बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन / 251
त्यागी साहसी युवक तो उसे मिल जाएँगे लेकिन विचारशील एवं योग्य नेतृत्व के
अभाव से इन सब नवयुवकों का अमूल्य जीवन सार्थक होने नहीं पाएगा। बंगाल
में ऐसे बहुत-से तुच्छ अयोग्य छोटे-छोटे विप्लवी दलों से मैं खूब परिचित रहा।
मुझे इस बात की आशंका रही कि यू० पी० मे भी वैसे ही अयोग्य व्यक्तियों के
नेतृत्व में बंगाल की तरह भिन्न-भिन्न छोटी-छोटी पार्टियां न खड़ी हो जाएँ।
जिस दिन मैंने अण्डमन से लौटकर सर्वप्रथम यू० पी० विप्लव दल का संगठन
पुनः क़ायम किया था उस समय यहाँ पर और कोई दल काम नहीं कर रहा
था।
सन् 1920 मे अगस्त-सितम्बर महीने में कलकत्ता मे कांग्रेस का एक विशेष
अधिवेशन हुआ था। उस अवसर पर कलकत्ता के प्रसिद्ध बैरिस्टर श्री बी० सी०
चटर्जी साहब ने मैनपुरी केस के एक मुक्त राजबन्दी के साथ मेरा परिचय करा
दिया था। उनका नाम है श्री चन्द्रधर जौहरी। उनकी आंखों मे मैंने उस दिन
जो जोश और आन्तरिकता देखी थी उससे यह अनुमान किया था कि यह व्यक्ति
जिस काम को हाथ मे लेगा उस काम के पीछे सर्वस्व दे देगा। सच तो यह है
कि जौहरीजी को देखकर तत्काल ही मेरे मन मे जो भावना पैदा हुई थी उसका
अग्रेजी नाम है Fanatical zeal, लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि इनसे बाद को
फिर मिलने का अवसर मुझे नही मिला। मुझे इस वक्त ठीक याद नही है कि
जौहरीजी सन् '21 के आन्दोलन मे गिरफ्तार हो गए थे या नही। सम्भव है, हो
गए हो और इसीलिए संभव है फिर बाद को उनसे मेरी मुलाकात नही हुई। ये
बिचारे शर्त पर छोड़े गए थे। जिन शर्तों पर छूटे थे उनमे से एक शर्त यह भी
थी कि यदि सरकार के खिलाफ किसी आन्दोलन मे जौहरीजी भाग लेगे तो उन्हें
फिर पुरानी कैद पूरी काटनी पडेगी। इस कारण जब जौहरीजी ने सत्याग्रह
आन्दोलन मे भाग लिया तो जिला-कलक्टर ने उन्हें दफ्तर मे बुलाकर यह हुक्म
सुनाया कि तुमने सरकार के विरुद्ध आन्दोलन मे भाग लिया है इसलिए तुम्हे
अपनी पुरानी कैद फिर काटनी पडेगी और तुम यहां से सीधे जेल चले जाओगे।
संभव है, यह सन् 1921 की बात है। इनसे जो मुझे आशा थी वह यो ही विलीन
हो गई।
मैं स्वयं छात्र न था। एव पहले कभी इलाहाबाद मे रहा नही था इसलिए
भी इलाहाबाद के युवकगणो से मेरा कुछ भी परिचय न था। क्रान्तिकारी
आन्दोलन की सफलता युवक-मडली पर ही निर्भर रहती है ऐसी मेरी समझ थी।
क्रान्तिकारी आन्दोलन के बारे में मेरी धारणा यह थी कि मध्यम श्रेणी के युवक
वृन्द ही क्रान्तिकारी आन्दोलन का नेतृत्व कर सकते हैं। यह बात सत्य है कि
संघर्ष के समय किसान-मजदूरों की श्रेणी से ही आदमी निकलेंगे, जो यथार्थ में
सिपाही का काम करेंगे। लेकिन सिपाही अपना नेतृत्व स्वयं नही कर सकता।
इतिहास में बहुत दफे ऐसा देखा गया है कि राष्ट्रीय उथल-पुथल के अवसर पर
सेनापति गण सर्वेसर्वा बन जाते हैं। तब स्वाधीनता के स्थान पर प्रजातन्त्र की