बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
पृष्ठ 255, कुल 408 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन / 253
बात है कि इलाहाबाद में जितने दिन ऐसी टोलियों के पास खड़े होकर इन लोगों
का वार्तालाप सुना। उनमें से एक दिन भी इन लोगों को किसी भी राजनीतिक,
सामाजिक या साहित्यिक प्रश्नों पर बातचीत करते हुए नहीं पाया। इन लोगों
की बातचीत इतनी दुर्नीतिपूर्ण एवं मलीन होती थी कि उनके पास खड़ा रहना
भी अपमानजनक एवं अधोगतिकारी मालूम होता था। इलाहाबाद के बड़े-बड़े
होस्टलों में मैंने शायद ही किसी के कमरे में कोई मासिक पत्र देखा हो। जो दो-
चार अच्छे लड़के होते थे, वे अपने पढ़ने-लिखने में ही मग्न रहते थे और कुछ
छात्र खेल-कूद में लगे रहते थे। सन् 1920-21 में कितना बड़ा आन्दोलन हमारे
देश में होता रहा लेकिन हमारे युवकवृन्द के मन को इस आन्दोलन ने कितना
थोड़ा स्पर्श किया। मैं एक प्रकार से हताश हो गया। मैं बीच-बीच में बनारस भी
जाता रहा और कानपुर भी। सुरेशबाबू कुछ दिन कानपुर के 'प्रताप प्रेस' में
काम करते रहे और कुछ दिन 'वर्तमान' के दफ्तर में। बनारस में श्री सुरेन्द्रनाथ
मुखर्जी नामक एक बड़े पुराने साथी थे। इनकी सहायता से श्री राजेन्द्रनाथ
लाहिड़ी नामक एक युवक से मेरा परिचय हुआ। इनके अलावा एक और पुराने
साथी भी थे, जिन्होंने मेरी शादी के समय कुछ चुभती हुई बातें मुझे कही थीं। वे
भी मेरे साथ काम करने लगे थे। इनका नाम अपने समझने के लिए यहाँ पर
तारकनाथ रख देता हूँ। उधर कानपुर में जहाँ तक मेरा ख्याल है, सुरेशबाबू की
सहायता से श्री रामदुलारे त्रिवेदी से जान-पहचान हुई। सुरेशबाबू की सहायता
से और भी दो सज्जनों से जान-पहचान हुई। उनके नाम हैं : श्री वीरभद्र तिवारी
एवं श्री मन्नीलालजी अवस्थी। उस समय मन्नीलालजी एक राष्ट्रीय स्कूल के
हेडमास्टर थे। अवस्थीजी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के ग्रेजुएट भी थे। श्री राजेन्द्र
लाहिड़ी बी० ए० में पढ़ते थे। इलाहाबाद में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ मैं
मिलने-जुलने लग गया। इस प्रकार से दो नौजवान मुझे मिले—एक श्री बनवारी-
लालजी, दूसरे श्री नरेन्द्रनाथ बनर्जी। इन्हें कांग्रेसवाले नोडू भी कहा करते थे।
इनकी सहायता से अलीगढ़ के ठाकुर खानदान के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के साथ
मेरा परिचय हुआ। ये भी हमारे साथ काम करने लगे। इलाहाबाद के श्री
बनवारीलाल की सहायता से रायबरेली में भी कुछ हमारे आदमी बन गए, जिनका
नाम आज भी बतलाना उचित नहीं होगा। अलीगढ़ के ठाकुर साहब की सहायता
से फतेहगढ़ पहुँचा एवं अलीगढ़ तहसीलों में भी पहुँचा। जहाँ तक मुझे स्मरण है
इन्ही ठाकुर साहब की सहायता से मेरठ में श्री विष्णुशरणजी दुबलिश के पास
पहुँचा। इस वक्त मुझे ठीक स्मरण नहीं है कि दुबलिशजी की सहायता से
श्री रामदुलारेजी के पास पहुँचा था या नहीं। श्री विष्णुशरणजी की सहायता से
श्री महावीर त्यागीजी से जान-पहचान हुई। श्री महावीर त्यागी की सहायता से
शाहजहाँपुर में श्री रामप्रसाद बिस्मिल और श्री अशफाकउल्लाजी के पास पहुँचा।
कानपुर के श्री मन्नीलाल अवस्थी की सहायता से फतेहपुर पहुँचा। सन् 1922
के अन्दर इन आठ जिलों में मेरा काम फैल गया। लेकिन यह काम एक दिन में