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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

250 / बन्दी जीवन
मुलाकात हो गई। मेरे मकान में आपने एक दिन खाना भी खाया। बाद को
इनसे आगरा में जाकर मिला। श्री देवनारायणजी ने मैनपुरी केस के बारे में
तमाम बातें मुझे बताईं। शाहजहाँपुर निवासी श्री रामप्रसादजी बिस्मिल भी
मैनपुरी दल में एक प्रमुख व्यक्ति थे। श्री देवनारायणजी से पता चला कि राम-
प्रसादजी और देवनारायणजी में एक भीषण विरोध है। मेरे लिए अब यह एक
समस्या हो गई कि इन दोनों व्यक्तियों में से किसको अपने दल में लूँ। मेरे दिल
में एक सन्देह पैदा हुआ कि यदि देवनारायणजी को साथ लेता हूँ तो सम्भव है
कि रामप्रसादजी मेरे साथ न आएँ और यदि रामप्रसादजी मेरे साथ आते हैं तो
सम्भव है देवनारायणजी मेरा साथ न दें।
देवनारायणजी से मैंने कहा कि आप देहात को छोड़कर आगरा में आकर डट
जाएँ। देवनारायणजी ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। श्री देवनारायणजी
ने मुझे आगरा में कुछ बातें बताईं थीं जिनका इस स्थान पर उल्लेख कर देना
नितान्त प्रासंगिक होगा। एक तो देवनारायणजी ने मुझे यह अच्छी प्रकार सम-
झाना चाहा कि अब मुझे प्रकाश्य आन्दोलन में कदम रखना चाहिए। दूसरे,
उन्होंने रामप्रसादजी के बारे में कुछ ऐसी बातें बताईं जिसे इस स्थान पर वर्णन
करने में मन संकुचित हो जाता है। देवनारायणजी की बात पर यकीन कर लेने
पर रामप्रसादजी को दल में ले लेना निहायत अनुचित जान पड़ता था। लेकिन
मैंने दिल में सोचा कि देवनारायणजी और रामप्रसाद के बीच परस्पर घोर विद्वेष
है, इसलिए देवनारायणजी की बातों पर पूर्ण रूप से विश्वास करना उचित नहीं
है। प्रकाश्य आन्दोलन में मैं भी लगना चाहता था, इसलिए देवनारायणजी की
इस बात को मैंने सर्वान्तःकरण से स्वीकार कर लिया। देवनारायणजी से बातचीत
करके मुझे बहुत-कुछ प्रसन्नता हुई। वे बहुत गम्भीर प्रकृति के समझदार आदमी
थे। लेकिन हमारे देश का यह परम दुर्भाग्य है कि गम्भीर प्रकृति के समझदार
व्यक्तियों ने निहायत ही कम संख्या में भारतीय विद्रोह आन्दोलन में भाग लिया
है। पता नहीं यह परम दुर्भाग्य या सौभाग्य की बात हुई कि श्री देवनारायणजी
ने अपने वादे को पूरा नहीं किया। उनसे बातचीत करके यह तय हुआ था कि
देवनारायणजी अपने गाँव को छोड़कर आगरा में जाकर अपना केन्द्र स्थापित
करेंगे। यदि देवनारायणजी ऐसा करते तो उत्तर भारत का विप्लव आन्दोलन
और भी गौरवमय रूप धारण करता।
इतिहास के पृष्ठों में 'सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् मा ब्रूयात् सत्यं अप्रियम्' इस
वाक्य का स्थान नहीं है। लेकिन मैं ऐसा कुछ लिखना नहीं चाहता जिससे क्रान्ति-
कारी आन्दोलन को धक्का पहुँचे। तथापि एक बात यहाँ यह कह देना नितान्त
आवश्यक है कि क्रान्तिकारी आन्दोलन गुप्त और षड्यन्त्र रूप से होने के कारण
अवांछनीय एवं अनुपयुक्त व्यक्तियों का इस आन्दोलन में शामिल हो जाना एक
विषम संकट का कारण हो जाता है। आज भी मुझे अत्यन्त भय है कि यदि योग्य
व्यक्ति क्रान्तिकारी आन्दोलन करना आरम्भ कर देता है तो शुद्ध हृदयवाले

क्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन / 251
त्यागी साहसी युवक तो उसे मिल जाएँगे लेकिन विचारशील एवं योग्य नेतृत्व के
अभाव से इन सब नवयुवकों का अमूल्य जीवन सार्थक होने नहीं पाएगा। बंगाल
में ऐसे बहुत-से तुच्छ अयोग्य छोटे-छोटे विप्लवी दलों से मैं खूब परिचित रहा।
मुझे इस बात की आशंका रही कि यू० पी० मे भी वैसे ही अयोग्य व्यक्तियों के
नेतृत्व में बंगाल की तरह भिन्न-भिन्न छोटी-छोटी पार्टियां न खड़ी हो जाएँ।
जिस दिन मैंने अण्डमन से लौटकर सर्वप्रथम यू० पी० विप्लव दल का संगठन
पुनः क़ायम किया था उस समय यहाँ पर और कोई दल काम नहीं कर रहा
था।
सन् 1920 मे अगस्त-सितम्बर महीने में कलकत्ता मे कांग्रेस का एक विशेष
अधिवेशन हुआ था। उस अवसर पर कलकत्ता के प्रसिद्ध बैरिस्टर श्री बी० सी०
चटर्जी साहब ने मैनपुरी केस के एक मुक्त राजबन्दी के साथ मेरा परिचय करा
दिया था। उनका नाम है श्री चन्द्रधर जौहरी। उनकी आंखों मे मैंने उस दिन
जो जोश और आन्तरिकता देखी थी उससे यह अनुमान किया था कि यह व्यक्ति
जिस काम को हाथ मे लेगा उस काम के पीछे सर्वस्व दे देगा। सच तो यह है
कि जौहरीजी को देखकर तत्काल ही मेरे मन मे जो भावना पैदा हुई थी उसका
अग्रेजी नाम है Fanatical zeal, लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि इनसे बाद को
फिर मिलने का अवसर मुझे नही मिला। मुझे इस वक्त ठीक याद नही है कि
जौहरीजी सन् '21 के आन्दोलन मे गिरफ्तार हो गए थे या नही। सम्भव है, हो
गए हो और इसीलिए संभव है फिर बाद को उनसे मेरी मुलाकात नही हुई। ये
बिचारे शर्त पर छोड़े गए थे। जिन शर्तों पर छूटे थे उनमे से एक शर्त यह भी
थी कि यदि सरकार के खिलाफ किसी आन्दोलन मे जौहरीजी भाग लेगे तो उन्हें
फिर पुरानी कैद पूरी काटनी पडेगी। इस कारण जब जौहरीजी ने सत्याग्रह
आन्दोलन मे भाग लिया तो जिला-कलक्टर ने उन्हें दफ्तर मे बुलाकर यह हुक्म
सुनाया कि तुमने सरकार के विरुद्ध आन्दोलन मे भाग लिया है इसलिए तुम्हे
अपनी पुरानी कैद फिर काटनी पडेगी और तुम यहां से सीधे जेल चले जाओगे।
संभव है, यह सन् 1921 की बात है। इनसे जो मुझे आशा थी वह यो ही विलीन
हो गई।
मैं स्वयं छात्र न था। एव पहले कभी इलाहाबाद मे रहा नही था इसलिए
भी इलाहाबाद के युवकगणो से मेरा कुछ भी परिचय न था। क्रान्तिकारी
आन्दोलन की सफलता युवक-मडली पर ही निर्भर रहती है ऐसी मेरी समझ थी।
क्रान्तिकारी आन्दोलन के बारे में मेरी धारणा यह थी कि मध्यम श्रेणी के युवक
वृन्द ही क्रान्तिकारी आन्दोलन का नेतृत्व कर सकते हैं। यह बात सत्य है कि
संघर्ष के समय किसान-मजदूरों की श्रेणी से ही आदमी निकलेंगे, जो यथार्थ में
सिपाही का काम करेंगे। लेकिन सिपाही अपना नेतृत्व स्वयं नही कर सकता।
इतिहास में बहुत दफे ऐसा देखा गया है कि राष्ट्रीय उथल-पुथल के अवसर पर
सेनापति गण सर्वेसर्वा बन जाते हैं। तब स्वाधीनता के स्थान पर प्रजातन्त्र की

252 / बन्दी जीवन
जगह सामरिक तन्त्र स्थापित हो जाता है। इसका प्रतिकार तभी हो सकता है
जब प्रजा में अपनी नेतृत्व करने की शक्ति पैदा हो। क्रान्तिकारी उथल-पुथल के
इतिहास आदि पढ़कर अभी तक मेरी यही धारणा बनी रही कि मध्यम श्रेणी के
शिक्षित सम्प्रदाय से ही भारत के भावी समाज-संगठनकारी गण निकलेंगे।
महात्मा गांधी के अतुलनीय आन्दोलन के बाद भी मेरा यह दृढ़ विश्वास बना
रहा कि भारत की आम जनता उथल-पुथल के लिए जितनी तैयार है उनका
नेतृत्व करनेवाले उपयुक्त व्यक्तियों का उतना ही अभाव है। एक बात तो यह
थी। दूसरी बात यह थी कि महात्माजी और उनके अनुयायीगण अथवा जन-
आन्दोलन के दूसरे प्रतिष्ठित नेतागण भारतवर्ष को पूर्ण रूप से स्वतन्त्र बनाने के
लिए सचेष्ट तो थे ही नही बल्कि वे नेतागण भारत की स्वाधीनता के प्रश्न को
अलीक स्वप्नवत् समझा करते थे। वे कभी भी यह विश्वास नही करते थे कि
भारतवर्ष को स्वाधीन करने का प्रश्न वास्तविक जगत् का प्रश्न है। ये सब लब्ध-
प्रतिष्ठ नेतागण यह समझते थे कि कुछ बहके हुए भारत के नौजवान भारत को
स्वाधीन करने का स्वप्न देखा करते हैं। यह प्रश्न आये दिन का प्रश्न ही नही है।
भारत के सर्वमान्य नेतागण स्वाधीनता के प्रश्न को व्यवहार में लाने योग्य सम-
झते ही न थे। सम्भव है आज भी वे ऐसा ही समझते हों। महात्माजी और उनके
साथियों का कहना है कि "स्वाधीनता, स्वाधीनता करके चिल्लाने से क्या होता
है। जो लोग ऐसा चिल्लाया करते हैं वे लोग आज तक कुछ करके दिखला भी
सके हैं ? जो कुछ कर सकते है वह तो करते नहीं ? व्यर्थ का शोर मचाते है।
लेकिन भारत को पूर्ण रूप से स्वतन्त्र करने के प्रश्न को जो युवकवृन्द व्यावहारिक
रूप में लाना चाहते थे ? वे ऐसा समझते थे कि भारत को स्वाधीन करने के
लिए जो कुछ करना चाहिए, उसके लिए भारत के प्रकाश्य आन्दोलन के नेतागण
प्रस्तुत नही थे। और इसीलिए वे भारत की स्वाधीनता के प्रश्न को व्यावहारिक
प्रश्न नही समझते थे। क्रान्तिकारियों और कांग्रेस के नेतागणों के दृष्टिकोण में
यही सबसे बड़ा अन्तर है। इस दृष्टिकोण में ऐसा अन्तर रहने के कारण क्रान्ति-
कारी और कांग्रेस-आन्दोलन के मार्ग में भी बहुत अन्तर है। अस्तु, इस स्थान
पर क्रान्तिकारी मार्ग के बारे में मैं कोई विशेष विचार-विमर्श नही करना
चाहता। यहाँ पर इतना कहना पर्याप्त है कि मैं जमशेदपुर से लौटकर युवक
वृन्दों में ही काम करना चाहता था।
मेरे लिए इलाहाबाद के युवकवृन्दों से परिचित होने के लिए कोई सहज और
सरल उपाय नही था। इसलिए मैने प्रतिदिन इलाहाबाद के विभिन्न होस्टलों में
जाना प्रारम्भ कर दिया। जान-पहचान तो किसी से थी ही नहीं। जहाँ देखता
था कि दो-तीन नौजवान बरामदे में खड़े होकर बातचीत कर रहे हैं उनके पास
थोड़ी दूर पर मैं भी जाकर खड़ा हो जाता था। उनकी बातें सुना करता था।
ख़याल यह रहता था कि यदि ये युवकगण राजनीति के बारे में कुछ बातचीत
करने लगें तो मैं भी अवसर देखकर उसमें शामिल हो जाऊँ। लेकिन दुर्भाग्य की

क्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन / 253
बात है कि इलाहाबाद में जितने दिन ऐसी टोलियों के पास खड़े होकर इन लोगों
का वार्तालाप सुना। उनमें से एक दिन भी इन लोगों को किसी भी राजनीतिक,
सामाजिक या साहित्यिक प्रश्नों पर बातचीत करते हुए नहीं पाया। इन लोगों
की बातचीत इतनी दुर्नीतिपूर्ण एवं मलीन होती थी कि उनके पास खड़ा रहना
भी अपमानजनक एवं अधोगतिकारी मालूम होता था। इलाहाबाद के बड़े-बड़े
होस्टलों में मैंने शायद ही किसी के कमरे में कोई मासिक पत्र देखा हो। जो दो-
चार अच्छे लड़के होते थे, वे अपने पढ़ने-लिखने में ही मग्न रहते थे और कुछ
छात्र खेल-कूद में लगे रहते थे। सन् 1920-21 में कितना बड़ा आन्दोलन हमारे
देश में होता रहा लेकिन हमारे युवकवृन्द के मन को इस आन्दोलन ने कितना
थोड़ा स्पर्श किया। मैं एक प्रकार से हताश हो गया। मैं बीच-बीच में बनारस भी
जाता रहा और कानपुर भी। सुरेशबाबू कुछ दिन कानपुर के 'प्रताप प्रेस' में
काम करते रहे और कुछ दिन 'वर्तमान' के दफ्तर में। बनारस में श्री सुरेन्द्रनाथ
मुखर्जी नामक एक बड़े पुराने साथी थे। इनकी सहायता से श्री राजेन्द्रनाथ
लाहिड़ी नामक एक युवक से मेरा परिचय हुआ। इनके अलावा एक और पुराने
साथी भी थे, जिन्होंने मेरी शादी के समय कुछ चुभती हुई बातें मुझे कही थीं। वे
भी मेरे साथ काम करने लगे थे। इनका नाम अपने समझने के लिए यहाँ पर
तारकनाथ रख देता हूँ। उधर कानपुर में जहाँ तक मेरा ख्याल है, सुरेशबाबू की
सहायता से श्री रामदुलारे त्रिवेदी से जान-पहचान हुई। सुरेशबाबू की सहायता
से और भी दो सज्जनों से जान-पहचान हुई। उनके नाम हैं : श्री वीरभद्र तिवारी
एवं श्री मन्नीलालजी अवस्थी। उस समय मन्नीलालजी एक राष्ट्रीय स्कूल के
हेडमास्टर थे। अवस्थीजी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के ग्रेजुएट भी थे। श्री राजेन्द्र
लाहिड़ी बी० ए० में पढ़ते थे। इलाहाबाद में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ मैं
मिलने-जुलने लग गया। इस प्रकार से दो नौजवान मुझे मिले—एक श्री बनवारी-
लालजी, दूसरे श्री नरेन्द्रनाथ बनर्जी। इन्हें कांग्रेसवाले नोडू भी कहा करते थे।
इनकी सहायता से अलीगढ़ के ठाकुर खानदान के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के साथ
मेरा परिचय हुआ। ये भी हमारे साथ काम करने लगे। इलाहाबाद के श्री
बनवारीलाल की सहायता से रायबरेली में भी कुछ हमारे आदमी बन गए, जिनका
नाम आज भी बतलाना उचित नहीं होगा। अलीगढ़ के ठाकुर साहब की सहायता
से फतेहगढ़ पहुँचा एवं अलीगढ़ तहसीलों में भी पहुँचा। जहाँ तक मुझे स्मरण है
इन्ही ठाकुर साहब की सहायता से मेरठ में श्री विष्णुशरणजी दुबलिश के पास
पहुँचा। इस वक्त मुझे ठीक स्मरण नहीं है कि दुबलिशजी की सहायता से
श्री रामदुलारेजी के पास पहुँचा था या नहीं। श्री विष्णुशरणजी की सहायता से
श्री महावीर त्यागीजी से जान-पहचान हुई। श्री महावीर त्यागी की सहायता से
शाहजहाँपुर में श्री रामप्रसाद बिस्मिल और श्री अशफाकउल्लाजी के पास पहुँचा।
कानपुर के श्री मन्नीलाल अवस्थी की सहायता से फतेहपुर पहुँचा। सन् 1922
के अन्दर इन आठ जिलों में मेरा काम फैल गया। लेकिन यह काम एक दिन में

254 / बन्दी जीवन
नहीं हुआ। सम्भव है सन् 1922 के अन्त तक ढाका अनुशीलन समिति की तरफ
से कोई प्रतिनिधि बनारस पहुंचे हों। सन् 1921 में नागपुर कांग्रेस से लौटने के
पश्चात् जब ढाका अनुशीलन समिति के श्री प्रतुल गांगुली के साथ मैं बनारस
आया था उस समय अर्थात् सन् 1922 के प्रारम्भ में बनारस में ढाका समिति के
कोई प्रतिनिधि उपस्थित नहीं थे। यद्यपि श्री प्रतुल गांगुली के कुछ परिचित व्यक्ति
उस समय बनारस में हिन्दू कॉलेज में पढ़ते थे परन्तु इन छात्रों से प्रतुलजी ने
मेरा परिचय नहीं कराया। अर्थात् उस समय फिर मैंने यह अनुभव किया कि
प्रतुल गांगुली अपने दल की सब बातें मुझे बताना नहीं चाहते थे। सन् 1922 के
अन्त तक मेरा कार्य बहुत-कुछ अग्रसर हो चुका था। इसे संगठन न कहकर
संगठन का एक ढांचा कहना ही उचित होगा। मुझे इस वक़्त ठीक याद नहीं है,
लेकिन जहां तक मुझे याद है, सम्भव है, सन् 1922 में ही मैं भगतसिंह के पास
लाहौर पहुँच गया। जिस प्रकार से मैं इलाहाबाद के होस्टल में नवयुवकों को
ढूंढ़ता फिरता था, उसी प्रकार से एक दिन फतेहगढ़ में अपने अजीब तरीके के
कारण एक प्रतिभावान नवयुवक के पास जा पहुँचा जिनकी सहायता से अन्त में
मैं भगतसिंह के पास भी पहुँच गया। इसका एक पूरा इतिहास है। वह जैसा रोचक
है, वैसा ही कौतूहलपूर्ण भी है।
जमशेदपुर से इलाहाबाद लौट आने के पहले मैं दो-तीन बार कलकत्ता गया
था। कलकत्ता में विभिन्न क्रान्तिकारी दल के आदमियो से समय-समय पर बात-
चीत करता रहा। इलाहाबाद लौट आने के बाद भी मैं कई बार कलकत्ता गया।
जिस प्रकार युक्त प्रान्त में मैं अपना संगठन कार्य करने की चेष्टा कर रहा था ?
उसी प्रकार कलकत्ता मे भी मैं अपना एक दल बनाना चाहता था। जमशेदपुर मे
रहते समय भी मैं नितान्त असावधान नहीं रहा। समय पाकर मैं कभी नहीं
चूका।
एक दिन कलकत्ता के मिसी पार्क में मैंने देखा कि कुछ भद्र नौजवान एकत्र
होकर बातचीत कर रहे हैं। मैं भी उनके पास जाकर बैठ गया। थोड़ी ही देर मे
मालूम पड़ा कि ये सब नौजवान आधुनिक राजनीतिक प्रश्न पर बातचीत कर
रहे हैं। मैंने भी इन लोगों के वार्तालाप में धीरे-धीरे योग देना प्रारम्भ कर दिया।
इस प्रकार इस टोली के साथ मेरा खूब परिचय हो गया। इनमें से एक युवक
महाशय अच्छे घर के थे। लड़ाई के समय ब्रिटिश सेना में सिपाही के रूप में इराक
और मैसोपोटामिया तक पहुँच गए थे और अपनी कार्य-कुशलता के कारण पलटन
में ओहदा भी पा चुके थे। जिस समय का मैं उल्लेल कर रहा हूँ, उस समय
आप यूनिवर्सिटी कोर में एक अच्छे पदाधिकारी थे। इधर आप इंजीनियरिंग
कॉलेज में भी पढ़ते थे। इनकी सहायता से बंगाल में कुछ और नवयुवकों से मेरा
परिचय हुआ। लेकिन अनुशीलन समिति के किसी भी सदस्य को मैंने कभी कुछ
बताया नहीं कि मैं क्या कर रहा हूँ और क्या नहीं कर रहा हूँ। एक दफा ढाका
अनुशीलन समिति के प्रमुख नेता श्री प्रतुलचन्द्र गांगुली से मैंने यह कहा था,

क्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन / 255

"भाई ! पता नहीं मैं आगे चलकर फिर काम करूँगा या नही। यदि मैं काम
करना छोड़ दूँ तो मेरे जितने रिसोर्सेज (अनुगामी व्यक्ति और साधन) हैं, सब
आप लोगों के सुपुर्द कर दूंगा और यदि मैं काम करता रहूँगा तो आप लोगो को
बता दूंगा कि ऐसा कर रहा हूँ या नही। लेकिन तुम लोग तो दिल खोलकर मेरे
साथ भविष्य के बारे मे बातचीत कुछ करते ही नही हो। इस तरह कैसे काम चल
सकता है ! सहयोगिता हो तो दोनो तरफ से हो। यदि तुम मेरे साथ खुलकर
बातचीत नहीं करोगे तो मैं भी किस प्रकार से तुम लोगो के साथ दिल खोलकर
काम करूँ।" मेरे लिए मुसीबत की बात यह थी कि कलकत्ता के विभिन्न क्रान्ति-
कारी दल के आदमी यह समझते थे कि मै ढाका अनुशीलन समिति मे शामिल
हूँ। इधर ढाका अनुशीलन समितिवाले मेरे साथ खुले दिल होकर काम नहीं
करना चाहते थे। ढाका समिति के एक और प्रमुख नेता श्री रमेशचन्द्र चौधरी ने
तो एक दफा घमण्ड मे आकर ऐसा भी कहा था कि "संगठन के बारे मे आपसे हम
लोग कुछ सीखना नही चाहते।" इन सब कारणो से मैंने भी समझ लिया था कि
मुझे अकेला ही सब काम करना पड़ेगा। एक तरफ जैसे ढाका अनुशीलन समिति
के नेतागण मुझे अपनी सब बाते नही बताना चाहते थे ? वैसे ही दूसरी तरफ वे
यह भी नही चाहते थे कि मै उनसे अलग हो जाऊँ। इसलिए उनकी हमेशा यह
नीति रहती थी कि हर प्रकार से मुझे अपने दल मे रखने के लिए तरह-तरह की
कोशिशे करते थे। और मुझे समझाना चाहते थे कि मुझे अपनी सब बाते बता
देने मे उन्हे कोई आपत्ति नहीं है। काम करते-करते सब बातें स्वय ही जान
जाऊँगा। उनकी यह दुरंगी चाल मुझे पसन्द न थी। इसलिए मैं उनसे हमेशा
कन्नी काटा करता था। मैंने उन्हे समझने नहीं दिया कि मै भी कुछ काम कर रहा
हूँ। सन् 1922 के अन्त तक मुझे पता चला कि ढाका समिति ने अपनी तरफ से
एक आदमी बनारस को भेज दिया है। जब कभी मै बनारस जाता था तो यह
व्यक्ति मेरे पास आकर मेरे साथ बातचीत करने की चेष्टा करना था।
इनका नाम था श्री सतीशचन्द्र सिंह। मैंने कलकत्ता मे इनको कई बार देखा था।
इनसे मेरा थोड़ा-बहुत परिचय था। जिस समय मैं बनारस षड्यन्त्र मामले के
सिलसिले मे जेल में था उस समय श्री सतीशचन्द्रसिंह बिहार मे काम करने आए
थे। श्री सतीशसिंह कुछ पढे-लिखे आदमी नही थे। राजनीति वह क्या समझते
होगे, मैं कह नही सकता। उनमे एक सच्चे सिपाही के सब गुण अवश्य थे। लेकिन
केवल सिपाही-मात्र होने से ही तो सगठन का कार्य ठीक प्रकार से नही हो सकता।
मुझे तो दुख के साथ यह भी कहना पडता है कि वारीन्द्र, उपेन्द्र, हेमचन्द्र
इत्यादि के मुकाबले के क्रान्तिकारी नेता बगाल-भर मे और पैदा नही हुए।
श्री अरविन्द के समय क्रान्तिकारी आन्दोलन का नेतृत्व-जैसे उपर्युक्त विशेष
व्यक्तियो के हाथ मे था वैसा बाद को नही रहा। ढाका अनुशीलन समिति के
नेताओ का बौद्धिक विकास नितान्त अपूर्ण था। वे यह नही समझ पाते थे कि
क्रान्तिकारी आन्दोलन भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन की एक शाखा मात्र है। भारत

के राष्ट्रीय आन्दोलन के मूल में एक नवीन राष्ट्र एवं नवीन सभ्यता की सृष्टि
की प्रेरणा है। ये सब बातें न वे समझते थे, न इन सब बातों से उनका कोई सम्बन्ध
ही था । इतिहास, दर्शन, साहित्य इत्यादि से बंगाल के क्रान्तिकारी नेतागणों का
कोई विशेष परिचय न था । डेटिन्यू की हालत में वे नेतागण कुछ-कुछ पढ़ने-पढ़ाने
लगे थे। लेकिन इनका पढ़ना अत्यन्त अव्यवस्थित होता था, जैसे चीन के बारे में
बर्ट्रेण्ड रसेल की एक किताब पढ़ी लेकिन सनयातसेन की जीवनी या उनके लेख
आदि नहीं पढ़े । संसार की राज्य-क्रान्तियों के इतिहास से इन लोगों का कोई
परिचय न था। डेटिन्यू रहते समय भी इन लोगों में से अधिकांश ने पढ़ने-लिखने
में विशेष रुचि नहीं दिखलाई। मैंने इन लोगों में से बहुतों के साथ छः महीने
लगातार दिन-रात अलीपुर सेण्ट्रल जेल में बिताए हैं। मैं इन लोगों के बारे में बहुत
अच्छी तरह जानता हूँ। आजकल के प्रसिद्ध नेता श्री मानवेन्द्रनाथ राय जब
बंगाल में श्री नरेन्द्रनाथ भट्टाचार्य के नाम से काम करते थे उस समय इनकी
गिनती कोई प्रमुख नेताओं में नहीं थी। आप बंगाल के प्रसिद्ध क्रान्तिकारी श्री
यतीन्द्रनाथ मुकर्जी के मातहत रहकर काम करते थे। इनमें प्रतिभा थी लेकिन
यूरोप और अमेरिका में जाकर ही उस प्रतिभा का विकास हुआ। श्री यतीन्द्रनाथ
मुकर्जी भी कुछ विशेष पढ़े-लिखे विद्वान नही थे । लेकिन उनमें अद्भुत कर्म-शक्ति
थी। श्री रासबिहारी भी इसी प्रकार से कुछ विशेष पढ़े-लिखे विद्वान् नहीं थे।
लेकिन उनमें भी प्रचण्ड शक्ति थी। फिर भी ढाका अनुशीलन समिति के नेताओं
के साथ बगाल के अन्य क्रान्तिकारी दलों की तुलना करने पर मेरी श्रद्धा ढाका
समिति के नेताओं के प्रति नहीं जाती थी। श्री विपिनचन्द्र गांगुली, श्री यदुगोपाल
मुकर्जी, श्री मोतीलाल राय, श्री मिरीशचन्द्र घोष इत्यादि नेताओं के राष्ट्रीय
दृष्टिकोण ढाका समिति के नेताओं से कही व्यापक एवं अन्तर्दृष्टिपूर्ण थे। यह
बात सत्य है कि ढाका अनुशीलन समिति मे ऐसे बहुत-से सदस्य थे जिनकी अभि-
रुचि एव जिनका मानसिक झुकाव ढाका समिति के नेताओं से अधिक आशापूर्ण
एवं प्रतिभाव्यंजक था। लेकिन इन सब प्रतिभाशाली नवयुवकों को उचित
अवसर नहीं मिलता था जिससे वे अपनी प्रतिभा का पूर्ण विकास कर पाते। ढाका
समिति का कार्यक्रम ऐसा नही था जिसके कारण प्रतिभावान नवयुवकों को यह
अवसर प्राप्त होना कि वे साहित्य सृजन द्वारा या मासिक-साप्ताहिक पत्रों में
लेख भेजकर या मच पर खड़े होकर वक्तृता देने में अपनी प्रतिभा को व्यक्त
करने की प्रेरणा अनुभव करें। जब कही किसी संगठन के काम में किसी को
भेजने की आवश्यकता होती तो ढाका समिति के नेतागण ऐसे व्यक्ति को चुनते थे
जिसमें सिपाहियाना गुण तो अवश्य रहते थे लेकिन सांस्कृतिक दृष्टि से, अध्ययन
की दृष्टि से उसमे ऐसे गुण नही होते थे, जिनसे वे समाज के श्रेष्ठ नवयुवकों को
या समाज के प्रतिष्ठित गण्यमान्य व्यक्तियों को अपने चरित्रबल मे, अपनी प्रतिभा
से, अपने कार्यक्रम के प्रति आकृष्ट कर सकें। इसका मूल कारण तो यह था कि
ढाका समिति के नेतागण स्वयं इस बात को नहीं समझते थे कि क्रान्तिकारी

क्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन / 257
आन्दोलन विराट् राष्ट्रीय आन्दोलन की एक शाखा मात्र है एवं इन नेताओं में
राष्ट्रीय आन्दोलन के नेतृत्व करने की योग्यता नही थी। इस दृष्टि से, सम्भवतः
भारत के दूसरे क्रान्तिकारी दलों मे भी उपयुक्त नेता नही थे। यही कारण था
कि भारत के दूमरे क्रान्तिकारी दलो का कृतित्व भी जैसा होना चाहिए था, वैसा
नही हुआ ।
श्री सतीशचन्द्रसिंह से दल-सगठन के बारे मे मैंने कभी कुछ बातचीत नहीं
की। यदि कोई व्यक्ति किसी काम मे जुटा रहे तो अवश्य ही उसे कुछ सफलता
प्राप्त होती है। इस दृष्टि से सतीशचन्द्र ने भी दो-चार नवयुवकों को जमा कर
लिया था। ढाका ममिति के नेतागणों ने मेरे साथ कोई परामर्श न करके ही
श्री सतीशचन्द्र को बनारम भेजा था। इस बात से भी मैं समझ गया कि ढाका
समिति मेरी अपेक्षा न रखकर ही युक्त प्रान्त मे भी अपना सगठन बढाना
चाहती है। मेरे और ढाका समिति के बीच जो भ्रन्तर था वह इससे और भी बढ़
गया।
इधर सुरेशचन्द्रजी की सहायता से एक प्रतिभावान नवयुवक से मेरा परिचय
हुआ। इनमे बातचीत करने पर मुझे यह विश्वास हो गया कि इस युवक में
साहित्यिक रुचि है। बाद को इनके दो-एक छोटे लेख भी पढे। उनके उस समय के
एक लेख का प्रभाव आज भी मैं भूल नही पाया। उम लेख का शीर्षक था—'माँ'।
इस लेख को पढकर मैंने इम युवक से कह दिया था कि 'यदि आप साहित्य की
चर्चा करते रहें तो हिन्दी लेखको मे आप अग्रणी हो मकते हैं। लेकिन आपको
चाहिए कि अग्रेजी, बगला एव हिन्दी-साहित्य से खूब परिचित हो जाएँ।' ये
अग्रेजी प्रायः जानते ही न थे। ये प्रतिभावान युवक 'आज' मे 'उग्र' नाम से अपना
लेख दिया करते थे। आज ये सब बात स्मरण करके मैं यथेष्ठ गौरव अनुभव
करता हूँ एव यह आत्म-तुष्टि भी अनुभव करता हूँ कि एक यथार्थ प्रतिभाशाली
युवक को मैंने उसकी तरुण अवस्था मे ही पहचान लिया था। आज उग्रजी ने
हिन्दी-साहित्य मे अपना सुनिर्दिष्ट स्थान प्राप्त कर लिया है। जिस दिन मैंने उन्हें
पहचाना था उस दिन उन्होने माहित्य मे पदार्पण मात्र ही किया था। और उस
दिन उन्हे हिन्दी मसार मे कोई विशेष रूप से जानता भी न था। हम लोगो के साथ
परिचय होने के बाद ही, सभवत. उन्होने 'माँ' नामक लेख लिखा था। मुझे
मर्मान्तक दुख है कि अग्रेजी के द्वारा हम लोगो का मम्बन्ध अधिक घनिष्ठ नही
हो पाया। और मुझे यह भी अत्यन्त खेद है कि उग्रजी ने मेरे कथनानुसार अग्रेजी
इत्यादि साहित्य मे वैसी रुचि नही दिखलाई, जैमी मै चाहता था। इसमे तो कोई
सन्देह नही कि उनकी लेखनी मे अत्यन्त शक्ति है ? लेकिन उनकी रुचि मे
पगवर्तन हो जाने के कारण उनका सृष्ट माहित्य समाज को आशानुरूप कल्याण-
प्रद सिद्ध नही हुआ, यह और बात है। परन्दु इसमे कोई मदेह नही है कि वे
प्रतिभाशाली लेखक है। इनकी सहायता से हमारे दल को एक ऐसा महत्त्वपूर्ण
लाभ हुआ कि जिसके जिए हम सब सदा उनके कृतज्ञ रहेगे। इस विषय का

258 / बन्दी जीवन
उल्लेख यथास्थान किया जायगा।
अण्डमन से लौटने के बाद मुझे बनारस में रहने का अवसर नहीं मिला। इस
कारण बनारस में मैं वैसा संगठन नहीं कर पाया जैसा होना उचित था। निजी
सांसारिक कारणों से मुझे इलाहाबाद में रहना था। बनारस में अभी तक मुझे
जितने व्यक्ति मिले थे उनमें श्री राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी एवं श्री बेचनरामजी शर्मा
विशेष उल्लेख योग्य थे। इसके अतिरिक्त और जितने व्यक्ति हमारे दल में
आए थे उनमें से बहुतों ने बाद को काम करना छोड़ दिया। सौभाग्य की बात है
कि इनमें से किसी ने भी बाद को विश्वासघात नहीं किया।
इलाहाबाद में राष्ट्रीय विद्यालय की सहायता से कुछ आदमी मिले। उनमें
से एक थे श्री बनवारीलाल। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में से श्री केशवदेव मालवीय
के साथ मेरा परिचय हुआ। इनके एक भाई श्री कपिलदेव मालवीय के साथ
बहुत दिनों से मेरी तथा मेरे परिवार-भर की जान-पहचान थी। मैं प्रायः
कपिलदेवजी के पास जाया-आया करता था। केशवदेवजी प्रायः मुझे अपने भाई
के पास आते-जाते देखते थे। केशवदेव स्वयं ही मुझसे आकर मिले थे। इस समय
आप मेरे साथ काम करने को तैयार हो गए थे। उनकी सहायता से और भी
नवयुवकों से मेरा परिचय हुआ था। इस प्रकार से धीरे-धीरे मेरा दल बढ़ रहा
था। एक दिन केशवजी ने मुझे बतलाया कि कानपुर में एक प्रतिभावान नवयुवक
हैं जिनसे अपने कार्य के बारे में बातचीत की जा सकती है। इस नवयुवक का नाम
था श्री बालकृष्ण शर्मा। केशवजी के आग्रह से यह निश्चय हुआ कि , शव कानपुर
जाकर बालकृष्ण को मेरे पास बुला लाएंगे। एक दिन वे प्रातःकाल बालकृष्णजी
को साथ लेते हुए मेरे पास आए। बहुत देर तक बातचीत हुई। अन्त में मैने इस
प्रकार से अपनी युक्ति प्रस्तुत की कि अदूर भविष्य में फिर लड़ाई छिड़ने की
आशंका है, यदि हम उपयुक्त तैयारी कर सकें तो उस अवस्था में हम एक बार
फिर स्वाधीनता को प्राप्त करने की चेष्टा कर सकते हैं, यदि हम अभी से तैयारी
नहीं करते हैं तो अवसर आने पर भी हम कुछ नहीं कर पाएंगे। लेकिन कोई
युक्ति काम नहीं आई। बालकृष्णजी ने कहा कि अभी शीघ्र लड़ाई की कोई
संभावना नहीं है और अभी वह समय भी नहीं आया है कि हम क्रान्तिकारी
मार्ग से षड्यन्त्र की रचना करें। आशा भंग की मर्मान्तक पीड़ा से मैं व्यथित हो
उठा।

क्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन
(2)
इस समय श्री रासबिहारी से मेरा पत्र-व्यवहार होता था । वे सब पत्र मैं
केशवजी के पास रख देता था । मेरे गोपनीय पत्रादि भी केशवजी के नाम पर
आते थे । केशवजी का ग्रुप बनवारीलाल का ग्रुप और नरेन्द्रनाथ बनर्जी उर्फ नोदू
का ग्रुप अलग-अलग बढ रहे थे । ये सब ग्रुप एक-दूसरे को नही जानते थे ।
बनारस के ग्रुप इलाहाबाद के ग्रुप को नही जानते थे। इलाहाबाद के ग्रुप अलीगढ
या फतेहगढ के ग्रुप को नही जानते थे । इस प्रक र से जितने ग्रुप तैयार होते
जाते थे वे सब एक-दूसरे को नही जानते थे । यह मै पहले ही बता चुका हूँ कि
बनवारीलाल की सहायता से रायबरेली और प्रतापगढ मे इन लोगो का दल बनने
लग गया था । इस बीच मे सन् 1922 के अन्त मे गया मे काग्रेस का अधिवेशन
हुआ । इस अधिवेशन के समय 'बन्दी जीवन' प्रथम भाग की दो-तीन सौ कापियाँ
छापाखाने से निकल चुकी थी । उन प्रतियो को लेकर कलकत्ता होते हुए मै
गया पहुँचा । गया मे पजाब से आये हुए व्यक्तियो से बातचीत की । कालेपानी
से लौटे हुए कुछ सिख मुक्त-राजबन्दियो से मुलाकात की । उसमे भाई प्यारासिंह
भी एक थे । भाई प्यारासिंह बहुत प्रेम से आकर मेरे गले लग गए । सुख-दुःख की
बहुत बातें हुईं फिर काम की बाते हुई । मैने ऐसा अनुभव किया कि सम्भव है
प्यारासिंह अब आगे नही बढ़ेंगे । गया मे मुझे एक बात यह भी मालूम हुई कि
बम्बई से श्री एस० डागे आये हुए है और बंगाल के विभिन्न क्रान्तिकारी दलो
के नेताओ से बातचीत कर रहे हैं। दुर्भाग्यवश मेरे साथ उनकी मुलाकात नही
हुई । इसी बीच मे श्री प्रतुल गागुली से मेरी फिर बातचीत हुई थी । बनारस के
श्री सतीशचन्द्रसिंह के बारे मे बातचीत छिड़ने पर मैने यह कहा था कि बनारस
मे जैसे उपयुक्त व्यक्ति की आवश्यकता है। श्री सतीशचन्द्र उस श्रेणी के नही
हैं । बहुत सम्भव है कि मेरे ही कहने पर सतीशचन्द्र को बनारस से वापस बुला
लिया गया और उनकी जगह पर श्री योगेशचन्द्र चटर्जी बनारस आए । अब
सोलह साल की सब बाते अच्छी तरह याद नही हैं । मुझे इतना अवश्य याद है
कि गया मे मैंने श्री सुरेशचन्द्र भट्टाचार्य, सरदार प्यारासिंह, पंजाब के कुछ और
व्यक्ति जिनका नाम मैं आज भी लेना नही चाहता क्योकि वे आज भी गिरफ्तार

260 / बन्दी जीवन
नही हुए और बंगाल के कुछ व्यक्तियों से मिलकर भविष्य की कार्यप्रणाली के
बारे में बहुत कुछ ब'तचीत की थी। अवश्य ही हम सब एकत्र बैठकर बातचीत
नही करते थे क्योंकि हम लोगों के दल की यह नीति थी कि विभिन्न प्रान्त के
कार्यकर्ताओं मे जान-पहचान जितनी कम हो उतना ही अच्छा ।
गया कांग्रेस मे मेरे रवैये को देखकर मेरे एक रिश्तेदार के दिल में यह
सन्देह पैदा हो गया कि मैं फिर कुछ ऐसा काम करनेवाला हूँ जिससे संकट का
आना अनिवार्य है। मेरे ये आत्मीय घर मे जाकर कहने लग गए कि शचीन्द्रनाथ
फिर गड़बड़ी करनेवाले हैं। श्री सुरेशचन्द्र भट्टाचार्य जी खोलकर मेरे साथ सह-
योगिता करते थे उनसे यदि किसी डकैती करने या किमी आदमी को गोली
मारने को कहा जाये तो अपात्र से ऐमा कहा जाएगा। जिस व्यक्ति से जितना
काम लेना उचित है यह न जानने पर दल का संगठन करना कठिन हो जाता है।
यही कारण है कि हम लोगो की एवं भगतसिंह की गिरफ्तारी के बाद हमारा दल
टूटने लग गया था। मैं जानता था कि श्री सुरेशचन्द्र आदि से कितना काम लिया
जा सकता है। श्री सुरेश चन्द्र बड़े चरित्रवान, साहित्य मे रुचि रखने वाले, विचार-
शील और आदर्शवादी युवक थे। विप्लव-कार्य मे शामिल होने से कितना सकट
है इसे वे जानते थे। यह जानते हुए भी हमारा साथ देने मे सुरेश बाबू कभी पीछे
नही हटे। मेरे पास उनकी उस समय की एक चिट्ठी की नकल आज भी मौजूद
है। उनके वचनों से यह पता चल सकता है कि सुरेश बाबू कैसे उच्चकोटि के
विचार रखनेवाले शुद्ध हृदय के युवक थे। गया वांग्रेस मे सुरेश बाबू ने मेरा
खूब साथ दिया।
गया कांग्रेस से लौटने के बाद इलाहाबाद मे मैंने एक छोटा-सा मकान
किराए पर ले लिया। जैसे मैंने भगतसिंह को अपना घर छोड़कर निकल आने
को कहा था वैसे ही फतेहगढ़ के आर्गेनाइजर श्री छेदालालजी को भी मैंने घर
छोड़कर निकल आने को कहा। श्री छेदालालजी ने भी मेरे कहने के अनुसार
अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और इलाहाबाद चले आए। इसी प्रकार से श्री
बनवारीलाल भी अपना घर-बार छोड़कर इलाहाबाद के मकान मे श्री छेदालाल
जी के साथ रहने लग गए। विभिन्न जिलो के कार्यकर्तागण प्रायः मेरे पास
आते थे। उन्हे मै उसी मकान मे ठहराता था। इस प्रकार से विभिन्न जिलों के
कार्यकर्तागण एक-दूसरे को थोड़ा-बहुत जानने लगे थे। लेकिन फिर भी एक-
दूमरे का नाम या एक-दूगरे का पता कोई किसी से पूछ नही सकता था। उसी ममय
श्री छेदालालजी के मार्फत एक सन्यामी से मेरा परिचय हुआ। उमी मकान मे
बातचीत हुई। सन्यामी जी अपने को आर्यममाजी कहते थे। इनका कोई गिरोह था
जिसवा काम था डकैती करना। यह मन्यासीजी हमसे कहते थे कि उनके गिरोह
का नियम यह रहा है कि डकैती के बाद माल इत्यादि बेचकर जितने रुपये हाथ आते
थे वे सब समान रूप से सदस्यो मे बाँट दिए जाते थे। इस प्रकार से वह सन्यासी
एक क्रान्तिकारी दल बना रहे थे। इस संन्यासी का कहना था कि संकटकाल में

क्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन / 261
हम किसी की कोई सहायता नही कर सकते हैं और न ऐसा करना सम्भव ही है।
इसलिए डकैती के रुपये सदस्यों में बाँट दिए जाते हैं। और इस प्रकार से सहा-
यता देने पर अपने दल का संगठन कार्य बहुत सहज हो जाता है। स्वामीजी की
सब बातें सुनकर मैंने नम्रतापूर्वक उनमे निवेदन किया कि ऐसी सस्था के साथ
हम लोग कोई सम्बन्ध नही रखना चाहते है। मैने बता दिया कि हम लोगो का
क्रान्तिकारी आन्दोलन दूसरे प्रकार के सिद्धान्तो पर प्रतिष्ठित है। हम लोग
पुरस्कार के आधार पर सगठन-कार्य नही करते। यहाँ तो सर्वस्व खोने का प्रण
करके कार्यक्षेत्र में अवतीर्ण होना पडता है। यहाँ तो व्यक्ति गत चरित्र एव समाज
सेवा के मार्ग से नये आन्दोलन की सृष्टि करना हमारा काम है। समय आने पर
केवल मात्र सिपाहियो की आवश्यकता होगी तब हम लोग पुरस्कार की बात
सोचेगे। अभी तो हम लोगो का काम है सर्वस्व त्यागी नौजवानो की टोली तैयार
करना। जब समग्र भारतवर्ष मे ऐसी टोली बन जाएगी तब हम लोग दूसरे काम
के बारे मे सोचेगे। मुझे इस बात पर बहुत आश्चर्य हुआ कि उन नवीन सन्यासी
महोदय ने मेरे साथ प्रचड तर्क किया यह प्रमाणित करने के लिए उनके सिद्धान्त
हम लोगो के सिद्धान्त से कही अधिक कार्यकारी और समयोपयोगी है। सन्यासी
जी चाहते थे हम सब उनके साथ मिलकर एक विराट् क्रान्तिकारी दल बनावे।
मुझे इस बात से बहुत आश्चर्य हुआ कि हमारे साथी श्री छेदालालजी भी कुछ हद
तक सन्यासीजी की बातो का समर्थन करते थे। मैने यह तो नही कहा कि पेशे-
वर डकैतो के साथ हम लोगो का कोई सम्बन्ध नही रह सकता लेकिन मैंने स्वामी
जी को यह अच्छी तरह समझा दिया कि हम दोनो के सिद्धान्तो मे आकाश-पाताल
का अन्तर है। हम दोनो के दल एक साथ काम नही कर सकते। स्वामीजी अन्त
मे कुछ होश मे आकर यह कहकर चल दिए कि आप लोग कुछ भी नही कर
पाएँगे। मैने मुस्कराकर नम्रता के साथ उन्हे विदा किया। फिर श्री छेदालाल
को भी क्रान्तिकारी आन्दोलन के बारे मे बहुत कुछ कहा और समझा दिया कि
किसी भी अवस्था मे हमे मामूली डाकुओ को अपने साथ नही लेना है। हमे
भूलना उचित नही है कितने बडे ध्येय को सामने रखकर समाज मे नये सिरे से
जान लाने के लिए हम लोग कार्यक्षेत्र मे अवतीर्ण हुए हैं।
इसी समय किसी विश्वस्त सूत्र से मुझे पता चला कि यू० पी० मे फिर एक
क्रान्तिकारी षड्यन्त्र का मामला चलने वाला है और मुझे भी षड्यन्त्र मे घसीटा
जाएगा। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। अभी तो मुश्किल से सालभर ही काम किया
होगा। इतने मे ही फिर षड्यन्त्र का मामला चलने वाला है। मुझे अपने आदमियो
मे से किसी-किसी पर कुछ सन्देह होने लगा। गुप्त रीति से काम मे यह एक बड़ा
भारी दोष है कि जरा-सी बात से ही अपने विश्वस्त आदमियों पर भी सन्देह
उत्पन्न हो जाता है। मुझे इस खबर पर कुछ सन्देह हुआ, कुछ डर भी हुआ।
इस अवस्था मे मैंने यह उचित समझा कि अब घर मे नही रहना चाहिए। जाने
खबर सच है या झूठ फिर भी उचित यही है कि सावधानी से काम लिया जाय।

262 / बन्दी जीवन
मैं भी श्री छेदालाल और श्री बनवारीलाल के साथ रहने लग गया, अवसर देख-
कर घर ही में भोजन कर आता था, क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि दल का खर्च
अनावश्यक रूप से बढ़ जाय ।
मुझे इस समय ठीक स्मरण नहीं है, संभव है, इसी के कुछ पहले निजी सांसा-
रिक कारणों से कुछ अर्थोपार्जन की भावना से मैं व्यस्त हो उठा था। मुझे
सैण्ड्स साहब की बातें याद आईं। सैण्ड्स साहब ने मुझे अण्डमन से लौटते ही
कह दिया था कि यदि भविष्य में कभी भी किसी सहायता की आवश्यकता
अनुभव करो तो मुझसे कह देना। मुझसे बन पड़ा तो मैं अवश्य ही तुम्हारी सहायता
करूँगा। इस बात को ध्यान मे रखते हुए मैंने सैण्ड्स साहबे के पास एक चिट्ठी
भेजी। सैण्ड्स साहब उस समय सी० आई० डी० (C. I. D.) से अलग होकर
मामूली पुलिस विभाग में डी० आई० जी० आफ पुलिस (D.I.G. of Police)
थे इनसे मैं अण्डमन से लौटते ही फैजाबाद में मिला था। सैण्ड्स साहब ने पत्रोत्तर
मे मुझको लिखा अमुक तारीख को मैं बनारस जाऊंगा और उस समय मुझसे
मुलाकात करो। मेरे पीछे सदा सर्वदा खुफिया पुलिस के सिपाही लगे रहते थे।
जिस समय मैं दल के काम से जाता था तो इनकी दृष्टि बचाकर मैं अक्सर खिसक
जाया करता था। लेकिन जब निर्दोष काम में कही जाता था तो मुझे इस बात
की परवाह नही रहती थी कि खुफिया पुलिस के आदमी मेरा पीछा कर रहे हैं।
बनारस मे सैण्ड्स साहब से मिला। सैण्ड्स साहब जानना चाहते थे कि मैं किसी
विभाग मे कितनी तनख्वाह पर काम कर सकता हूँ। कोई विशेष जगह कही पर
खाली हो तो मैं उन्हें बताऊँ। यदि उनका कोई हाथ रहता है तो वह अवश्य मेरी
मदद करेगे। मैने उन्हें बताया कि किसी विशेष जगह के बारे मे मैं नहीं जानता
इत्यादि। सैण्ड्स साहब ने बाद को मुझसे यह कहा कि जैसी परिस्थिति होगी
और मैं जो कुछ सहायता दे सकूँगा इसके बारे में मैं पत्र द्वारा तुम्हें सूचना दूंगा।
कुछ दिन बाद मेरे पास उनका एक पत्र आया जिसमे लिखा था कि मुझे एक
अच्छी जगह दी जा सकती है। करीब एक सौ रुपया तनख्वाह भी मुझे मिल
सकती है। लेकिन मुझे एक शर्त स्वीकार करनी पड़ेगी कि भविष्य में जब तक मैं
इस मुलाजमत मे रहूँगा तब तक किसी प्रकार के भी राजनैतिक आन्दोलन मे
भाग नही लूँगा। सैण्ड्स साहब ने यह भी आशा दिलाई थी कि मुझे बहुत अच्छे
डिपार्टमेन्ट में काम दिया जाएगा जिससे भविष्य में मेरे लिए बहुत उन्नति का
मार्ग खुला रहेगा। मैंने देखा कि मुझे एक अच्छा अवसर मिल रहा है लेकिन
किसी प्रकार की भी शर्त कबूल करने में मेरे दिल ने गवाही नही दी। मैंने सोचा
कि आजन्म कालेपानी की सजा से मैं जब मुक्त हुआ तो उस समय भी मैंने कोई
शर्त नही मानी थी। इस समय किसी प्रकार की शर्त मानना मेरे लिए उचित
नही होगा यद्यपि मैं यह देख रहा था कि सैण्ड्स साहब के प्रस्ताव में एक बहुत
ही न्याययुक्त बात यह थी कि जितने दिन तक मैं मुलाजमत में रहूँ उतने दिन
तक किसी प्रकार के राजनैतिक आन्दोलन में भाग न लूँ। मैंने सैण्ड्स साहब को

क्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन / 263
एक पत्र भेजा और उसमें बहुत नम्रता के साथ यह लिखा कि "सैण्ड्स साहब
आपने एक सच्चे अंग्रेज (Englishman) की हैसियत से जो उदारता दिखलाई
है उसके लिए मैं जन्म-भर आपका कृतज्ञ रहूँगा । लेकिन बहुत दुख के साथ यह
कहना पड़ता है कि अण्डमन से छूटते समय भी जब मैंने कोई शर्तें स्वीकार नहीं
की है तो मेरे लिए उचित है कि अब भी मैं कोई शर्तें स्वीकार न करूँ । लेकिन
सरकारी मुलाजमत जब मैं स्वीकार करता हूँ तो उसका अर्थ यह होता ही है कि
सरकारी क़ायदे-क़ानून को भी मैं स्वीकार करता हूँ । इसके अतिरिक्त मैं और
कोई शर्तें कबूल करना उचित नहीं समझता ।" इस पत्र का कोई उत्तर मुझे नहीं
मिला और मिलना आवश्यक भी नहीं था। जब मैं बाल-बच्चों को साथ लेकर
घरबार छोड़कर फरार हो गया था उस समय भी सैण्ड्स साहब की चिट्ठी आदि
मेरे पास थी । लेकिन मेरी गिरफ्तारी के बाद ये सब चीजें एवं और भी बहुतेरे
आवश्यकीय कागजात—पत्र एवं मेरी बहुत-सी किताबें—जाने कितनी जगह
घूमघाम कर आज सब-के-सब खो गए हैं।
मुझे ठीक याद नही है, सम्भव है, थोड़े दिन श्री छेदालाल और श्री बनवारी-
लाल के साथ रहकर जब मैंने देखा कि पुलिस की तरफ से कोई विशेष उत्पात
की सम्भावना नहीं है तो मैं भी ढीला पड़ गया ।
श्री छेदालालजी के साथ संगठन-कार्य के सिलसिले में मैं फतेहगढ़ गया हुआ
था। शहर के कुछ हिस्सों में एवं देहात में भी जाना पड़ा था। हमारे संगठन-कार्य
का यह तरीका था कि जितनी जगहों में हो सके उतनी जगहों में दृढ़ चित्त कर्त्तव्य-
परायण त्यागी साहसी युवकों को बैठाया जाय। इन्हीं को केन्द्र करके क्रमशः एक
विराट् दल संगठित हो जाता है। गांव और शहर से वापस आकर गंगाजी के
किनारे सुस्ता रहे थे। थोड़ी देर में गगाजी के किनारे-किनारे घाट-घाट घूमना
प्रारम्भ किया और यह देखना चाहा कि कोई ऐसा स्थान मिलता है या नहीं
जहाँ पर मनुष्य विदेश से आकर टिक सकता है। उस समय फतेहगढ़ जिले के
'साध' नामक कौम के पुरुष और स्त्री बहुत संख्या में एकत्र हुए थे । बैलगाड़ी में
लदकर परिवार के परिवार चले आ रहे थे। इनको देखने से मालूम पड़ता था
कि ये लोग बड़े सुखी हैं निर्द्वन्द्व हैं। इनमे अधिकांश स्त्रियाँ थी । ये अधिक पर्दा
नही करती थीं । निःसंकोच होकर गंगाजी में नहाती थी, किनारे पर आकर
खाती-पीती थी । टोलियों में बैठकर संसार की सुख-दुख की बातें करती थी ।
कभी-कभी कुछ स्त्री-पुरुष एक टोली से दूसरी टोली में आते-जाते थे । सुनने में
आया कि अब 'साध' लोग बड़े अमीर होते हैं। और इनका पेशा है व्यापार करना ।
दिनान्त में कुछ बैलगाड़ी में लदकर और कुछ पैदल घर को वापस आते थे ।
उस समय मालूम होता था मानो किसी मेला से सब लौट रहे हैं। हम एक घाट
से दूसरे घाट को जा रहे थे और इधर-उधर तीक्ष्ण दृष्टि से देखते जा रहे थे कि
इस मेले के सदृश आदमियों की भीड़ में बुड्ढों, औरतों और बाल-बच्चों को
छोड़कर नौजवान भी यहाँ पर हैं या नहीं और यदि हैं तो वे शिक्षित हैं या नहीं।

सेल्यूलर जेल की अमानवीय यातनाएँ, भूख-हड़ताल एवं बन्दियों का संघर्ष

264 / बन्दी जीवन
अर्थात् मेरे लायक भी कोई युवक इस भीड मे मिल सकता है या नही यह भी मैं
देखता जा रहा था। एक दफा अचानक ही मैंने एक खुले कमरे के अन्दर एक
युवक को बैठकर किताब पढते हुए देखा । मेरा दिल उल्लसित हो उठा । मैं सीधा
उस कमरे के अन्दर चला गया । मेरे साथ मेरे दो-एक साथी भी कमरे के भीतर
चले आए । हम लोगो को देखकर वह नौजवान किताब की तरफ से अपनी दृष्टि
हटाकर हम लोगो की तरफ देखने लगा । मैंने उस नवयुवक की दो आँखो मे ऐसी
चीजे देखी जिससे मैने अनुमान किया कि यह युवक नितान्त निविष्ट चित्त होकर
अपनी किताब पढ रहा था । किताब की तरफ दृष्टि आकृष्ट होते ही मैंने देखा कि वह
एक अग्रेजी किताब थी । मैंने उस युवक से क्षमा प्रार्थना करते हुए कहा कि इस
स्थान पर एक नवयुवक को दत्तचित्त होकर किताब पढते हुए देखकर हम लोग
आकृष्ट हुए है और इसलिए आपके पास आए हैं। युवक ने सहृदयता के साथ हम
लोगो को अपने तख्त पर बैठाया । यह बिचारा भी तो नितान्त अकेला ही था ।
मनुष्य समागम से वह युवक कुछ असन्तुष्ट हुआ हो ऐसा मालूम नही पडा ।
अग्रेजी किताब को उठाकर मैंने देखा वह भारतीय इतिहास पर परजिटर साहब
का आधुनिकतम ग्रन्थ था । भारतीय इतिहास पर युवक से बातचीत होने लगी ।
इस प्रकार कुछ देर तक बातचीत होने के बाद यह मालूम हुआ कि उस युवक की
एक बहन श्रीमती पार्वतीदेवी सत्याग्रह आन्दोलन के सिलसिले मे राजद्रोहात्मक
भाषण देने के कारण दो साल की कडी कैद की सजा फतेहगढ की सेण्ट्रल जेल मे
भुगत रही है । अपनी बहन से मिलने के लिए वह युवक फतेहगढ आया

क्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन / 265
खूब बातचीत हुई। जयचन्द्रजी को जब मालूम हुआ कि मैं अण्डमन गया हुआ था
और क़रीब चार साल तक वहाँ पर रहा तो वह मेरे प्रति बहुत आकृष्ट हो गए।
उन्होंने बतलाया कि फतेहगढ़ से वह इलाहाबाद आएंगे। उस समय 'बन्दी जीवन
नामक मेरी पुस्तक छप चुकी थी। मैं चाहता था कि जयचन्द्रजी मेरी किताब
पढ़ें। किताब मेरे पास नही थी। इसलिए तथा जयचन्द्रजी से बातचीत और
आगे बढ़ाने के लिए यह तय पाया कि इलाहाबाद मे राष्ट्रीय स्कूल मे जयचन्द्रजी
से मेरी फिर मुलाकात होगी। इलाहाबाद मे फिर मुलाकात हुई। 'बन्दी जीवन'
पढकर जयचन्द्रजी अत्यन्त प्रभावित हुए। इस प्रकार से जयचन्द्रजी हमारे दल
मे सम्मिलित हुए। उन्होने मुझे लाहौर बुलाया। मैं लाहौर गया। अध्यापक
जयचन्द्रजी के मकान मे ही अतिथि हुआ। लाहौर मे मैं कुछ नौजवानो से परि-
चित हुआ। इन नौजवानो मे एक का नाम था सरदार भगतसिंह। लाहौर के
नौजवानो मे से कोई तो रावलपिंडी का रहनेवाला था कोई था गुजरानवाला
का, कोई था गुरदासपुर का और कोई होशियारपुर का। ये सब लाजपतराय के
प्रतिष्ठित 'तिलक स्कूल आफ पालिटिक्स' के छात्र थे। एक-एक करके इन सब
नवयुवको से देर तक बातचीत होती रही। सशस्त्र क्रान्ति के मार्ग को छोड़कर
भारतवर्ष कभी भी स्वाधीन नही हो सकता, और सशस्त्र क्रान्ति होना निश्चय ही
सम्भव है, इन सब बातो पर विशेष रूप से ज़ोर देते हुए और पिछले क्रान्ति युग
के इतिहास को बतलाते हुए मैंने इन सब नवयुवको को क्रान्ति मार्ग में दीक्षित
किया।
लाहौर मे हम लोगो के एक बहुत पुराने साथी थे श्री केदारनाथजी सहगल ।
इनसे भी मैं मिलने गया। ये व्यक्ति बारहो महीना, तीसो दिन, हर घडी सिर से
पैर तक काले कपडे पहने रहते थे। भारतवर्ष जब तक स्वाधीन नही होता है तब
तक इनका प्रण था कि सफेद कपडा नही पहनेंगे।
श्री केदारनाथ के यहाँ और भी पुराने साथियो के साथ बातचीत हुई ।
श्री केदारनाथ और ये सब दूसरे पुराने साथी काम करने के लिए आगे नही बढे।
श्री केदारनाथजी के जरिये यह मालूम हुआ कि पहले लाहौर षड्यन्त्र केस के
श्री पृथ्वीसिंहजी के साथ उनका कुछ सम्बन्ध है। मैने बार-बार आन्तरिक चेष्टा
की कि पृथ्बीसिंहजी से मेरी मुलाकात हो जाय लेकिन मेरे दुर्भाग्य से उनसे मुला-
कात नही हो सकी।
इस वक्त मुझे ठीक से याद नही है, यदि उस समय के सवादपत्रो आदि मे
सहायता ली जाय तो सम्भव है, सिलसिले को ठीक रखते हुए सब बाते मै बता
सकूँ। इस समय कुछ आगे की बाते पीछे कह रहा हूँ या पीछे की बात आगे बता
रहा हूँ या नही इसके बारे मे कुछ निश्चयपूर्वक मैं कह नही सकता। जिस समय
नाभा मे अकालियो का सत्याग्रह हो रहा था उस समय मैं अमृतसर आया हुआ
था। सम्भवतः जयचन्द्रजी से मिलकर मैं सीधा अमृतसर आया था। सिक्खों का
जो महान् दृश्य उस समय मैंने देखा उसकी तुलना भारतवर्ष के किसी प्रान्त से

266 / बन्दी जीवन

भी नहीं हो सकती। नाभा में प्रतिदिन गोली चल रही थी। उसके मुकाबले में
प्रतिदिन सिक्ख जत्थे गोली का सामना करने के लिए नाभा जाते थे। पंजाब के
हरएक प्रान्त से किसान, मजदूर, छात्र, नौजवान, बूढ़े, प्रौढ़ हरएक प्रकार के
सिक्ख इन जत्थों में आ-आकर शामिल होते थे। मैंने स्वयं देखा है कि अमृतसर
में जब ये जत्थे पहुँचते थे तो बिलकुल सामरिक रीति से इन जत्थों का स्वागत
होता था। और इनकी कितनी ही माताएँ, बहनें, स्त्रियाँ इनसे आकर मिलती
थीं। अपने प्रेम से, अपनी उमंग से, हृदय के अन्तस्तल से ये माताएँ, बहनें और
स्त्रियाँ इन सिक्खों के गलों में प्रीति के, स्नेहाशीर्वाद के, मंगल कामना के प्रतीक-
स्वरूप मालाएँ पहनाती थीं। अमृतसर मे एक तरफ रसद का इंतजाम था, अस्प-
ताल की व्यवस्था थी। नाभा से चोट खाए कितने व्यक्ति इन अस्पतालो मे
आकर आश्रय लेते थे। एक अस्त्र को छोड़कर और सब बातो में पूरी लडाई की
तैयारी थी। इन सिक्खों के पीछे महात्माजी का आशीर्वाद नहीं था, इस सिक्ख
आन्दोलन के पीछे कांग्रेस की प्रेस्टीज भी नहीं थी। कांग्रेस का कोई भी गण्यमान्य
नेता इस सिक्ख आन्दोलन के साथ नहीं था। लेकिन एक बात अवश्य थी जिसे
स्वीकार करना पडेगा कि सिक्ख लोग अपने नेतृत्व मे अपनी क़ौम के लिए जैसा
असाध्य साधन करके दिखला सकते हैं, दूसरी क़ौम के साथ मिलकर, अखिल
भारतवर्षीय आन्दोलन में उस आन्तरिकता के साथ वे वैसा नही करते।
इस अवसर पर एक सर्वमान्य सिक्ख नेता के साथ मेरी खूब बातचीत हुई
थी। उसका नाम यहाँ पर उल्लेख करना कदापि उचित नही होगा। जिस दिन
भारत स्वाधीन हो जाएगा उस दिन उनका नाम प्रकाशित किया जा सकता है। इस
नेता ने बहुत आन्तरिकता के साथ मेरे पास एक प्रस्ताव किया था। उन्होने यह
बतलाया था कि सिख आन्दोलन अब ऐसी स्थिति पर आ पहुँचा है कि अब यह
आन्दोलन आगे चलाना प्रायः असम्भव-सा हो गया है। सिक्खों के खेती का काम
नष्टप्राय हो चला है। उनके सब व्यापार एवं काम-धंधे चौपट हो चुके हैं। सरकार
से समझौते का भी कोई लक्षण नही दिखलाई देता। सिक्खो के गुरुद्वारा आन्दोलन
का परिणाम क्या होगा, यह कहना बहुत ही कठिन हो गया है। ऐसी परिस्थिति
में यदि प्रचण्ड रूप से आतंकवाद की सृष्टि की जा सके तो बहुत सम्भव है कि
सरकार के ऊपर खूब दबाव पड़े। मैंने उन्हें यह आश्वासन दिलाया कि यदि कांग्रेस
के कुछ नेतागण इस बात का विरोध न करें तो जैसा आप कहते हैं हम वैसा ही
करेंगे। लेकिन हम यह नही चाहते है कि हमारे काम से कांग्रेस के आन्दोलन को
कुछ भी धक्का पहुँचे।
इसी समय एक और विशेष महत्वपूर्ण बात हुई। लाहौर षड्यन्त्र केस के एक
व्यक्ति सरदार गुरुमुखसिंह सरकार की हिरासत से भाग निकले थे। आपसे मेरी
पहली मुलाकात अण्डमन जेल में हुई थी। मेरे छूट जाने के बाद सरदार गुरुमुख
सिंह को भारत के जेल में वापस भेज दिया गया था। आपको मद्रास के एक जेल
से दूसरे जेल में ले जाया जा रहा था। पैरों में लोहे की बेड़ी थी लेकिन इनके

•क्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन / 267

दुर्लभ साहस को ले देखिए कि चलती ट्रेन से मौका देखकर सरदार गुरुमुखसिंह
अन्धकार में कूद पड़े । पुलिस गफलत में पड़ी रही सरदार गुरुमुखसिंह उन्मत्त
उत्ताल तरंग समाकीर्ण जीवन समुद्र में अदृश्य हो गए । किस प्रकार से बाद को
बह अपनी बेड़ी से मुक्त हुए, एवं कैसे किधर गए इसका पूर्ण वर्णन मैंने 'विचार
विनिमय' नामक अपनी पुस्तक में किया है। इसलिए इस बात को यहाँ पर दुहराने
की कोई आवश्यकता नही है । लाहौर के सर्वमान्य नेता के साथ बातचीत करने
के पश्चात् मुझे पता चला कि सरदार गुरुमुखसिंह भी इस समय अमृतसर में
उपस्थित है; और फिर मै उनसे मिलने गया ।
अमृतसर गुरुद्वारा के पास ही एक गली में एक छोटे-से मकान में आ पहुँचा ।
नीचे दुकानें थी, ऊपर सरदार गुरुमुखसिंह रहते थे । अकाली आन्दोलन के सर्व-
मान्य नेता भी मेरे साथ इस स्थान पर आए थे। सन् 1920 में सरदार गुरुमुखसिंह
को अण्डमन में छोडकर आया था। इतने दिन के बाद फिर फरार हालत में सरदार
गुरुमुखसिंह से मिलकर विचित्र आनन्द का अनुभव कर रहा था । एक तरफ
साम्राज्य की तमाम शक्ति विप्लववादियों को कुचलने के लिए निर्मम रूप से लगी
हुई है दूसरी तरफ अज्ञात कुलशील असहाय सम्पदहीन होते हुए भी आत्मविश्वास
के कारण ही अपने आदर्श में अविचलित श्रद्धा रखने के कारण ही, विप्लववादी
जीवन की बाजी लगाकर असंख्य बाधाओं का सामना करते हुए भी कैसी निष्ठा
के साथ अपनेकाम में कैसे निर्भीक होकर उत्साह के साथ लगे हुए हैं। एक और विशेष
महत्त्वपूर्ण बात ध्यान में रखने की यह है कि अकाली आन्दोलन एक प्रकाश्यजन-
आन्दोलन था, वह आन्दोलन सशस्त्र क्रान्तिकारी आन्दोलन न था । उस आन्दोलन
के नेतागण भी क्रान्तिकारी नही थे । लेकिन इम आन्दोलन के नेतागण अहिंसा
नीति को आसमान पर नही चढ़ाते थे । जैसी परिस्थिति थी उसी के अनुकूल वाता-
वरण में जन-आन्दोलन को जिस प्रकार से निर्भीक रूप मे चलाया जा रहा था
उसी प्रकार से भारत के दूसरे राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रति अकाली आन्दोलन के
नेतागण उदासीन न रहकर उसके प्रति अपनी स्पष्ट सहानुभूति की अविचलित
स्वर मे घोषणा करने मे हिचकते नही थे । इसीलिए सशस्त्र क्रान्तिकारी आन्दोलन-
कारियों के प्रति अकाली आन्दोलन के नेतागणों ने कोई भी असम्मानसूचक अथवा
निरुत्साह-व्यंजक शब्दों का व्यवहार नहीं किया । अपनी काफ्रेंस मे अकालियों ने
स्पष्ट शब्दों में यह घोषणा की कि अभी क्रान्ति का समय नही आया है, इसलिए
हम मलाह देते हैं कि जो वीर और त्यागी नवयुवकगण क्रान्तिकारी कार्य मे लगे
हुए हैं वे अपने कार्य से विरत हों । उनकी वीरता, उनका त्याग, उनका साहस
सराहनीय है । लेकिन उनके कार्य अभी समयोपयोगी नही हैं। इस मनोवृत्ति के
साथ यदि हम कांग्रेस के नेतागणों की मनोवृत्ति की तुलना करते हैं तो मन में
ऐसा लगता है कि ये लोग विशेष करके महात्माजी और उनके अनुयायीगण मानो
क्रान्तिकारियों को अपना और अपने देश का शत्रु समझते है। काग्रेस के प्लेट-
फार्म से, एवं सभापति के आसन से भी, ऐसे विषवत् वाक्यों के उद्गार किए जाते

268 / बन्दी जीवन

हैं जिससे देश में क्रूर एवं प्रबल दलबन्दी की भावना उत्पन्न होती है। ऐसा मालूम
पड़ता है कि इन नेताओं के दिल में क्रान्तिकारियों के प्रति एक उग्र कटुता-सी है।
कभी तो ये नेतागण क्रान्तिकारी आन्दोलन को उसे इफेंटाइल (Infantile) अर्थात्
बालकोचित कहकर निन्दा करते हैं और कभी क्रान्तिकारी आन्दोलन को फैसि-
स्टक कहकर अपनी जलन को शान्त करते हैं। और कभी ऐसा भी कह देते हैं कि
क्रान्तिकारियो ने देश की प्रगति को पचास साल पीछे हटा दिया है। यह भी
आक्षेप किया जाता है कि क्रान्तिकारीगण बलपूर्वक असहाय निर्दोष व्यक्तियो को
शहीद बना देते हैं। इस मनोवृत्ति के पीछे शान्त युक्ति नहीं है, इसके पीछे ऐति-
हासिक प्रेरणा भी नहीं है और सर्वोपरि इसके पीछे देश-हित की कल्याणमयी
कामना भी नहीं है। इसके पीछे केवल अहंकार का एक उग्र रूप विद्यमान है।
कांग्रेस के नेताओ ने भी सरलतापूर्वक आत्यन्तिक रूप से भारत की स्वाधीनता के
प्रश्न को न स्वीकार किया और न उसका विचार किया । जिस समय संसार का
प्रत्येक पराधीन राष्ट्र अपनी स्वाधीनता को प्राप्त करने के लिए बेचैन है, तड़प
रहा है, असाध्य साधन के लिए सर्वस्व विसर्जन करने को भी तैयार हो रहा है
एवं अद्भुत साहस और निष्ठा के साथ अपने ध्येय के पीछे लगा हुआ है, उस
समय भारतवर्ष के लब्ध-प्रतिष्ठित नेतागण अपने सामर्थ्य को अपने ध्यान में
रखते हुए ही भारतवासियों को रास्ता दिखाने की हिम्मत करते हैं और उनके
नेतृत्व में जो विश्वास नहीं करते हैं, ऐसे क्रान्तिकारियों के प्रति वे कटुतापूर्ण
उद्गार करते हैं। लेकिन जैसे अकाली नेतागण एक तरफ क्रान्तिकारियों के प्रति
सहानुभूति सूचक शब्द व्यवहार करते थे इसी प्रकार दूसरी तरफ अकाली नेतागण
सरदार गुरुमुखसिंह जैसे विद्रोहियों का छिपकर साथ देते थे और उनकी सहायता
भी करते थे।
सरदार गुरुमुखसिंह के कमरे में अकालियों के एक सर्वमान्य नेता थे। सलाह
हो रही थी कि आतंकवाद की सृष्टि करके अकाली आन्दोलन को सहायता
पहुँचाई जा सकती है या नहीं। मैं जानता था कि अपना दल अभी पूर्ण रीति से
संगठित नहीं हुआ है तथापि यह भी मैं जानता था कि दो-चार सरकारी अफसरों
को यम-धाम पहुँचाने के लिए जितनी शक्ति की आवश्यकता है उतनी शक्ति हमने
प्राप्त कर ली है। मैं यह भी जानता था कि आतंकवाद के चक्कर में पड़कर
क्रान्तिकारी आन्दोलन को काफी धक्का लग सकता है। मैं यह भी खूब जानता
था कि आतंकवाद के द्वारा कभी भी देश को स्वाधीन नहीं किया जा सकता।
लेकिन देशवासियों की सहानुभूति आकृष्ट करने के लिए जनान्दोलन के नेतागणों
की सहायता पाने के लिए हम लोगों को बार-बार आतंकवाद के चक्कर में पड़ना
पड़ा है। इस पहलू को विचार-विनिमय नामक अपनी पुस्तक में पाठकों के सामने
रखना मैं भूल गया हूँ। भारत के आतंकवाद के मूल में यह भी एक प्रबल बात थी
कि बहुत-से धनी व्यक्ति क्रान्तिकारियों को सहायता देने के लिए इस शर्त पर
तैयार हो जाते थे कि क्रूर अत्याचारी राजपुरुषों को समाप्त कर दिया जाय।

क्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन / 269
बारीन्द्र ने इस बात को प्रकाश्य रूप में स्वीकार किया है। पंजाब में भी अकाली
नेता की मनोवृत्ति को देखकर वही बंगाल की बात याद आती है। सरदार
गुरुमुखसिंह के कमरे में बैठकर यह तय हुआ कि भारत के बड़े लाट के ऊपर बम
और पिस्तौल से हमला किया जाय। उस समय सरदार गुरुमुखसिंह भी पंजाब में
बोलशेविक नीति पर एक दल के संगठन कार्य में लगे हुए थे। लेकिन उनके दल
में यह सामर्थ्य न थी कि लाट साहब के ऊपर आक्रमण का कोई इन्तजाम कर सके।
जैसा मैं पहले बता चुका हूँ मैंने युक्त प्रान्त में एक छोटा-सा दल खड़ा कर लिया
था। मैंने इन लोगों से वादा किया कि बंगाल के देशबन्धु सी० आर० दास से
सलाह करने के बाद ही मैं यह बता सकता हूँ कि लाट साहब के ऊपर हमले का
दायित्व मैं ले सकता हूँ या नही। पंजाब के नेताओं को मैंने स्पष्ट शब्दों में समझा
दिया कि हम ऐसा कोई काम करना नहीं चाहते जिससे जन-आन्दोलन को कोई
धक्का पहुँचे। महात्मा गांधी से बंगाल के कुछ क्रान्तिकारियों ने वादा किया था
कि सालभर महात्माजी के कार्य में वे लोग बाधा नहीं देंगे। मैंने अपने दिल में
यह आशा बांधी थी कि देशबन्धु सी० आर० दास और उनके ऐसे दूसरे कांग्रेसी
नेताओ को विप्लव आन्दोलन के प्रति सक्रिय रूप में आकृष्ट करूँगा। इस मनोवृत्ति
के कारण मैं यह नही चाहता था कि सी० आर० दास की इच्छा के विरुद्ध आतंक-
वाद की सृष्टि की जाय। मुझे ऐसा भी मालूम था कि अभी थोडे दिन पहले ही
सी० आर० दास में और ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधि में राजनीतिक मामलों के
बारे मे कुछ समझौते की बातचीत चल रही थी। अकाली नेता एवं गुरुमुखसिंह ने
मेरे दृष्टिकोण का समर्थन किया।
कहाँ पर लाट साहब के ऊपर हमला किया जाय इस पर भी विचार हुआ।
पाठक सुनकर हैरान हो जाएँगे कि सिख आन्दोलन इतना व्यापक एवं गम्भीर हो
चुका था कि बड़े-से-बड़े सिख अफ़सर भी इस आन्दोलन को हर प्रकार से
सहायता देने के लिए तैयार हो गए थे। गुरुमुखसिंह के कमरे में जो सिख अफ़सर
मौजूद था उसने मुझसे कहा कि शिमला मे ही हमला हो सकता है। और लाट
साहब के चलने-फिरने के बारे मे एक घण्टे की खबर हमको दी जा सकती है। मैं
शिमला के बारे मे थोड़ा-बहुत परिचित था क्योकि मैं एक साल तक शिमला में
रह चुका था। मै जानता था कि शिमला से बाहर निकल जाने के लिए सैकड़ों
रास्ते है। शिमला मे मेरे आने-जाने का इन्तजाम होने लगा।
एक और विशेष महत्वपूर्ण बात यहाँ बता देना अप्रासंगिक न होगा। मुझे
एक तार की नकल दिखलाई गई। यह तार जंगी लाट की तरफ से नाभा के जंगी
अफसर के पास जा रहा था। यह तार संकेत मे लिखा हुआ था। मुझसे कहा
गया कि मैं इस तार का मर्मोद्घाटन करूँ। मैने देखा हजार की संख्या मे (एकाई-
दहाई सैकड़ा हजार ऐसे हजार की संख्या मे) कई एक अंक तीन लम्बी-लम्बी
कतारों में सजाये हुए हैं –अर्थात् मान लीजिए कि ऐसा है : पहले 4516 लिखा
हुआ है, उसके नीचे 3721 लिखा है और उसके नीचे 7528 लिखा है इसी प्रकार