बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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मैं भी श्री छेदालाल और श्री बनवारीलाल के साथ रहने लग गया, अवसर देख-
कर घर ही में भोजन कर आता था, क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि दल का खर्च
अनावश्यक रूप से बढ़ जाय ।
मुझे इस समय ठीक स्मरण नहीं है, संभव है, इसी के कुछ पहले निजी सांसा-
रिक कारणों से कुछ अर्थोपार्जन की भावना से मैं व्यस्त हो उठा था। मुझे
सैण्ड्स साहब की बातें याद आईं। सैण्ड्स साहब ने मुझे अण्डमन से लौटते ही
कह दिया था कि यदि भविष्य में कभी भी किसी सहायता की आवश्यकता
अनुभव करो तो मुझसे कह देना। मुझसे बन पड़ा तो मैं अवश्य ही तुम्हारी सहायता
करूँगा। इस बात को ध्यान मे रखते हुए मैंने सैण्ड्स साहबे के पास एक चिट्ठी
भेजी। सैण्ड्स साहब उस समय सी० आई० डी० (C. I. D.) से अलग होकर
मामूली पुलिस विभाग में डी० आई० जी० आफ पुलिस (D.I.G. of Police)
थे इनसे मैं अण्डमन से लौटते ही फैजाबाद में मिला था। सैण्ड्स साहब ने पत्रोत्तर
मे मुझको लिखा अमुक तारीख को मैं बनारस जाऊंगा और उस समय मुझसे
मुलाकात करो। मेरे पीछे सदा सर्वदा खुफिया पुलिस के सिपाही लगे रहते थे।
जिस समय मैं दल के काम से जाता था तो इनकी दृष्टि बचाकर मैं अक्सर खिसक
जाया करता था। लेकिन जब निर्दोष काम में कही जाता था तो मुझे इस बात
की परवाह नही रहती थी कि खुफिया पुलिस के आदमी मेरा पीछा कर रहे हैं।
बनारस मे सैण्ड्स साहब से मिला। सैण्ड्स साहब जानना चाहते थे कि मैं किसी
विभाग मे कितनी तनख्वाह पर काम कर सकता हूँ। कोई विशेष जगह कही पर
खाली हो तो मैं उन्हें बताऊँ। यदि उनका कोई हाथ रहता है तो वह अवश्य मेरी
मदद करेगे। मैने उन्हें बताया कि किसी विशेष जगह के बारे मे मैं नहीं जानता
इत्यादि। सैण्ड्स साहब ने बाद को मुझसे यह कहा कि जैसी परिस्थिति होगी
और मैं जो कुछ सहायता दे सकूँगा इसके बारे में मैं पत्र द्वारा तुम्हें सूचना दूंगा।
कुछ दिन बाद मेरे पास उनका एक पत्र आया जिसमे लिखा था कि मुझे एक
अच्छी जगह दी जा सकती है। करीब एक सौ रुपया तनख्वाह भी मुझे मिल
सकती है। लेकिन मुझे एक शर्त स्वीकार करनी पड़ेगी कि भविष्य में जब तक मैं
इस मुलाजमत मे रहूँगा तब तक किसी प्रकार के भी राजनैतिक आन्दोलन मे
भाग नही लूँगा। सैण्ड्स साहब ने यह भी आशा दिलाई थी कि मुझे बहुत अच्छे
डिपार्टमेन्ट में काम दिया जाएगा जिससे भविष्य में मेरे लिए बहुत उन्नति का
मार्ग खुला रहेगा। मैंने देखा कि मुझे एक अच्छा अवसर मिल रहा है लेकिन
किसी प्रकार की भी शर्त कबूल करने में मेरे दिल ने गवाही नही दी। मैंने सोचा
कि आजन्म कालेपानी की सजा से मैं जब मुक्त हुआ तो उस समय भी मैंने कोई
शर्त नही मानी थी। इस समय किसी प्रकार की शर्त मानना मेरे लिए उचित
नही होगा यद्यपि मैं यह देख रहा था कि सैण्ड्स साहब के प्रस्ताव में एक बहुत
ही न्याययुक्त बात यह थी कि जितने दिन तक मैं मुलाजमत में रहूँ उतने दिन
तक किसी प्रकार के राजनैतिक आन्दोलन में भाग न लूँ। मैंने सैण्ड्स साहब को