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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 260, कुल 408 में से

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पृष्ठ 260

258 / बन्दी जीवन
उल्लेख यथास्थान किया जायगा।
अण्डमन से लौटने के बाद मुझे बनारस में रहने का अवसर नहीं मिला। इस
कारण बनारस में मैं वैसा संगठन नहीं कर पाया जैसा होना उचित था। निजी
सांसारिक कारणों से मुझे इलाहाबाद में रहना था। बनारस में अभी तक मुझे
जितने व्यक्ति मिले थे उनमें श्री राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी एवं श्री बेचनरामजी शर्मा
विशेष उल्लेख योग्य थे। इसके अतिरिक्त और जितने व्यक्ति हमारे दल में
आए थे उनमें से बहुतों ने बाद को काम करना छोड़ दिया। सौभाग्य की बात है
कि इनमें से किसी ने भी बाद को विश्वासघात नहीं किया।
इलाहाबाद में राष्ट्रीय विद्यालय की सहायता से कुछ आदमी मिले। उनमें
से एक थे श्री बनवारीलाल। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में से श्री केशवदेव मालवीय
के साथ मेरा परिचय हुआ। इनके एक भाई श्री कपिलदेव मालवीय के साथ
बहुत दिनों से मेरी तथा मेरे परिवार-भर की जान-पहचान थी। मैं प्रायः
कपिलदेवजी के पास जाया-आया करता था। केशवदेवजी प्रायः मुझे अपने भाई
के पास आते-जाते देखते थे। केशवदेव स्वयं ही मुझसे आकर मिले थे। इस समय
आप मेरे साथ काम करने को तैयार हो गए थे। उनकी सहायता से और भी
नवयुवकों से मेरा परिचय हुआ था। इस प्रकार से धीरे-धीरे मेरा दल बढ़ रहा
था। एक दिन केशवजी ने मुझे बतलाया कि कानपुर में एक प्रतिभावान नवयुवक
हैं जिनसे अपने कार्य के बारे में बातचीत की जा सकती है। इस नवयुवक का नाम
था श्री बालकृष्ण शर्मा। केशवजी के आग्रह से यह निश्चय हुआ कि , शव कानपुर
जाकर बालकृष्ण को मेरे पास बुला लाएंगे। एक दिन वे प्रातःकाल बालकृष्णजी
को साथ लेते हुए मेरे पास आए। बहुत देर तक बातचीत हुई। अन्त में मैने इस
प्रकार से अपनी युक्ति प्रस्तुत की कि अदूर भविष्य में फिर लड़ाई छिड़ने की
आशंका है, यदि हम उपयुक्त तैयारी कर सकें तो उस अवस्था में हम एक बार
फिर स्वाधीनता को प्राप्त करने की चेष्टा कर सकते हैं, यदि हम अभी से तैयारी
नहीं करते हैं तो अवसर आने पर भी हम कुछ नहीं कर पाएंगे। लेकिन कोई
युक्ति काम नहीं आई। बालकृष्णजी ने कहा कि अभी शीघ्र लड़ाई की कोई
संभावना नहीं है और अभी वह समय भी नहीं आया है कि हम क्रान्तिकारी
मार्ग से षड्यन्त्र की रचना करें। आशा भंग की मर्मान्तक पीड़ा से मैं व्यथित हो
उठा।