बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
पृष्ठ 259, कुल 408 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन / 257
आन्दोलन विराट् राष्ट्रीय आन्दोलन की एक शाखा मात्र है एवं इन नेताओं में
राष्ट्रीय आन्दोलन के नेतृत्व करने की योग्यता नही थी। इस दृष्टि से, सम्भवतः
भारत के दूसरे क्रान्तिकारी दलों मे भी उपयुक्त नेता नही थे। यही कारण था
कि भारत के दूमरे क्रान्तिकारी दलो का कृतित्व भी जैसा होना चाहिए था, वैसा
नही हुआ ।
श्री सतीशचन्द्रसिंह से दल-सगठन के बारे मे मैंने कभी कुछ बातचीत नहीं
की। यदि कोई व्यक्ति किसी काम मे जुटा रहे तो अवश्य ही उसे कुछ सफलता
प्राप्त होती है। इस दृष्टि से सतीशचन्द्र ने भी दो-चार नवयुवकों को जमा कर
लिया था। ढाका ममिति के नेतागणों ने मेरे साथ कोई परामर्श न करके ही
श्री सतीशचन्द्र को बनारम भेजा था। इस बात से भी मैं समझ गया कि ढाका
समिति मेरी अपेक्षा न रखकर ही युक्त प्रान्त मे भी अपना सगठन बढाना
चाहती है। मेरे और ढाका समिति के बीच जो भ्रन्तर था वह इससे और भी बढ़
गया।
इधर सुरेशचन्द्रजी की सहायता से एक प्रतिभावान नवयुवक से मेरा परिचय
हुआ। इनमे बातचीत करने पर मुझे यह विश्वास हो गया कि इस युवक में
साहित्यिक रुचि है। बाद को इनके दो-एक छोटे लेख भी पढे। उनके उस समय के
एक लेख का प्रभाव आज भी मैं भूल नही पाया। उम लेख का शीर्षक था—'माँ'।
इस लेख को पढकर मैंने इम युवक से कह दिया था कि 'यदि आप साहित्य की
चर्चा करते रहें तो हिन्दी लेखको मे आप अग्रणी हो मकते हैं। लेकिन आपको
चाहिए कि अग्रेजी, बगला एव हिन्दी-साहित्य से खूब परिचित हो जाएँ।' ये
अग्रेजी प्रायः जानते ही न थे। ये प्रतिभावान युवक 'आज' मे 'उग्र' नाम से अपना
लेख दिया करते थे। आज ये सब बात स्मरण करके मैं यथेष्ठ गौरव अनुभव
करता हूँ एव यह आत्म-तुष्टि भी अनुभव करता हूँ कि एक यथार्थ प्रतिभाशाली
युवक को मैंने उसकी तरुण अवस्था मे ही पहचान लिया था। आज उग्रजी ने
हिन्दी-साहित्य मे अपना सुनिर्दिष्ट स्थान प्राप्त कर लिया है। जिस दिन मैंने उन्हें
पहचाना था उस दिन उन्होने माहित्य मे पदार्पण मात्र ही किया था। और उस
दिन उन्हे हिन्दी मसार मे कोई विशेष रूप से जानता भी न था। हम लोगो के साथ
परिचय होने के बाद ही, सभवत. उन्होने 'माँ' नामक लेख लिखा था। मुझे
मर्मान्तक दुख है कि अग्रेजी के द्वारा हम लोगो का मम्बन्ध अधिक घनिष्ठ नही
हो पाया। और मुझे यह भी अत्यन्त खेद है कि उग्रजी ने मेरे कथनानुसार अग्रेजी
इत्यादि साहित्य मे वैसी रुचि नही दिखलाई, जैमी मै चाहता था। इसमे तो कोई
सन्देह नही कि उनकी लेखनी मे अत्यन्त शक्ति है ? लेकिन उनकी रुचि मे
पगवर्तन हो जाने के कारण उनका सृष्ट माहित्य समाज को आशानुरूप कल्याण-
प्रद सिद्ध नही हुआ, यह और बात है। परन्दु इसमे कोई मदेह नही है कि वे
प्रतिभाशाली लेखक है। इनकी सहायता से हमारे दल को एक ऐसा महत्त्वपूर्ण
लाभ हुआ कि जिसके जिए हम सब सदा उनके कृतज्ञ रहेगे। इस विषय का