बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
पृष्ठ 254, कुल 408 में से
संदर्भ में पढ़ें252 / बन्दी जीवन
जगह सामरिक तन्त्र स्थापित हो जाता है। इसका प्रतिकार तभी हो सकता है
जब प्रजा में अपनी नेतृत्व करने की शक्ति पैदा हो। क्रान्तिकारी उथल-पुथल के
इतिहास आदि पढ़कर अभी तक मेरी यही धारणा बनी रही कि मध्यम श्रेणी के
शिक्षित सम्प्रदाय से ही भारत के भावी समाज-संगठनकारी गण निकलेंगे।
महात्मा गांधी के अतुलनीय आन्दोलन के बाद भी मेरा यह दृढ़ विश्वास बना
रहा कि भारत की आम जनता उथल-पुथल के लिए जितनी तैयार है उनका
नेतृत्व करनेवाले उपयुक्त व्यक्तियों का उतना ही अभाव है। एक बात तो यह
थी। दूसरी बात यह थी कि महात्माजी और उनके अनुयायीगण अथवा जन-
आन्दोलन के दूसरे प्रतिष्ठित नेतागण भारतवर्ष को पूर्ण रूप से स्वतन्त्र बनाने के
लिए सचेष्ट तो थे ही नही बल्कि वे नेतागण भारत की स्वाधीनता के प्रश्न को
अलीक स्वप्नवत् समझा करते थे। वे कभी भी यह विश्वास नही करते थे कि
भारतवर्ष को स्वाधीन करने का प्रश्न वास्तविक जगत् का प्रश्न है। ये सब लब्ध-
प्रतिष्ठ नेतागण यह समझते थे कि कुछ बहके हुए भारत के नौजवान भारत को
स्वाधीन करने का स्वप्न देखा करते हैं। यह प्रश्न आये दिन का प्रश्न ही नही है।
भारत के सर्वमान्य नेतागण स्वाधीनता के प्रश्न को व्यवहार में लाने योग्य सम-
झते ही न थे। सम्भव है आज भी वे ऐसा ही समझते हों। महात्माजी और उनके
साथियों का कहना है कि "स्वाधीनता, स्वाधीनता करके चिल्लाने से क्या होता
है। जो लोग ऐसा चिल्लाया करते हैं वे लोग आज तक कुछ करके दिखला भी
सके हैं ? जो कुछ कर सकते है वह तो करते नहीं ? व्यर्थ का शोर मचाते है।
लेकिन भारत को पूर्ण रूप से स्वतन्त्र करने के प्रश्न को जो युवकवृन्द व्यावहारिक
रूप में लाना चाहते थे ? वे ऐसा समझते थे कि भारत को स्वाधीन करने के
लिए जो कुछ करना चाहिए, उसके लिए भारत के प्रकाश्य आन्दोलन के नेतागण
प्रस्तुत नही थे। और इसीलिए वे भारत की स्वाधीनता के प्रश्न को व्यावहारिक
प्रश्न नही समझते थे। क्रान्तिकारियों और कांग्रेस के नेतागणों के दृष्टिकोण में
यही सबसे बड़ा अन्तर है। इस दृष्टिकोण में ऐसा अन्तर रहने के कारण क्रान्ति-
कारी और कांग्रेस-आन्दोलन के मार्ग में भी बहुत अन्तर है। अस्तु, इस स्थान
पर क्रान्तिकारी मार्ग के बारे में मैं कोई विशेष विचार-विमर्श नही करना
चाहता। यहाँ पर इतना कहना पर्याप्त है कि मैं जमशेदपुर से लौटकर युवक
वृन्दों में ही काम करना चाहता था।
मेरे लिए इलाहाबाद के युवकवृन्दों से परिचित होने के लिए कोई सहज और
सरल उपाय नही था। इसलिए मैने प्रतिदिन इलाहाबाद के विभिन्न होस्टलों में
जाना प्रारम्भ कर दिया। जान-पहचान तो किसी से थी ही नहीं। जहाँ देखता
था कि दो-तीन नौजवान बरामदे में खड़े होकर बातचीत कर रहे हैं उनके पास
थोड़ी दूर पर मैं भी जाकर खड़ा हो जाता था। उनकी बातें सुना करता था।
ख़याल यह रहता था कि यदि ये युवकगण राजनीति के बारे में कुछ बातचीत
करने लगें तो मैं भी अवसर देखकर उसमें शामिल हो जाऊँ। लेकिन दुर्भाग्य की