सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 252, कुल 408 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 252

250 / बन्दी जीवन
मुलाकात हो गई। मेरे मकान में आपने एक दिन खाना भी खाया। बाद को
इनसे आगरा में जाकर मिला। श्री देवनारायणजी ने मैनपुरी केस के बारे में
तमाम बातें मुझे बताईं। शाहजहाँपुर निवासी श्री रामप्रसादजी बिस्मिल भी
मैनपुरी दल में एक प्रमुख व्यक्ति थे। श्री देवनारायणजी से पता चला कि राम-
प्रसादजी और देवनारायणजी में एक भीषण विरोध है। मेरे लिए अब यह एक
समस्या हो गई कि इन दोनों व्यक्तियों में से किसको अपने दल में लूँ। मेरे दिल
में एक सन्देह पैदा हुआ कि यदि देवनारायणजी को साथ लेता हूँ तो सम्भव है
कि रामप्रसादजी मेरे साथ न आएँ और यदि रामप्रसादजी मेरे साथ आते हैं तो
सम्भव है देवनारायणजी मेरा साथ न दें।
देवनारायणजी से मैंने कहा कि आप देहात को छोड़कर आगरा में आकर डट
जाएँ। देवनारायणजी ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। श्री देवनारायणजी
ने मुझे आगरा में कुछ बातें बताईं थीं जिनका इस स्थान पर उल्लेख कर देना
नितान्त प्रासंगिक होगा। एक तो देवनारायणजी ने मुझे यह अच्छी प्रकार सम-
झाना चाहा कि अब मुझे प्रकाश्य आन्दोलन में कदम रखना चाहिए। दूसरे,
उन्होंने रामप्रसादजी के बारे में कुछ ऐसी बातें बताईं जिसे इस स्थान पर वर्णन
करने में मन संकुचित हो जाता है। देवनारायणजी की बात पर यकीन कर लेने
पर रामप्रसादजी को दल में ले लेना निहायत अनुचित जान पड़ता था। लेकिन
मैंने दिल में सोचा कि देवनारायणजी और रामप्रसाद के बीच परस्पर घोर विद्वेष
है, इसलिए देवनारायणजी की बातों पर पूर्ण रूप से विश्वास करना उचित नहीं
है। प्रकाश्य आन्दोलन में मैं भी लगना चाहता था, इसलिए देवनारायणजी की
इस बात को मैंने सर्वान्तःकरण से स्वीकार कर लिया। देवनारायणजी से बातचीत
करके मुझे बहुत-कुछ प्रसन्नता हुई। वे बहुत गम्भीर प्रकृति के समझदार आदमी
थे। लेकिन हमारे देश का यह परम दुर्भाग्य है कि गम्भीर प्रकृति के समझदार
व्यक्तियों ने निहायत ही कम संख्या में भारतीय विद्रोह आन्दोलन में भाग लिया
है। पता नहीं यह परम दुर्भाग्य या सौभाग्य की बात हुई कि श्री देवनारायणजी
ने अपने वादे को पूरा नहीं किया। उनसे बातचीत करके यह तय हुआ था कि
देवनारायणजी अपने गाँव को छोड़कर आगरा में जाकर अपना केन्द्र स्थापित
करेंगे। यदि देवनारायणजी ऐसा करते तो उत्तर भारत का विप्लव आन्दोलन
और भी गौरवमय रूप धारण करता।
इतिहास के पृष्ठों में 'सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् मा ब्रूयात् सत्यं अप्रियम्' इस
वाक्य का स्थान नहीं है। लेकिन मैं ऐसा कुछ लिखना नहीं चाहता जिससे क्रान्ति-
कारी आन्दोलन को धक्का पहुँचे। तथापि एक बात यहाँ यह कह देना नितान्त
आवश्यक है कि क्रान्तिकारी आन्दोलन गुप्त और षड्यन्त्र रूप से होने के कारण
अवांछनीय एवं अनुपयुक्त व्यक्तियों का इस आन्दोलन में शामिल हो जाना एक
विषम संकट का कारण हो जाता है। आज भी मुझे अत्यन्त भय है कि यदि योग्य
व्यक्ति क्रान्तिकारी आन्दोलन करना आरम्भ कर देता है तो शुद्ध हृदयवाले