन्दोलन का काम जनता के सामने आए । मैंने अवश्य ही पंडितजी को
यह बतला दिया था कि ऐसी आशा करके आप नितान्त दुराशा कर रहे हैं।
क्योंकि विप्लवीगण अब जो ठीक समझेंगे वही करेंगे। कारण, सिद्धान्तों का जब
भेद है तो कर्म-प्रणाली में भी भेद अवश्य होता है इसे कौन रोक सकता है।
पण्डितजी ने इस पर केवल यही कहा था कि ऐसा होना नहीं चाहिए।
सब बातें समाप्त होने पर हम एक-दूसरे के प्रति यथेष्ठ प्रीति की भावना
लेकर एक-दूसरे से विदा हुए। इस घटना के बाद भी पण्डितजी से बीच-बीच में
मैं मिलता रहा। 'बन्दी जीवन' प्रथम भाग छपने पर मैंने एक प्रति पंडितजी को
उपहार दी थी। पंडितजी ने स्वयं भी इस किताब को पढ़ा था एवं दूसरों को
इसे पढ़ने को कहा था। मुझसे पण्डितजी ने कहा था कि दूसरे भाग की भाषा
कुछ और सरल होनी चाहिए। नैनी जेल मे भी पण्डितजी से बहुत बातचीत हुई
थी। जिसका वर्णन जेल-जीवन के संदर्भ में ही करने की इच्छा है।
इलाहाबाद में जो दूसरे कांग्रेस के नेता थे उन सबसे भी मैं अच्छी तरह
मिला था। उनमें से एक-दो सज्जन विप्लव आन्दोलन के प्रति यथेष्ठ सहानुभूति
रखते थे। लेकिन व्यावहारिक रूप में इनमें से किसी ने भी हमें कुछ भी सहायता
नही दी।
विप्लव आन्दोलन के सम्पर्क के प्रकाश्य नेताओं में से पडित जवाहरलालजी
को छोड़कर देशबन्धु सी० आर० दासजी से सबसे अधिक एवं गम्भीर रूप में
बातचीत हुई थी। पंजाब से लौटने के बाद किस समय मैं कलकत्ता गया था एवं
सबसे पहले मैं कब देशबन्धु सी० आर० दासजी से मिला था यह मुझे इस समय
ठीक-ठीक याद नही है। मैंने अपनी नीति यह बना ली थी कि हम प्रकाश्य आन्दो-
लन के नेताओं से अपना ऐसा सम्बन्ध स्थापित करें जिससे देश के गण्यमान्य
व्यक्ति विप्लव आन्दोलन के प्रति यथेष्ठ रूप में सहानुभूतिपूर्ण हो जाएँ और
यदि सम्भव हो सके तो उनसे अपने आयोजन के अनुसार सहायता लेने की भी
चेष्टा करें। इस नीति के कारण एवं पंजाब के गुरुद्वारा आन्दोलन के नेता से
बातचीत हो जाने के कारण देशबन्धु सी० आर० दासजी से मिलना मेरे लिए
नितान्त आवश्यक हो गया था।
बड़े लाट साहब के ऊपर आक्रमण करने से प्रकाश्य राष्ट्रीय आन्दोलन को
किसी प्रकार से आघात पहुँचेगा या नहीं यह समझ लेना मेरे लिए उचित था।
और मैं यह भी नही चाहता था कि प्रकाश्य आन्दोलन के नेतागण हमारे ऊपर
यह लांछन लगाएँ कि हमारे ही काम के कारण प्रकाश्य आन्दोलन में विघ्न
पहुँचा। मैं यह भी चाहता था कि देशबन्धु से विप्लव आन्दोलन के लिए कुछ
आर्थिक सहायता लूं। इन सब कारणों से देशबन्धु सी० आर० दासजी से मैं
मिला, एकदम एकान्त में बातचीत हुई।
देशबंधुं सी० आर० दास के साथ बंगाल के कुछ क्रान्तिकारियों का सम्बन्ध
था। लेकिन मेरे साथ उनका कोई सम्बन्ध नहीं था। श्री सुभाषचन्द्र बोस की एक
278 / बन्दी जीवन
किताब से यह पता चला है कि देशबन्धु के उद्योग से सितम्बर सन् 1921 में
महात्माजी से बंगाल के कुछ क्रान्तिकारियों की बातचीत हुई थी । इस बातचीत
में देशबन्धु दास भी उपस्थित थे । महात्माजी से बातचीत होने के बाद इन
क्रान्तिकारियों ने महात्माजी को यह वचन दिया था कि महात्माजी के कार्यक्रम
में वे लोग बाधा तो देंगे ही नहीं बल्कि कांग्रेस आन्दोलन में योगदान देकर उनके
कार्यक्रम को सफल बनाने की वे भरसक कोशिश करेंगे । जहाँ तक मुझे मालूम
है इन क्रान्तिकारियों में ढाका अनुशीलन समिति के कोई व्यक्ति नहीं थे और
सम्भव है कलकत्ता के दूसरे दलों के व्यक्तियों ने मुझे भी ढाका समिति का
आदमी समझकर मेरे साथ कोई सलाह नहीं की थी । मैं इस समय जमशेदपुर के
मजदूर आन्दोलन में काम कर रहा था । ढाका अनुशीलन समिति कांग्रेस आन्दो-
लन के विरुद्ध श्री सी० आर० दास के विरोधी दल के प्रमुख आदमियों की सहायता
लेकर सत्याग्रह आन्दोलन का विरोध करती थी। बंगाल के दूसरे दलों के व्यक्तियों
से मुझे यह संवाद मिला था । यह बात मैं पहले ही बता चुका हूँ ।
पंजाब से लौटकर मैंने भी देशबन्धु दास के साथ सम्बन्ध स्थापित करने का
निश्चय कर लिया । देशबन्धु दास से मेरा परिचय पहले ही हो चुका था ।
अण्डमन में रहते ही मैं अपने भाइयों के पास जो चिट्ठी भेजा करता था उसके
अनुसार मेरे भाई देश के सर्वमान्य नेताओं के पास राजनीतिक कैदियों को छुड़ाने
के लिए आवेदन-निवेदन पत्रादि भेजा करते थे । उस समय के राजनीतिक नेताओं
में से केवल सी० आर० दास एवं अखिलचन्द्र नियोगी ने उन आवेदन-निवेदनों के
उत्तर दिए थे । इस बात से भी देशबन्धु का महत्त्व व्यक्त होता है । इसके बाद
नागपुर कांग्रेस में सी० आर० दासजी के साथ मेरा साक्षात परिचय हुआ । कुछ
थोड़े आदमियो ने नागपुर मे देशबन्धु को यह आश्वासन दिलाया था कि यदि आप
वकालत छोड़कर राजनीतिक क्षेत्र में अवतीर्ण हो तो हवा ऐसी पलटेगी जिसकी
तुलना मिलनी मुश्किल है । इन थोडे आदमियों में मैं भी एक था । श्री सी०
आर० दास को यह भरोसा नही था कि उनके राष्ट्रीय क्षेत्र में पूर्णरूप से अवतीर्ण
होने पर भी बंगाली जनता ठीक प्रकार से उनके आह्वान का प्रत्युत्तर दे सकेगी ।
स्कूल, कालेज के लड़के भी सत्याग्रह आन्दोलन में यथार्थ रूप में भाग लेंगे या
नही, स्कूल-कालेज छोड़ेंगे या नही इसमें सी० आर० दासजी को काफ़ी संदेह
था । जिन व्यक्तियों ने सी० आर० दासजी से यह कहा था कि आपके वकालत
छोड़ने पर बंगाल के छात्रवृन्द अवश्य ही स्कूल-कालेज छोड़ देंगे उनमें बंगाल के
एक वकील श्री गिरजाप्रसन्न साम्याल और मैं थे । नागपुर कांग्रेस के अधिवेशन
के समय विषय समिति की बैठक में भी मैंने सी० आर० दास के पक्ष में दो-चार
बातें कही थीं । उस समय दासजी के साथ महात्माजी की तनातनी चल रही थी ।
इसलिए जो व्यक्ति दास के पक्ष में कुछ कहता था उसके प्रति उनकी दृष्टि
आकृष्ट होती थी । फिर खुले अधिवेशन में राजनीतिक बन्दियों के सिलसिले में
ही एक बंगाली था जो सर्वप्रथम हिन्दी में सफलतापूर्वक बोला था । बाद को
श्री मोतीलालजी, जवाहरलालजी तथा श्री सी० आर० दास से भेंट / 279
मैंने सुना कि बंगाल कांग्रेस के लेबर-विभाग में मुझे लेने के लिए सी० आर०
दासजी ने इच्छा प्रकट की थी। इन सब बातों के अतिरिक्त और भी एक बड़ी
बात यह थी कि सी० आर० दास के सम्पादन में 'नारायण' नाम से जो मासिक
पत्र निकलता था उसमे 'बन्दी जीवन' नाम का मेरा लेख प्रकाशित होता था। इस
लेख के प्रति भी सी० आर० दासजी की दृष्टि प्रबल रूप में आकृष्ट हुई थी ऐसा
मैंने सुना है। श्री हेमन्तकुमार सरकार उस समय देशबन्धु के अन्तरंग कार्यकर्ताओं
में से थे। इन्ही की जबानी मैंने ये सब बातें सुनी थी। नागपुर काग्रेस के बाद
देशबन्धु दास ने कुछ कार्यकर्ताओं को अपने यहाँ दावत दी थी। उस दावत में मै
भी निमन्त्रित था। मुझे नितान्त दुःख है कि उस समय वर्दवान जिले के कालना
नामक स्थान में मैं ईंट के कारोबार मे बुरी तरह फँस गया था। इसलिए
ऐसे सुनहले अवसर पर मैं देशबन्धु के साथ मिलकर काम करके अपने कर्मजीवन
को सार्थक नही कर पाया। इन सब कारणों से देशबन्धु दास से मेरा यथेष्ठ
परिचय हो चुका था। इसलिए जब मैंने देशबन्धु से एकान्त मे बातचीत करने के
लिए कुछ समय चाहा तो दासजी ने सहर्ष मुझे इसके लिए समय दिया।
मेरे साथ देशबन्धु सी० आर० दास जी की बातचीत दो-तीन बार हुई थी।
जहाँ तक मुझे स्मरण है मैने उनसे जो पहली बार बातचीत की थी वह सबसे
महत्त्वपूर्ण थी और उसी बातचीत मे मैंने पजाब के बारे में भी बातचीत की थी।
जब निर्दिष्ट समय पर दासजी के मकान पर आया तो वे विशेष स्नेह के साथ
मुझे एक निर्जन कमरे मे ले गए। सबसे पहले मैंने उन्हें बताया कि उनके साथ
जिनका मतभेद भी है उन्हें भी वे उदारता के साथ सहायता देते हैं यह बात सर्व-
विदित है। अतः मैं भी आपके पास कुछ सहायता पाने की इच्छा से आया हूँ।
सम्भव है वे मेरे आदर्श से सहमत न हो तथापि मैंने यह हिम्मत की कि उनमे
सहायता की प्रार्थना करूँ। फिर मैंने दासजी को अपना गुप्त गयक्रम बताया।
फिर पंजाब के अकाली नेता के बारे मे बातचीत की और कहा कि यदि वे समझें
कि बड़े लाट साहब के ऊपर आक्रमण करने पर प्रकाश्य आन्दोलन को धक्का नही
पहुँचेगा और यदि इस बात पर उनको कोई आपत्ति न हो तो हम लोग वाइसराय
पर आक्रमण करना चाहते हैं। और यदि वे समझे कि ऐसा करने से उनके
आन्दोलन मे विघ्न पैदा होगा तो हम लोग ऐसा काम नही करेगे। यदि हम लोग
यह काम करते है और यदि हमारा आदमी पंजाबियों और विशेष करके सिक्खों
के साथ सहानुभूति प्रकट करने के लिए पंजाब में जाकर आत्मबलिदान करता है
तो इस प्रकार से हम सिक्खों के हृदय पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। वाइसराय
पर आक्रमण करने के परिणामतः जब हमारा आदमी अदालत के सामने कटघरे
के अन्दर खडे होकर वीरत्व व्यंजक शब्दो मे पंजाबियो के प्रति सहानुभूति
दिखलाते हुए यह कहेगा कि राष्ट्र की समस्त शक्ति से तुम वाइसराय हमारे
राष्ट्रीय आन्दोलन को बलपूर्वक कुचलना चाहते हो तो हमारा भी कर्तव्य हो जाना
है कि हम भी दिखला दें कि बलपूर्वक किसी राष्ट्रीय आन्दोलन को कुचला नही
280 / बन्दी जीवन
जा सकता। अंग्रेज ! तुम यदि समझते हो कि अकालियों के पीछे दूसरे भारतवासी
नहीं हैं तो तुम अत्यन्त भ्रम में हो । इस भ्रम को दूर करने के लिए ही मैंने अपने
प्राणों की बाजी लगाकर यह प्रमाणित करना चाहा कि भारतवर्ष में अकाली
अकेले नहीं हैं। श्री सी० आर० दासजी सब बातें सुनकर गम्भीर हो गए और
बाद में कहा, 'आज का दिन और रात मुझे समय दो। कल फिर मेरे साथ मिलो ।
सब बातें समझ-बूझकर कल मैं अपनी राय दूंगा।'
वायसराय के प्रश्न को छोड़कर सिक्ख नेताओं ने एक और बात मुझे बताइ
थी । इसे भी मैंने श्री सी० आर० दासजी के सामने रख दिया था । सिक्खों ने
मुझ से कहा था कि अंग्रेज की नीति यह हो रही है कि काश्मीर को किसी-न-किसी
बहाने से ब्रिटिश इण्डिया से अन्तर्भुक्त कर लिया जाय और काश्मीर को अंग्रेजों
की एक कालोनी के रूप में परिणत कर दिया जाय । अंग्रेज चाहते थे कि काश्मीर
में अधिक-से-अधिक संख्या में अंग्रेजी पल्टन रखी जाय। इसके विरुद्ध किस प्रकार
से आन्दोलन खड़ा किया जाय यह भी सिक्ख नेतागण जानना चाहते थे । मैंने
सिक्ख नेताओं से कह दिया था कि देशबन्धु सी० आर० दासजी से परामर्श किये
बिना मैं कोई काम नहीं करूँगा । वे भी यह चाहते थे कि काश्मीर का प्रश्न सी०
आर० दास के कानों तक पहुँच जाय ।
सी० आर० दासजी ने काश्मीर के प्रश्न को विशेष महत्त्व नही दिया और
इसके बारे में मुझसे कुछ कहा था या नहीं मुझे आज याद नहीं है । दूसरे दिन
नियत समय पर मैं सी० आर० दासजी के मकान पर बहुत उत्सुकता के साथ
पहुँचा । सी० आर० दासजी ने कहा 'तमाम रात मुझे नींद नही आई, तुम्हारे प्रश्न
को लेकर बहुत गम्भीरता के साथ मैने दिन और रात सोचा । लेकिन अन्त में मैं
इसी परिणाम पर पहुँचा हूँ कि अभी वायसराय के ऊपर कोई आक्रमण होना
उचित नही है । तथापि यदि मैं गिरफ्तार हो गया तो मेरी गिरफ्तारी के बाद
तुम लोग इस काम को कर सकते हो ।' मैं सब बातें समझ गया । और क्या
कहता ? लेकिन फिर भी राजनीतिक क्षेत्र में यदि काम करना है तो हरएक प्रकार
के व्यक्ति से जितना लाभ हो सके उठाना चाहिए । फिर एक तो मैं सी० आर०
दासजी से सहायता पाने की आशा कर रहा था और दूसरी बात यह थी कि अभी
हमारा संगठन थोड़े दिन का था, इसलिए मैं नही चाहता था कि अभी हम लोग
ऐसा कोई काम करें जिससे सरकार की तमाम शक्ति हमे मिटाने मे लग जाय ।
इन सब कारणों से मैंने पंजाब के नेताओं को अपनी परिस्थिति समझा दी ।
परिस्थिति के सामने उन्हें भी झुकना पड़ा ।
एक बात मुझे ठीक से याद नही है कि देशबन्धुदासजी से मैंने सहायता के
लिए जो प्रार्थना की थी वह पंजाब की बातों की आलोचना करते समय की थी
अथवा उसके बाद, मैं ठीक से नही कह सकता । जहाँ तक मुझे याद है मैं समझता
हूँ अनुशीलन समिति के साथ मेरा कोई समझौता होने के पहले ही मैंने सी०आर०
दास जी से ये सब बातें की थीं । सहायता देने के बारे में दासजी ने मुझसे कहा