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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 265, कुल 408 में से

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पृष्ठ 265

क्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन / 263
एक पत्र भेजा और उसमें बहुत नम्रता के साथ यह लिखा कि "सैण्ड्स साहब
आपने एक सच्चे अंग्रेज (Englishman) की हैसियत से जो उदारता दिखलाई
है उसके लिए मैं जन्म-भर आपका कृतज्ञ रहूँगा । लेकिन बहुत दुख के साथ यह
कहना पड़ता है कि अण्डमन से छूटते समय भी जब मैंने कोई शर्तें स्वीकार नहीं
की है तो मेरे लिए उचित है कि अब भी मैं कोई शर्तें स्वीकार न करूँ । लेकिन
सरकारी मुलाजमत जब मैं स्वीकार करता हूँ तो उसका अर्थ यह होता ही है कि
सरकारी क़ायदे-क़ानून को भी मैं स्वीकार करता हूँ । इसके अतिरिक्त मैं और
कोई शर्तें कबूल करना उचित नहीं समझता ।" इस पत्र का कोई उत्तर मुझे नहीं
मिला और मिलना आवश्यक भी नहीं था। जब मैं बाल-बच्चों को साथ लेकर
घरबार छोड़कर फरार हो गया था उस समय भी सैण्ड्स साहब की चिट्ठी आदि
मेरे पास थी । लेकिन मेरी गिरफ्तारी के बाद ये सब चीजें एवं और भी बहुतेरे
आवश्यकीय कागजात—पत्र एवं मेरी बहुत-सी किताबें—जाने कितनी जगह
घूमघाम कर आज सब-के-सब खो गए हैं।
मुझे ठीक याद नही है, सम्भव है, थोड़े दिन श्री छेदालाल और श्री बनवारी-
लाल के साथ रहकर जब मैंने देखा कि पुलिस की तरफ से कोई विशेष उत्पात
की सम्भावना नहीं है तो मैं भी ढीला पड़ गया ।
श्री छेदालालजी के साथ संगठन-कार्य के सिलसिले में मैं फतेहगढ़ गया हुआ
था। शहर के कुछ हिस्सों में एवं देहात में भी जाना पड़ा था। हमारे संगठन-कार्य
का यह तरीका था कि जितनी जगहों में हो सके उतनी जगहों में दृढ़ चित्त कर्त्तव्य-
परायण त्यागी साहसी युवकों को बैठाया जाय। इन्हीं को केन्द्र करके क्रमशः एक
विराट् दल संगठित हो जाता है। गांव और शहर से वापस आकर गंगाजी के
किनारे सुस्ता रहे थे। थोड़ी देर में गगाजी के किनारे-किनारे घाट-घाट घूमना
प्रारम्भ किया और यह देखना चाहा कि कोई ऐसा स्थान मिलता है या नहीं
जहाँ पर मनुष्य विदेश से आकर टिक सकता है। उस समय फतेहगढ़ जिले के
'साध' नामक कौम के पुरुष और स्त्री बहुत संख्या में एकत्र हुए थे । बैलगाड़ी में
लदकर परिवार के परिवार चले आ रहे थे। इनको देखने से मालूम पड़ता था
कि ये लोग बड़े सुखी हैं निर्द्वन्द्व हैं। इनमे अधिकांश स्त्रियाँ थी । ये अधिक पर्दा
नही करती थीं । निःसंकोच होकर गंगाजी में नहाती थी, किनारे पर आकर
खाती-पीती थी । टोलियों में बैठकर संसार की सुख-दुख की बातें करती थी ।
कभी-कभी कुछ स्त्री-पुरुष एक टोली से दूसरी टोली में आते-जाते थे । सुनने में
आया कि अब 'साध' लोग बड़े अमीर होते हैं। और इनका पेशा है व्यापार करना ।
दिनान्त में कुछ बैलगाड़ी में लदकर और कुछ पैदल घर को वापस आते थे ।
उस समय मालूम होता था मानो किसी मेला से सब लौट रहे हैं। हम एक घाट
से दूसरे घाट को जा रहे थे और इधर-उधर तीक्ष्ण दृष्टि से देखते जा रहे थे कि
इस मेले के सदृश आदमियों की भीड़ में बुड्ढों, औरतों और बाल-बच्चों को
छोड़कर नौजवान भी यहाँ पर हैं या नहीं और यदि हैं तो वे शिक्षित हैं या नहीं।