बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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नहीं हुआ। सम्भव है सन् 1922 के अन्त तक ढाका अनुशीलन समिति की तरफ
से कोई प्रतिनिधि बनारस पहुंचे हों। सन् 1921 में नागपुर कांग्रेस से लौटने के
पश्चात् जब ढाका अनुशीलन समिति के श्री प्रतुल गांगुली के साथ मैं बनारस
आया था उस समय अर्थात् सन् 1922 के प्रारम्भ में बनारस में ढाका समिति के
कोई प्रतिनिधि उपस्थित नहीं थे। यद्यपि श्री प्रतुल गांगुली के कुछ परिचित व्यक्ति
उस समय बनारस में हिन्दू कॉलेज में पढ़ते थे परन्तु इन छात्रों से प्रतुलजी ने
मेरा परिचय नहीं कराया। अर्थात् उस समय फिर मैंने यह अनुभव किया कि
प्रतुल गांगुली अपने दल की सब बातें मुझे बताना नहीं चाहते थे। सन् 1922 के
अन्त तक मेरा कार्य बहुत-कुछ अग्रसर हो चुका था। इसे संगठन न कहकर
संगठन का एक ढांचा कहना ही उचित होगा। मुझे इस वक़्त ठीक याद नहीं है,
लेकिन जहां तक मुझे याद है, सम्भव है, सन् 1922 में ही मैं भगतसिंह के पास
लाहौर पहुँच गया। जिस प्रकार से मैं इलाहाबाद के होस्टल में नवयुवकों को
ढूंढ़ता फिरता था, उसी प्रकार से एक दिन फतेहगढ़ में अपने अजीब तरीके के
कारण एक प्रतिभावान नवयुवक के पास जा पहुँचा जिनकी सहायता से अन्त में
मैं भगतसिंह के पास भी पहुँच गया। इसका एक पूरा इतिहास है। वह जैसा रोचक
है, वैसा ही कौतूहलपूर्ण भी है।
जमशेदपुर से इलाहाबाद लौट आने के पहले मैं दो-तीन बार कलकत्ता गया
था। कलकत्ता में विभिन्न क्रान्तिकारी दल के आदमियो से समय-समय पर बात-
चीत करता रहा। इलाहाबाद लौट आने के बाद भी मैं कई बार कलकत्ता गया।
जिस प्रकार युक्त प्रान्त में मैं अपना संगठन कार्य करने की चेष्टा कर रहा था ?
उसी प्रकार कलकत्ता मे भी मैं अपना एक दल बनाना चाहता था। जमशेदपुर मे
रहते समय भी मैं नितान्त असावधान नहीं रहा। समय पाकर मैं कभी नहीं
चूका।
एक दिन कलकत्ता के मिसी पार्क में मैंने देखा कि कुछ भद्र नौजवान एकत्र
होकर बातचीत कर रहे हैं। मैं भी उनके पास जाकर बैठ गया। थोड़ी ही देर मे
मालूम पड़ा कि ये सब नौजवान आधुनिक राजनीतिक प्रश्न पर बातचीत कर
रहे हैं। मैंने भी इन लोगों के वार्तालाप में धीरे-धीरे योग देना प्रारम्भ कर दिया।
इस प्रकार इस टोली के साथ मेरा खूब परिचय हो गया। इनमें से एक युवक
महाशय अच्छे घर के थे। लड़ाई के समय ब्रिटिश सेना में सिपाही के रूप में इराक
और मैसोपोटामिया तक पहुँच गए थे और अपनी कार्य-कुशलता के कारण पलटन
में ओहदा भी पा चुके थे। जिस समय का मैं उल्लेल कर रहा हूँ, उस समय
आप यूनिवर्सिटी कोर में एक अच्छे पदाधिकारी थे। इधर आप इंजीनियरिंग
कॉलेज में भी पढ़ते थे। इनकी सहायता से बंगाल में कुछ और नवयुवकों से मेरा
परिचय हुआ। लेकिन अनुशीलन समिति के किसी भी सदस्य को मैंने कभी कुछ
बताया नहीं कि मैं क्या कर रहा हूँ और क्या नहीं कर रहा हूँ। एक दफा ढाका
अनुशीलन समिति के प्रमुख नेता श्री प्रतुलचन्द्र गांगुली से मैंने यह कहा था,