बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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से तीन लम्बी-लम्बी कतारों में ऐसे आंकड़े सजाये हुए हैं। ऐसा गोपनीय तार भी
सिख अफ़सर ने तार घर से नकल करके विप्लववादियों के हाथ में लाकर रख
दिया है। मैंने इन्हें समझाया कि इस तार के अर्थ को समझने के लिए कई महीनों
'तक परिश्रम करना पड़ेगा। फिर संकेत विज्ञान से भी खूब परिचित रहना नितांत
आवश्यक है। और मैं ऐसा परिचित नहीं हूँ। मैंने यह भी बतलाया था कि हम
लोगों के सांकेतिक चिह्न आज भी सी० आई० डी० वाले समझ नहीं पाए हैं।
हम लोगों के एक साथी श्री विनायक राव कापले के मृत-शरीर के साथ एक
चिट्ठी भी पाई गई थी। उस चिट्ठी में कुछ सांकेतिक चिह्न थे आज भी
सी० आई० डी० वाले इन चिह्नों का अर्थ समझ नहीं पाए हैं। तार की नकल तो
और बात रही लाटसाहब के दफ़्तर से नाभा के सम्बन्ध में पूरी फाइल-की-फाइल
(कागजात) अकालियों ने ग़ायब करा दी। इसका नाम है जन-आन्दोलन,
इसको कहते हैं क़ौम की प्रीति ! सिख लोग सरकारी नौकरी भी करते थे और
अपनी जाति की सेवा के लिए भी सब कुछ करने के लिए तैयार रहते थे। भारत-
वर्ष की दूसरी जातियों में इसकी तुलना मिलनी कठिन ही नहीं, असम्भव है।
अकाली नेता और सिख अफ़सर से मिलने के बाद सरदार गुरुमुखसिंह से
संगठन के बारे में बहुत बातचीत हुई। मुझे पता चला कि सरदार गुरुमुखसिंह
रूस होकर आए हैं, काबुल में भी इनके अड्डे मौजूद हैं। काबुल में पंजाब कौ
आने-जाने का विशेष उपाय निर्धारित है। गुरुमुखसिंहजी कई बार काबुल से
पजाब आए हैं और गए हैं। सरदार गुरुमुखसिंहजी बोलशेविकों के सिद्धान्त के
आधार पर सिखों में ही अपना संगठन करमा चाहते हैं। उनसे बातचीत करके
मैंने यह अनुभव किया कि सिखों को छोड़कर दूसरी किसी क़ौम के साथ मिलकर
अब ये लोग कुछ काम नहीं करना चाहते। मुझे बहुत दुःख हुआ। लेकिन मैं
समझ गया कि क्रान्तिकारी आन्दोलन में भी साम्प्रदायिकता का विष अपना
असर दिखाने लग गया है। मैंने यह खूब समझ लिया कि गुरुमुखसिंह अब मेरे
साथ मिलकर कोई काम नहीं करेंगे।
अमृतसर से मैं लाहोर लौट आया। भविष्य में गुरुमुखसिंह से सम्बन्ध क़ायम
रखने के लिए प्रयोजन कर लिया। अध्यापक जयचन्द्रजी को गुरुमुखसिंह के बारे
मे सब बातें बता दीं, लेकिन जहाँ तक मुझे आज याद है लाट साहब के ऊपर हमले
की बात इन्हें नहीं बताई।
इधर भगतसिंह से बातचीत करने पर मालूम पड़ा कि भगतसिंह के पिता
भगतसिंह की शादी कराने का तमाम आयोजन कर रहे हैं। मैंने खुद तो शादी
कर ली थी लेकिन मैं यह खूब अनुभव कर रहा था कि मैंने शादी करके बड़ी भारी
ग़लती की है। मैंने भगतसिंह को समझा दिया कि यदि शादी कर लोगे तो
भविष्य में क्रान्तिकारी आन्दोलन में तुम अधिक काम नही कर पाओगे। भगत-
सिंह शादी करना नहीं चाहते थे। मेरा यह एक नियम था कि दल के आदमी की
परीक्षा करने की गरज से मैं यह देखना चाहता था कि अपने दल का व्यक्ति त्याग