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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 268, कुल 408 में से

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पृष्ठ 268

266 / बन्दी जीवन

भी नहीं हो सकती। नाभा में प्रतिदिन गोली चल रही थी। उसके मुकाबले में
प्रतिदिन सिक्ख जत्थे गोली का सामना करने के लिए नाभा जाते थे। पंजाब के
हरएक प्रान्त से किसान, मजदूर, छात्र, नौजवान, बूढ़े, प्रौढ़ हरएक प्रकार के
सिक्ख इन जत्थों में आ-आकर शामिल होते थे। मैंने स्वयं देखा है कि अमृतसर
में जब ये जत्थे पहुँचते थे तो बिलकुल सामरिक रीति से इन जत्थों का स्वागत
होता था। और इनकी कितनी ही माताएँ, बहनें, स्त्रियाँ इनसे आकर मिलती
थीं। अपने प्रेम से, अपनी उमंग से, हृदय के अन्तस्तल से ये माताएँ, बहनें और
स्त्रियाँ इन सिक्खों के गलों में प्रीति के, स्नेहाशीर्वाद के, मंगल कामना के प्रतीक-
स्वरूप मालाएँ पहनाती थीं। अमृतसर मे एक तरफ रसद का इंतजाम था, अस्प-
ताल की व्यवस्था थी। नाभा से चोट खाए कितने व्यक्ति इन अस्पतालो मे
आकर आश्रय लेते थे। एक अस्त्र को छोड़कर और सब बातो में पूरी लडाई की
तैयारी थी। इन सिक्खों के पीछे महात्माजी का आशीर्वाद नहीं था, इस सिक्ख
आन्दोलन के पीछे कांग्रेस की प्रेस्टीज भी नहीं थी। कांग्रेस का कोई भी गण्यमान्य
नेता इस सिक्ख आन्दोलन के साथ नहीं था। लेकिन एक बात अवश्य थी जिसे
स्वीकार करना पडेगा कि सिक्ख लोग अपने नेतृत्व मे अपनी क़ौम के लिए जैसा
असाध्य साधन करके दिखला सकते हैं, दूसरी क़ौम के साथ मिलकर, अखिल
भारतवर्षीय आन्दोलन में उस आन्तरिकता के साथ वे वैसा नही करते।
इस अवसर पर एक सर्वमान्य सिक्ख नेता के साथ मेरी खूब बातचीत हुई
थी। उसका नाम यहाँ पर उल्लेख करना कदापि उचित नही होगा। जिस दिन
भारत स्वाधीन हो जाएगा उस दिन उनका नाम प्रकाशित किया जा सकता है। इस
नेता ने बहुत आन्तरिकता के साथ मेरे पास एक प्रस्ताव किया था। उन्होने यह
बतलाया था कि सिख आन्दोलन अब ऐसी स्थिति पर आ पहुँचा है कि अब यह
आन्दोलन आगे चलाना प्रायः असम्भव-सा हो गया है। सिक्खों के खेती का काम
नष्टप्राय हो चला है। उनके सब व्यापार एवं काम-धंधे चौपट हो चुके हैं। सरकार
से समझौते का भी कोई लक्षण नही दिखलाई देता। सिक्खो के गुरुद्वारा आन्दोलन
का परिणाम क्या होगा, यह कहना बहुत ही कठिन हो गया है। ऐसी परिस्थिति
में यदि प्रचण्ड रूप से आतंकवाद की सृष्टि की जा सके तो बहुत सम्भव है कि
सरकार के ऊपर खूब दबाव पड़े। मैंने उन्हें यह आश्वासन दिलाया कि यदि कांग्रेस
के कुछ नेतागण इस बात का विरोध न करें तो जैसा आप कहते हैं हम वैसा ही
करेंगे। लेकिन हम यह नही चाहते है कि हमारे काम से कांग्रेस के आन्दोलन को
कुछ भी धक्का पहुँचे।
इसी समय एक और विशेष महत्वपूर्ण बात हुई। लाहौर षड्यन्त्र केस के एक
व्यक्ति सरदार गुरुमुखसिंह सरकार की हिरासत से भाग निकले थे। आपसे मेरी
पहली मुलाकात अण्डमन जेल में हुई थी। मेरे छूट जाने के बाद सरदार गुरुमुख
सिंह को भारत के जेल में वापस भेज दिया गया था। आपको मद्रास के एक जेल
से दूसरे जेल में ले जाया जा रहा था। पैरों में लोहे की बेड़ी थी लेकिन इनके