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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 267, कुल 408 में से

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पृष्ठ 267

क्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन / 265
खूब बातचीत हुई। जयचन्द्रजी को जब मालूम हुआ कि मैं अण्डमन गया हुआ था
और क़रीब चार साल तक वहाँ पर रहा तो वह मेरे प्रति बहुत आकृष्ट हो गए।
उन्होंने बतलाया कि फतेहगढ़ से वह इलाहाबाद आएंगे। उस समय 'बन्दी जीवन
नामक मेरी पुस्तक छप चुकी थी। मैं चाहता था कि जयचन्द्रजी मेरी किताब
पढ़ें। किताब मेरे पास नही थी। इसलिए तथा जयचन्द्रजी से बातचीत और
आगे बढ़ाने के लिए यह तय पाया कि इलाहाबाद मे राष्ट्रीय स्कूल मे जयचन्द्रजी
से मेरी फिर मुलाकात होगी। इलाहाबाद मे फिर मुलाकात हुई। 'बन्दी जीवन'
पढकर जयचन्द्रजी अत्यन्त प्रभावित हुए। इस प्रकार से जयचन्द्रजी हमारे दल
मे सम्मिलित हुए। उन्होने मुझे लाहौर बुलाया। मैं लाहौर गया। अध्यापक
जयचन्द्रजी के मकान मे ही अतिथि हुआ। लाहौर मे मैं कुछ नौजवानो से परि-
चित हुआ। इन नौजवानो मे एक का नाम था सरदार भगतसिंह। लाहौर के
नौजवानो मे से कोई तो रावलपिंडी का रहनेवाला था कोई था गुजरानवाला
का, कोई था गुरदासपुर का और कोई होशियारपुर का। ये सब लाजपतराय के
प्रतिष्ठित 'तिलक स्कूल आफ पालिटिक्स' के छात्र थे। एक-एक करके इन सब
नवयुवको से देर तक बातचीत होती रही। सशस्त्र क्रान्ति के मार्ग को छोड़कर
भारतवर्ष कभी भी स्वाधीन नही हो सकता, और सशस्त्र क्रान्ति होना निश्चय ही
सम्भव है, इन सब बातो पर विशेष रूप से ज़ोर देते हुए और पिछले क्रान्ति युग
के इतिहास को बतलाते हुए मैंने इन सब नवयुवको को क्रान्ति मार्ग में दीक्षित
किया।
लाहौर मे हम लोगो के एक बहुत पुराने साथी थे श्री केदारनाथजी सहगल ।
इनसे भी मैं मिलने गया। ये व्यक्ति बारहो महीना, तीसो दिन, हर घडी सिर से
पैर तक काले कपडे पहने रहते थे। भारतवर्ष जब तक स्वाधीन नही होता है तब
तक इनका प्रण था कि सफेद कपडा नही पहनेंगे।
श्री केदारनाथ के यहाँ और भी पुराने साथियो के साथ बातचीत हुई ।
श्री केदारनाथ और ये सब दूसरे पुराने साथी काम करने के लिए आगे नही बढे।
श्री केदारनाथजी के जरिये यह मालूम हुआ कि पहले लाहौर षड्यन्त्र केस के
श्री पृथ्वीसिंहजी के साथ उनका कुछ सम्बन्ध है। मैने बार-बार आन्तरिक चेष्टा
की कि पृथ्बीसिंहजी से मेरी मुलाकात हो जाय लेकिन मेरे दुर्भाग्य से उनसे मुला-
कात नही हो सकी।
इस वक्त मुझे ठीक से याद नही है, यदि उस समय के सवादपत्रो आदि मे
सहायता ली जाय तो सम्भव है, सिलसिले को ठीक रखते हुए सब बाते मै बता
सकूँ। इस समय कुछ आगे की बाते पीछे कह रहा हूँ या पीछे की बात आगे बता
रहा हूँ या नही इसके बारे मे कुछ निश्चयपूर्वक मैं कह नही सकता। जिस समय
नाभा मे अकालियो का सत्याग्रह हो रहा था उस समय मैं अमृतसर आया हुआ
था। सम्भवतः जयचन्द्रजी से मिलकर मैं सीधा अमृतसर आया था। सिक्खों का
जो महान् दृश्य उस समय मैंने देखा उसकी तुलना भारतवर्ष के किसी प्रान्त से