बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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हैं जिससे देश में क्रूर एवं प्रबल दलबन्दी की भावना उत्पन्न होती है। ऐसा मालूम
पड़ता है कि इन नेताओं के दिल में क्रान्तिकारियों के प्रति एक उग्र कटुता-सी है।
कभी तो ये नेतागण क्रान्तिकारी आन्दोलन को उसे इफेंटाइल (Infantile) अर्थात्
बालकोचित कहकर निन्दा करते हैं और कभी क्रान्तिकारी आन्दोलन को फैसि-
स्टक कहकर अपनी जलन को शान्त करते हैं। और कभी ऐसा भी कह देते हैं कि
क्रान्तिकारियो ने देश की प्रगति को पचास साल पीछे हटा दिया है। यह भी
आक्षेप किया जाता है कि क्रान्तिकारीगण बलपूर्वक असहाय निर्दोष व्यक्तियो को
शहीद बना देते हैं। इस मनोवृत्ति के पीछे शान्त युक्ति नहीं है, इसके पीछे ऐति-
हासिक प्रेरणा भी नहीं है और सर्वोपरि इसके पीछे देश-हित की कल्याणमयी
कामना भी नहीं है। इसके पीछे केवल अहंकार का एक उग्र रूप विद्यमान है।
कांग्रेस के नेताओ ने भी सरलतापूर्वक आत्यन्तिक रूप से भारत की स्वाधीनता के
प्रश्न को न स्वीकार किया और न उसका विचार किया । जिस समय संसार का
प्रत्येक पराधीन राष्ट्र अपनी स्वाधीनता को प्राप्त करने के लिए बेचैन है, तड़प
रहा है, असाध्य साधन के लिए सर्वस्व विसर्जन करने को भी तैयार हो रहा है
एवं अद्भुत साहस और निष्ठा के साथ अपने ध्येय के पीछे लगा हुआ है, उस
समय भारतवर्ष के लब्ध-प्रतिष्ठित नेतागण अपने सामर्थ्य को अपने ध्यान में
रखते हुए ही भारतवासियों को रास्ता दिखाने की हिम्मत करते हैं और उनके
नेतृत्व में जो विश्वास नहीं करते हैं, ऐसे क्रान्तिकारियों के प्रति वे कटुतापूर्ण
उद्गार करते हैं। लेकिन जैसे अकाली नेतागण एक तरफ क्रान्तिकारियों के प्रति
सहानुभूति सूचक शब्द व्यवहार करते थे इसी प्रकार दूसरी तरफ अकाली नेतागण
सरदार गुरुमुखसिंह जैसे विद्रोहियों का छिपकर साथ देते थे और उनकी सहायता
भी करते थे।
सरदार गुरुमुखसिंह के कमरे में अकालियों के एक सर्वमान्य नेता थे। सलाह
हो रही थी कि आतंकवाद की सृष्टि करके अकाली आन्दोलन को सहायता
पहुँचाई जा सकती है या नहीं। मैं जानता था कि अपना दल अभी पूर्ण रीति से
संगठित नहीं हुआ है तथापि यह भी मैं जानता था कि दो-चार सरकारी अफसरों
को यम-धाम पहुँचाने के लिए जितनी शक्ति की आवश्यकता है उतनी शक्ति हमने
प्राप्त कर ली है। मैं यह भी जानता था कि आतंकवाद के चक्कर में पड़कर
क्रान्तिकारी आन्दोलन को काफी धक्का लग सकता है। मैं यह भी खूब जानता
था कि आतंकवाद के द्वारा कभी भी देश को स्वाधीन नहीं किया जा सकता।
लेकिन देशवासियों की सहानुभूति आकृष्ट करने के लिए जनान्दोलन के नेतागणों
की सहायता पाने के लिए हम लोगों को बार-बार आतंकवाद के चक्कर में पड़ना
पड़ा है। इस पहलू को विचार-विनिमय नामक अपनी पुस्तक में पाठकों के सामने
रखना मैं भूल गया हूँ। भारत के आतंकवाद के मूल में यह भी एक प्रबल बात थी
कि बहुत-से धनी व्यक्ति क्रान्तिकारियों को सहायता देने के लिए इस शर्त पर
तैयार हो जाते थे कि क्रूर अत्याचारी राजपुरुषों को समाप्त कर दिया जाय।