बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंके राष्ट्रीय आन्दोलन के मूल में एक नवीन राष्ट्र एवं नवीन सभ्यता की सृष्टि
की प्रेरणा है। ये सब बातें न वे समझते थे, न इन सब बातों से उनका कोई सम्बन्ध
ही था । इतिहास, दर्शन, साहित्य इत्यादि से बंगाल के क्रान्तिकारी नेतागणों का
कोई विशेष परिचय न था । डेटिन्यू की हालत में वे नेतागण कुछ-कुछ पढ़ने-पढ़ाने
लगे थे। लेकिन इनका पढ़ना अत्यन्त अव्यवस्थित होता था, जैसे चीन के बारे में
बर्ट्रेण्ड रसेल की एक किताब पढ़ी लेकिन सनयातसेन की जीवनी या उनके लेख
आदि नहीं पढ़े । संसार की राज्य-क्रान्तियों के इतिहास से इन लोगों का कोई
परिचय न था। डेटिन्यू रहते समय भी इन लोगों में से अधिकांश ने पढ़ने-लिखने
में विशेष रुचि नहीं दिखलाई। मैंने इन लोगों में से बहुतों के साथ छः महीने
लगातार दिन-रात अलीपुर सेण्ट्रल जेल में बिताए हैं। मैं इन लोगों के बारे में बहुत
अच्छी तरह जानता हूँ। आजकल के प्रसिद्ध नेता श्री मानवेन्द्रनाथ राय जब
बंगाल में श्री नरेन्द्रनाथ भट्टाचार्य के नाम से काम करते थे उस समय इनकी
गिनती कोई प्रमुख नेताओं में नहीं थी। आप बंगाल के प्रसिद्ध क्रान्तिकारी श्री
यतीन्द्रनाथ मुकर्जी के मातहत रहकर काम करते थे। इनमें प्रतिभा थी लेकिन
यूरोप और अमेरिका में जाकर ही उस प्रतिभा का विकास हुआ। श्री यतीन्द्रनाथ
मुकर्जी भी कुछ विशेष पढ़े-लिखे विद्वान नही थे । लेकिन उनमें अद्भुत कर्म-शक्ति
थी। श्री रासबिहारी भी इसी प्रकार से कुछ विशेष पढ़े-लिखे विद्वान् नहीं थे।
लेकिन उनमें भी प्रचण्ड शक्ति थी। फिर भी ढाका अनुशीलन समिति के नेताओं
के साथ बगाल के अन्य क्रान्तिकारी दलों की तुलना करने पर मेरी श्रद्धा ढाका
समिति के नेताओं के प्रति नहीं जाती थी। श्री विपिनचन्द्र गांगुली, श्री यदुगोपाल
मुकर्जी, श्री मोतीलाल राय, श्री मिरीशचन्द्र घोष इत्यादि नेताओं के राष्ट्रीय
दृष्टिकोण ढाका समिति के नेताओं से कही व्यापक एवं अन्तर्दृष्टिपूर्ण थे। यह
बात सत्य है कि ढाका अनुशीलन समिति मे ऐसे बहुत-से सदस्य थे जिनकी अभि-
रुचि एव जिनका मानसिक झुकाव ढाका समिति के नेताओं से अधिक आशापूर्ण
एवं प्रतिभाव्यंजक था। लेकिन इन सब प्रतिभाशाली नवयुवकों को उचित
अवसर नहीं मिलता था जिससे वे अपनी प्रतिभा का पूर्ण विकास कर पाते। ढाका
समिति का कार्यक्रम ऐसा नही था जिसके कारण प्रतिभावान नवयुवकों को यह
अवसर प्राप्त होना कि वे साहित्य सृजन द्वारा या मासिक-साप्ताहिक पत्रों में
लेख भेजकर या मच पर खड़े होकर वक्तृता देने में अपनी प्रतिभा को व्यक्त
करने की प्रेरणा अनुभव करें। जब कही किसी संगठन के काम में किसी को
भेजने की आवश्यकता होती तो ढाका समिति के नेतागण ऐसे व्यक्ति को चुनते थे
जिसमें सिपाहियाना गुण तो अवश्य रहते थे लेकिन सांस्कृतिक दृष्टि से, अध्ययन
की दृष्टि से उसमे ऐसे गुण नही होते थे, जिनसे वे समाज के श्रेष्ठ नवयुवकों को
या समाज के प्रतिष्ठित गण्यमान्य व्यक्तियों को अपने चरित्रबल मे, अपनी प्रतिभा
से, अपने कार्यक्रम के प्रति आकृष्ट कर सकें। इसका मूल कारण तो यह था कि
ढाका समिति के नेतागण स्वयं इस बात को नहीं समझते थे कि क्रान्तिकारी