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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 262, कुल 408 में से

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पृष्ठ 262

260 / बन्दी जीवन
नही हुए और बंगाल के कुछ व्यक्तियों से मिलकर भविष्य की कार्यप्रणाली के
बारे में बहुत कुछ ब'तचीत की थी। अवश्य ही हम सब एकत्र बैठकर बातचीत
नही करते थे क्योंकि हम लोगों के दल की यह नीति थी कि विभिन्न प्रान्त के
कार्यकर्ताओं मे जान-पहचान जितनी कम हो उतना ही अच्छा ।
गया कांग्रेस मे मेरे रवैये को देखकर मेरे एक रिश्तेदार के दिल में यह
सन्देह पैदा हो गया कि मैं फिर कुछ ऐसा काम करनेवाला हूँ जिससे संकट का
आना अनिवार्य है। मेरे ये आत्मीय घर मे जाकर कहने लग गए कि शचीन्द्रनाथ
फिर गड़बड़ी करनेवाले हैं। श्री सुरेशचन्द्र भट्टाचार्य जी खोलकर मेरे साथ सह-
योगिता करते थे उनसे यदि किसी डकैती करने या किमी आदमी को गोली
मारने को कहा जाये तो अपात्र से ऐमा कहा जाएगा। जिस व्यक्ति से जितना
काम लेना उचित है यह न जानने पर दल का संगठन करना कठिन हो जाता है।
यही कारण है कि हम लोगो की एवं भगतसिंह की गिरफ्तारी के बाद हमारा दल
टूटने लग गया था। मैं जानता था कि श्री सुरेशचन्द्र आदि से कितना काम लिया
जा सकता है। श्री सुरेश चन्द्र बड़े चरित्रवान, साहित्य मे रुचि रखने वाले, विचार-
शील और आदर्शवादी युवक थे। विप्लव-कार्य मे शामिल होने से कितना सकट
है इसे वे जानते थे। यह जानते हुए भी हमारा साथ देने मे सुरेश बाबू कभी पीछे
नही हटे। मेरे पास उनकी उस समय की एक चिट्ठी की नकल आज भी मौजूद
है। उनके वचनों से यह पता चल सकता है कि सुरेश बाबू कैसे उच्चकोटि के
विचार रखनेवाले शुद्ध हृदय के युवक थे। गया वांग्रेस मे सुरेश बाबू ने मेरा
खूब साथ दिया।
गया कांग्रेस से लौटने के बाद इलाहाबाद मे मैंने एक छोटा-सा मकान
किराए पर ले लिया। जैसे मैंने भगतसिंह को अपना घर छोड़कर निकल आने
को कहा था वैसे ही फतेहगढ़ के आर्गेनाइजर श्री छेदालालजी को भी मैंने घर
छोड़कर निकल आने को कहा। श्री छेदालालजी ने भी मेरे कहने के अनुसार
अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और इलाहाबाद चले आए। इसी प्रकार से श्री
बनवारीलाल भी अपना घर-बार छोड़कर इलाहाबाद के मकान मे श्री छेदालाल
जी के साथ रहने लग गए। विभिन्न जिलो के कार्यकर्तागण प्रायः मेरे पास
आते थे। उन्हे मै उसी मकान मे ठहराता था। इस प्रकार से विभिन्न जिलों के
कार्यकर्तागण एक-दूसरे को थोड़ा-बहुत जानने लगे थे। लेकिन फिर भी एक-
दूमरे का नाम या एक-दूगरे का पता कोई किसी से पूछ नही सकता था। उसी ममय
श्री छेदालालजी के मार्फत एक सन्यामी से मेरा परिचय हुआ। उमी मकान मे
बातचीत हुई। सन्यामी जी अपने को आर्यममाजी कहते थे। इनका कोई गिरोह था
जिसवा काम था डकैती करना। यह मन्यासीजी हमसे कहते थे कि उनके गिरोह
का नियम यह रहा है कि डकैती के बाद माल इत्यादि बेचकर जितने रुपये हाथ आते
थे वे सब समान रूप से सदस्यो मे बाँट दिए जाते थे। इस प्रकार से वह सन्यासी
एक क्रान्तिकारी दल बना रहे थे। इस संन्यासी का कहना था कि संकटकाल में