बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन / 261
हम किसी की कोई सहायता नही कर सकते हैं और न ऐसा करना सम्भव ही है।
इसलिए डकैती के रुपये सदस्यों में बाँट दिए जाते हैं। और इस प्रकार से सहा-
यता देने पर अपने दल का संगठन कार्य बहुत सहज हो जाता है। स्वामीजी की
सब बातें सुनकर मैंने नम्रतापूर्वक उनमे निवेदन किया कि ऐसी सस्था के साथ
हम लोग कोई सम्बन्ध नही रखना चाहते है। मैने बता दिया कि हम लोगो का
क्रान्तिकारी आन्दोलन दूसरे प्रकार के सिद्धान्तो पर प्रतिष्ठित है। हम लोग
पुरस्कार के आधार पर सगठन-कार्य नही करते। यहाँ तो सर्वस्व खोने का प्रण
करके कार्यक्षेत्र में अवतीर्ण होना पडता है। यहाँ तो व्यक्ति गत चरित्र एव समाज
सेवा के मार्ग से नये आन्दोलन की सृष्टि करना हमारा काम है। समय आने पर
केवल मात्र सिपाहियो की आवश्यकता होगी तब हम लोग पुरस्कार की बात
सोचेगे। अभी तो हम लोगो का काम है सर्वस्व त्यागी नौजवानो की टोली तैयार
करना। जब समग्र भारतवर्ष मे ऐसी टोली बन जाएगी तब हम लोग दूसरे काम
के बारे मे सोचेगे। मुझे इस बात पर बहुत आश्चर्य हुआ कि उन नवीन सन्यासी
महोदय ने मेरे साथ प्रचड तर्क किया यह प्रमाणित करने के लिए उनके सिद्धान्त
हम लोगो के सिद्धान्त से कही अधिक कार्यकारी और समयोपयोगी है। सन्यासी
जी चाहते थे हम सब उनके साथ मिलकर एक विराट् क्रान्तिकारी दल बनावे।
मुझे इस बात से बहुत आश्चर्य हुआ कि हमारे साथी श्री छेदालालजी भी कुछ हद
तक सन्यासीजी की बातो का समर्थन करते थे। मैने यह तो नही कहा कि पेशे-
वर डकैतो के साथ हम लोगो का कोई सम्बन्ध नही रह सकता लेकिन मैंने स्वामी
जी को यह अच्छी तरह समझा दिया कि हम दोनो के सिद्धान्तो मे आकाश-पाताल
का अन्तर है। हम दोनो के दल एक साथ काम नही कर सकते। स्वामीजी अन्त
मे कुछ होश मे आकर यह कहकर चल दिए कि आप लोग कुछ भी नही कर
पाएँगे। मैने मुस्कराकर नम्रता के साथ उन्हे विदा किया। फिर श्री छेदालाल
को भी क्रान्तिकारी आन्दोलन के बारे मे बहुत कुछ कहा और समझा दिया कि
किसी भी अवस्था मे हमे मामूली डाकुओ को अपने साथ नही लेना है। हमे
भूलना उचित नही है कितने बडे ध्येय को सामने रखकर समाज मे नये सिरे से
जान लाने के लिए हम लोग कार्यक्षेत्र मे अवतीर्ण हुए हैं।
इसी समय किसी विश्वस्त सूत्र से मुझे पता चला कि यू० पी० मे फिर एक
क्रान्तिकारी षड्यन्त्र का मामला चलने वाला है और मुझे भी षड्यन्त्र मे घसीटा
जाएगा। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। अभी तो मुश्किल से सालभर ही काम किया
होगा। इतने मे ही फिर षड्यन्त्र का मामला चलने वाला है। मुझे अपने आदमियो
मे से किसी-किसी पर कुछ सन्देह होने लगा। गुप्त रीति से काम मे यह एक बड़ा
भारी दोष है कि जरा-सी बात से ही अपने विश्वस्त आदमियों पर भी सन्देह
उत्पन्न हो जाता है। मुझे इस खबर पर कुछ सन्देह हुआ, कुछ डर भी हुआ।
इस अवस्था मे मैंने यह उचित समझा कि अब घर मे नही रहना चाहिए। जाने
खबर सच है या झूठ फिर भी उचित यही है कि सावधानी से काम लिया जाय।