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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 269, कुल 408 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 269

•क्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन / 267

दुर्लभ साहस को ले देखिए कि चलती ट्रेन से मौका देखकर सरदार गुरुमुखसिंह
अन्धकार में कूद पड़े । पुलिस गफलत में पड़ी रही सरदार गुरुमुखसिंह उन्मत्त
उत्ताल तरंग समाकीर्ण जीवन समुद्र में अदृश्य हो गए । किस प्रकार से बाद को
बह अपनी बेड़ी से मुक्त हुए, एवं कैसे किधर गए इसका पूर्ण वर्णन मैंने 'विचार
विनिमय' नामक अपनी पुस्तक में किया है। इसलिए इस बात को यहाँ पर दुहराने
की कोई आवश्यकता नही है । लाहौर के सर्वमान्य नेता के साथ बातचीत करने
के पश्चात् मुझे पता चला कि सरदार गुरुमुखसिंह भी इस समय अमृतसर में
उपस्थित है; और फिर मै उनसे मिलने गया ।
अमृतसर गुरुद्वारा के पास ही एक गली में एक छोटे-से मकान में आ पहुँचा ।
नीचे दुकानें थी, ऊपर सरदार गुरुमुखसिंह रहते थे । अकाली आन्दोलन के सर्व-
मान्य नेता भी मेरे साथ इस स्थान पर आए थे। सन् 1920 में सरदार गुरुमुखसिंह
को अण्डमन में छोडकर आया था। इतने दिन के बाद फिर फरार हालत में सरदार
गुरुमुखसिंह से मिलकर विचित्र आनन्द का अनुभव कर रहा था । एक तरफ
साम्राज्य की तमाम शक्ति विप्लववादियों को कुचलने के लिए निर्मम रूप से लगी
हुई है दूसरी तरफ अज्ञात कुलशील असहाय सम्पदहीन होते हुए भी आत्मविश्वास
के कारण ही अपने आदर्श में अविचलित श्रद्धा रखने के कारण ही, विप्लववादी
जीवन की बाजी लगाकर असंख्य बाधाओं का सामना करते हुए भी कैसी निष्ठा
के साथ अपनेकाम में कैसे निर्भीक होकर उत्साह के साथ लगे हुए हैं। एक और विशेष
महत्त्वपूर्ण बात ध्यान में रखने की यह है कि अकाली आन्दोलन एक प्रकाश्यजन-
आन्दोलन था, वह आन्दोलन सशस्त्र क्रान्तिकारी आन्दोलन न था । उस आन्दोलन
के नेतागण भी क्रान्तिकारी नही थे । लेकिन इम आन्दोलन के नेतागण अहिंसा
नीति को आसमान पर नही चढ़ाते थे । जैसी परिस्थिति थी उसी के अनुकूल वाता-
वरण में जन-आन्दोलन को जिस प्रकार से निर्भीक रूप मे चलाया जा रहा था
उसी प्रकार से भारत के दूसरे राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रति अकाली आन्दोलन के
नेतागण उदासीन न रहकर उसके प्रति अपनी स्पष्ट सहानुभूति की अविचलित
स्वर मे घोषणा करने मे हिचकते नही थे । इसीलिए सशस्त्र क्रान्तिकारी आन्दोलन-
कारियों के प्रति अकाली आन्दोलन के नेतागणों ने कोई भी असम्मानसूचक अथवा
निरुत्साह-व्यंजक शब्दों का व्यवहार नहीं किया । अपनी काफ्रेंस मे अकालियों ने
स्पष्ट शब्दों में यह घोषणा की कि अभी क्रान्ति का समय नही आया है, इसलिए
हम मलाह देते हैं कि जो वीर और त्यागी नवयुवकगण क्रान्तिकारी कार्य मे लगे
हुए हैं वे अपने कार्य से विरत हों । उनकी वीरता, उनका त्याग, उनका साहस
सराहनीय है । लेकिन उनके कार्य अभी समयोपयोगी नही हैं। इस मनोवृत्ति के
साथ यदि हम कांग्रेस के नेतागणों की मनोवृत्ति की तुलना करते हैं तो मन में
ऐसा लगता है कि ये लोग विशेष करके महात्माजी और उनके अनुयायीगण मानो
क्रान्तिकारियों को अपना और अपने देश का शत्रु समझते है। काग्रेस के प्लेट-
फार्म से, एवं सभापति के आसन से भी, ऐसे विषवत् वाक्यों के उद्गार किए जाते