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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 257, कुल 408 में से

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पृष्ठ 257

क्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन / 255

"भाई ! पता नहीं मैं आगे चलकर फिर काम करूँगा या नही। यदि मैं काम
करना छोड़ दूँ तो मेरे जितने रिसोर्सेज (अनुगामी व्यक्ति और साधन) हैं, सब
आप लोगों के सुपुर्द कर दूंगा और यदि मैं काम करता रहूँगा तो आप लोगो को
बता दूंगा कि ऐसा कर रहा हूँ या नही। लेकिन तुम लोग तो दिल खोलकर मेरे
साथ भविष्य के बारे मे बातचीत कुछ करते ही नही हो। इस तरह कैसे काम चल
सकता है ! सहयोगिता हो तो दोनो तरफ से हो। यदि तुम मेरे साथ खुलकर
बातचीत नहीं करोगे तो मैं भी किस प्रकार से तुम लोगो के साथ दिल खोलकर
काम करूँ।" मेरे लिए मुसीबत की बात यह थी कि कलकत्ता के विभिन्न क्रान्ति-
कारी दल के आदमी यह समझते थे कि मै ढाका अनुशीलन समिति मे शामिल
हूँ। इधर ढाका अनुशीलन समितिवाले मेरे साथ खुले दिल होकर काम नहीं
करना चाहते थे। ढाका समिति के एक और प्रमुख नेता श्री रमेशचन्द्र चौधरी ने
तो एक दफा घमण्ड मे आकर ऐसा भी कहा था कि "संगठन के बारे मे आपसे हम
लोग कुछ सीखना नही चाहते।" इन सब कारणो से मैंने भी समझ लिया था कि
मुझे अकेला ही सब काम करना पड़ेगा। एक तरफ जैसे ढाका अनुशीलन समिति
के नेतागण मुझे अपनी सब बाते नही बताना चाहते थे ? वैसे ही दूसरी तरफ वे
यह भी नही चाहते थे कि मै उनसे अलग हो जाऊँ। इसलिए उनकी हमेशा यह
नीति रहती थी कि हर प्रकार से मुझे अपने दल मे रखने के लिए तरह-तरह की
कोशिशे करते थे। और मुझे समझाना चाहते थे कि मुझे अपनी सब बाते बता
देने मे उन्हे कोई आपत्ति नहीं है। काम करते-करते सब बातें स्वय ही जान
जाऊँगा। उनकी यह दुरंगी चाल मुझे पसन्द न थी। इसलिए मैं उनसे हमेशा
कन्नी काटा करता था। मैंने उन्हे समझने नहीं दिया कि मै भी कुछ काम कर रहा
हूँ। सन् 1922 के अन्त तक मुझे पता चला कि ढाका समिति ने अपनी तरफ से
एक आदमी बनारस को भेज दिया है। जब कभी मै बनारस जाता था तो यह
व्यक्ति मेरे पास आकर मेरे साथ बातचीत करने की चेष्टा करना था।
इनका नाम था श्री सतीशचन्द्र सिंह। मैंने कलकत्ता मे इनको कई बार देखा था।
इनसे मेरा थोड़ा-बहुत परिचय था। जिस समय मैं बनारस षड्यन्त्र मामले के
सिलसिले मे जेल में था उस समय श्री सतीशचन्द्रसिंह बिहार मे काम करने आए
थे। श्री सतीशसिंह कुछ पढे-लिखे आदमी नही थे। राजनीति वह क्या समझते
होगे, मैं कह नही सकता। उनमे एक सच्चे सिपाही के सब गुण अवश्य थे। लेकिन
केवल सिपाही-मात्र होने से ही तो सगठन का कार्य ठीक प्रकार से नही हो सकता।
मुझे तो दुख के साथ यह भी कहना पडता है कि वारीन्द्र, उपेन्द्र, हेमचन्द्र
इत्यादि के मुकाबले के क्रान्तिकारी नेता बगाल-भर मे और पैदा नही हुए।
श्री अरविन्द के समय क्रान्तिकारी आन्दोलन का नेतृत्व-जैसे उपर्युक्त विशेष
व्यक्तियो के हाथ मे था वैसा बाद को नही रहा। ढाका अनुशीलन समिति के
नेताओ का बौद्धिक विकास नितान्त अपूर्ण था। वे यह नही समझ पाते थे कि
क्रान्तिकारी आन्दोलन भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन की एक शाखा मात्र है। भारत