बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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अर्थात् मेरे लायक भी कोई युवक इस भीड मे मिल सकता है या नही यह भी मैं
देखता जा रहा था। एक दफा अचानक ही मैंने एक खुले कमरे के अन्दर एक
युवक को बैठकर किताब पढते हुए देखा । मेरा दिल उल्लसित हो उठा । मैं सीधा
उस कमरे के अन्दर चला गया । मेरे साथ मेरे दो-एक साथी भी कमरे के भीतर
चले आए । हम लोगो को देखकर वह नौजवान किताब की तरफ से अपनी दृष्टि
हटाकर हम लोगो की तरफ देखने लगा । मैंने उस नवयुवक की दो आँखो मे ऐसी
चीजे देखी जिससे मैने अनुमान किया कि यह युवक नितान्त निविष्ट चित्त होकर
अपनी किताब पढ रहा था । किताब की तरफ दृष्टि आकृष्ट होते ही मैंने देखा कि वह
एक अग्रेजी किताब थी । मैंने उस युवक से क्षमा प्रार्थना करते हुए कहा कि इस
स्थान पर एक नवयुवक को दत्तचित्त होकर किताब पढते हुए देखकर हम लोग
आकृष्ट हुए है और इसलिए आपके पास आए हैं। युवक ने सहृदयता के साथ हम
लोगो को अपने तख्त पर बैठाया । यह बिचारा भी तो नितान्त अकेला ही था ।
मनुष्य समागम से वह युवक कुछ असन्तुष्ट हुआ हो ऐसा मालूम नही पडा ।
अग्रेजी किताब को उठाकर मैंने देखा वह भारतीय इतिहास पर परजिटर साहब
का आधुनिकतम ग्रन्थ था । भारतीय इतिहास पर युवक से बातचीत होने लगी ।
इस प्रकार कुछ देर तक बातचीत होने के बाद यह मालूम हुआ कि उस युवक की
एक बहन श्रीमती पार्वतीदेवी सत्याग्रह आन्दोलन के सिलसिले मे राजद्रोहात्मक
भाषण देने के कारण दो साल की कडी कैद की सजा फतेहगढ की सेण्ट्रल जेल मे
भुगत रही है । अपनी बहन से मिलने के लिए वह युवक फतेहगढ आया