बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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गिनती थी, इसी से इस गवर्नमेंट में जो कुछ जहर था, इन्हीं विप्लवियों पर
उसका प्रयोग किया गया। इसी से पंजाब के विप्लव आन्दोलन का पता लगते
ही भारत सरकार ने भारत के मंगल के लिए 'भारत-रक्षा-आईन' के समान
अत्यन्त कठोर शासन-प्रणाली जारी कर दी।
इतिहास में जो चिरकाल से होता आता है, भारत की बारी में भी उससे
उलटा नहीं हुआ। जब कोई पराधीन जाति जागने लगती है तब उस जागरण को
व्यर्थ करने के लिए ऐसी ही कठोर शासन-नीति जारी की जाती है। किन्तु जाति
जब सचमुच जाग उठती है तब संसार की कोई भी कठोर नीति उस जागरण को
व्यर्थ नहीं कर सकती, वरन् इस तरह की कठोर दमन-नीति के द्वारा जाति की
केवल शक्ति-परीक्षा होती है। जाति में यदि सचमुच प्राणों की कुछ शक्ति हो
तो यह सब कठोरता जागृति की रुकावट न होकर सहायक हो जाती है। इसी
से जागरण के दिन राजकोप को वास्तव में कोप न समझकर भगवान् का अनुग्रह
समझना उचित है। भारत के विप्लवियों ने भी सचमुच कभी भी इस दमन-
नीति के लिए अंग्रेजों को दोषी नहीं ठहराया, प्रत्युत वे तो यह सोचते थे कि
इन सब कठोरताओं में से गुजारकर भगवान् हमें जाति को पुनरुज्जीवित करने
के लिए आह्वान करते हैं। वे जानते थे कि पराधीन जाति का स्वाधीनता-प्रयास
इन सब कठोरताओं में से गुज़रकर ही सार्थक होता है। सभी दमन-नीति मानो एक
प्रकार के मीलों के पत्थर (Milestone) हैं। कौन पराधीन जाति स्वाधीनता
प्राप्ति के पथ में कितनी आगे बढ़ी है यह सब दमन-नीति ही मानो उसका
परिचय देती है, भारतीय विप्लववादी यही विश्वास करते थे। इसी विश्वास के
कारण वे सब दुःख-लांछनाएँ प्रफुल्ल-वदन से सह सके, प्राणों के बलिदान से ही
जाति में प्राणों का संचार होता है, इसी विश्वास से वे प्राणों की बलि देने से भी
घबराते न थे।
डिफेंस ऑफ़ इण्डिया ऐक्ट जारी होने के बाद से समरी ट्रायल्स (संक्षिप्त
मुकद्दमे) आरम्भ हो गए। बारी-बारी से पंजाब में तीन षड्यन्त्र केस चले। प्रत्येक
मामले में साठ-सत्तर आसामी थे। इन सब मुकद्दमों के फलस्वरूप पंजाब में एक
साथ अट्ठाईस व्यक्तियों को फाँसी हुई। मेरठ पलटन में ग्यारह व्यक्तियों को
फाँसी हुई, सातवीं राजपूत सेना में कई व्यक्तियों को सम्भवतः दिल्ली में फाँसी
हुई, जिन्हें फाँसी न हुई, उन्हें प्रायः सभी को कालापानी हुआ। ऐसी अवस्था
के बाद भी पंजाब के बचे हुए विप्लवियों के बीच फिर विप्लव की योजना चलने
लगी। कुछ अकाली दल इन सब क़ैदी विप्लवियों को जेल से छुड़ाने के इरादे
बाँधने लगे। सिक्खों के एक और दल ने अस्त्र-शस्त्र की ओर ध्यान दिया। उन
दिनों बड़े-बड़े रेलवे-स्टेशनों पर और बड़े-बड़े पुलों के नीचे हथियारबन्द सिपाहियों
का पहरा रहता था। एक बार विप्लवियों के एक छोटे-से दल ने, जान पड़ता है,
केवल सात-आठ व्यक्तियों ने मिलकर अमृतसर के पुल के सिपाहियों पर एकाएक
हमला कर दिया। वहाँ पंद्रह सिपाही, पंद्रह मैगजीन राइफ़लें और प्रायः सात
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सौ पचास कारतूस थे। सात-आठ पिस्तौलधारी विप्लवी सात सौ पचास कारतूस
समेत पंद्रह-की-पंद्रह राइफलें छीन ले गए। किन्तु उस समय दल की कुछ
अच्छी विधि-व्यवस्था न रहने से थोड़े दिनों में ही बन्दूकों समेत पांच विप्लवी
पकड़े गए। उन पाँचों को फाँसी हुई। इससे पहले ही अट्ठाईस व्यक्तियों को
फाँसी हो चुकी थी। इन्हें फाँसी देने के बाद भी फिर से कुछ सिक्ख स्कूल-
मास्टरों ने मिलकर विप्लव की धारा को अक्षुण्ण रखने की चेष्टा की, सम्भवतः
उसका सिलसिला आज भी चलता होगा। डा० मथुरासिंह आदि कई विप्लवी
भारत त्यागने के बाद अफ़गानिस्तान में से होकर फ़ारस में और मेसोपोटामिया
की भारतीय सेनाओं में विप्लव की बातों का प्रचार करते रहे। एक बार घटना-
क्रम से डा० मथुरासिंह भारत-अफ़गानिस्तान के सीमान्त प्रदेश में पकड़े गए।
उन्हें भी फांसी हुई। जो इस प्रकार फाँसी और कालापानी से बच पाए उनमें से
अनेकों को इण्टर्नमेंट (नज़रबन्दी) भोगनी पड़ी। उस युग में बंगाल और पंजाब
की जितनी इण्टर्नमेंट और किसी प्रान्त में नहीं हुई, और कालापानी और फाँसी
उस बार पंजाब में ही और सब प्रान्तों की अपेक्षा अधिक हुई।
उक्त प्रदेश में भी बनारस षड्यन्त्र मामले के बाद मैनपुरी को केन्द्र बनाकर
प्रायः एक बरस-भर में ही फिर एक बड़ा विप्लव दल उठ खड़ा हुआ। इस
विप्लव दल की बात भी प्रायः दो-एक बरस के बीच ही प्रकाशित हो गई। इस
प्रसंग में एक बात कह देना चाहता हूँ; रूस में प्रायः कोई भी विप्लवी दो मास से
अधिक समय तक अप्रकाशित रूप से काम न कर पाते थे। दो महीने के अन्दर ही
या तो वे राज्य से दण्ड पा जाते थे, या उन्हें देश छोड़कर विदेश का आश्रय लेना
पड़ता था। भारतवर्ष में अब तक प्रायः देखा गया है कि यहाँ विप्लवियों का
कार्यकलाप और उनका परिचय दो बरस से अधिक समय गुप्त नहीं रह पाता।
बंगाल में उस समय फांसी और कालापानी की अपेक्षा नज़रबन्दी ही अधिक
हुई। इन नज़रबन्दियों के कारण बंगाल का विप्लव दल बहुत-कुछ टूट गया,
तब यह विप्लव दल भिन्न-भिन्न भागों में बँटकर देश मे बिखर गया। उस समय
यदि विप्लवियों के हाथ में उपयुक्त परिमाण में अस्त्र-शस्त्र रहते तो वे सरकार
का राज्य चलाना असम्भव कर डाल सकते थे।
उस समय तक रासबिहारी काशी में ही थे। एक दिन केन्द्र से संवाद आया
कि बंगाल के प्रसिद्ध विप्लवनेता श्रीयुत यतीन्द्रनाथ मुखोपाध्याय को अज्ञातवास
में रहना होगा, और उन्होंने कांशी में आकर रहने की इच्छा प्रकट की है। हमने
परामर्श करके देखा कि उन्हें काशी में बेखटके रहना कुछ ऐसी कठिन बात नहीं
है; किन्तु हमने यह भी देखा कि काशी के बाहर उनके दल की भूल-चूक के
कारण काशी पर भी विपत्ति आ सकती है। जिस दल की प्रत्येक विधि-व्यवस्था
अपने नियन्त्रण के अधीन हो उसकी भूल-चूक के लिए दायित्व लिया जा सकता
है, और उस अवस्था में भूल-चूक पकड़ना और उसका संशोधन करना भी अपनी
ताक़त में होता है। किन्तु जिस दल की विधि-व्यवस्था के ऊपर अपना कोई हाथ
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नहीं, उसकी भूल-चूक पकड़ने का सुयोग कहाँ होता है ? यह सच था कि बंगाल के
बहुत-से क्षुद्र-क्षुद्र दल यतीन बाबू के नेतृत्व के अधीन सम्मिलित हो गए थे, किन्तु
वे पूर्व बंगाल की अनुशीलन समिति के साथ अथवा चन्दननगर के विप्लवियों के
अर्थात् रासबिहारी के साथ सम्मिलित न हुए थे, और न होने की कोई चेष्टा ही
करते थे, जापान जाने से पहले रासबिहारी ने उनके साथ भेंट करने की बहुत
चेष्टा की, किन्तु जिस किसी कारण से हो, भेंट न हो सकी। खैर, जो भी हो, जब
यतीन बाबू के काशी आने की बात चली तब हमने सब तरफ देख-भालकर उन्हें
काशी में रखने का भार लेना स्वीकार कर लिया, किन्तु क्या जाने क्यों उन्होंने
खुद ही काशी न आना ही तय किया ।
उस समय भी यतीन बाबू कलकत्ता छोड़कर गए नहीं। एक दिन वे अपने
पाथुरियाघाट वाले एक मकान पर आये हुए थे। वहाँ और भी कई फ़रार विप्लवी
थे । उस समय उसी घर में घटनाक्रम से थोड़े दिनों का परिचित एक आदमी आ
उपस्थित हुआ। इस आदमी पर वे गुप्तचर होने का सन्देह करते थे, इसी से
भली प्रकार आगे-पीछे देख-भाल करने से पहले ही विप्लवियों में से एक ने इस
थोडे दिन के परिचित आदमी को देखते ही गोली दाग़ दी । सुविधा होती तो
यतीन बाबू को गवर्नमेंट निश्चय से पकड़ लेती। यतीन बाबू को बचाने की
ख़ातिर ही सम्भवतः इस युवक ने इस प्रकार गोली दाग़ दी थी। यह बात सच
है कि यतीन बाबू ने गोली नही मारी, किन्तु इस व्यक्ति ने डाइंग-डिक्लेरेशन
(मरते समय के इज़हार) में यतीन बाबू के नाम पर ही गोली मारने का अभियोग
लगा दिया। इस प्रकार यतीन बाबू के नाम पर फांसी का परवाना लिखा गया।
जब उस व्यक्ति को गोली ही मारनी थी तब फिर डाइंग-डिक्लेरेशन देने का
सुयोग क्यों दिया गया, यह कह नहीं सकता।
लाचार यतीन बाबू को दूसरी जगह जाना पड़ा । यतीन बाबू के लिए एक
निरापद स्थान ठीक हुआ। वहाँ जाने का समय आया तो यतीन्द्रनाथ अपने
साथियों से कह उठे, "जब तक मैं भली भाँति न जान लूं कि तुमने और सबके
लिए भी ऐसे ही निरापद स्थान ठीक कर रखे हैं, जैसा मेरे लिए किया है, तब तक मैं
तुम्हारा यह बन्दोबस्त मान नहीं सकूंगा, हम सब बरखास्त किये हुए सिपाही हैं,
हर घड़ी मृत्यु का आदेश सुनने की प्रतीक्षा में हैं, इसीलिए सभी एक संग रहना
चाहते हैं, जिससे एक प्रभावशाली मुठभेड़ (effective struggle) की जा सके,
which will create a moral impression जिससे जनता पर एक नैतिक
प्रभाव हो सके ।
अन्त में उनकी इच्छानुसार ही व्यवस्था हो गई, जिससे वे लोग पाँच व्यक्ति
बालेश्वर के निकट एक अड्डा बनाकर रहने लगे। इधर विप्लवान्दोलन भी बन्द
नहीं हुआ। दूर बालेश्वर में रहते हुए भी यतीन्द्र बाबू विप्लव कार्य की परि-
चालना करते थे। यदि विप्लवी लोग भागकर फिर से विप्लव के कार्य में ध्यान न
देकर निश्चेष्ट होकर केवल अपने को गुप्त रखने का ही खयाल करते, तो मालूम
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होता है, कोई भी विप्लवी पकड़ा न जाता। विप्लवी लोग अपने को गुप्त रखकर
भी बराबर विप्लव कार्य में लिप्त रहते थे, इसी कारण वे बार-बार विपत्ति में
पड़ते थे। किन्तु केवल प्राण बचाना ही तो विप्लवियों का उद्देश्य न था। जीवन
यदि देश के काम में न लगा तो जीवन बना रहने से क्या बनेगा, यही थी
विप्लवियों की धारणा। उधर पूर्व परिच्छेद में उल्लिखित उसी बैंकॉक के वकील
ने जब विप्लवायोजन के सब सम्वाद सरकार के पास खोल दिये तब उसी सिल-
सिले में कलकत्ता में और कुछ धर-पकड़ हुई। इसी सूत्र से फिर यतीन्द्रनाथ के
अड्डे का सम्वाद भी पुलिस को मिल गया। यतीन्द्रनाथ को भी पता लग गया
कि पुलिस को उनका सुराग़ मिल गया। वे चाहते तो उसी समय भाग सकते थे,
पर तुच्छ प्राणों के डर से यतीन्द्रनाथ भागना न चाहते थे। उद्देश्य-सिद्धि के लिए
यदि उन्हें दूसरी जगह जाना होता तब भी वे अपने साथियों को छोड़कर भागने
को राज़ी न थे। वे अपने साथियों के जीवन और अपने जीवन में कोई भेद न
देखते थे। इसी से तय हुआ कि सभी एक सग ही जाएँगे, किन्तु उनके साथियों में
से दो उस समय बारह मील दूर घने जंगल में थे। उनका किसी प्रकार भी
छोड़कर जाना नही हो सकता। यतीन्द्रनाथ अपने दूसरे संगियों को ले अँधेरी
रात में पहाड़ी रास्ते से जंगल के बीचोंबीच अपने साथियों को लाने के लिए
चल पड़े। अपरिचित रास्ते पर बारह मील रास्ता तय करके फिर बारह मील
वापम आकर दूसरी जगह जाना असंभव था। तब भी यतीन्द्र बाबू का हृदय
इसे असम्भव कहकर रह नही सकता था। असाध्य साधन ही उनके जीवन का
व्रत था—उस दिन भी उस असाध्य साधन में ही वे अग्रसर हुए। लौटते हुए रात
बीत गई। उस समय जंगल के साथ-साथ गाँवों के पड़ोस मे नदी के किनारे-
किनारे चौकियाँ बैठ गई थी; किन्तु इतना आयोजन होने पर भी वे बस्ती में
घुसकर बालेश्वर की ओर भाग चले। उनके साथ चित्तप्रिय, मनोरंजन, नीरेन्द्र
और ज्योतिष ये चार युवक थे। उस समय सबेरा हो गया था, गाँव के लोगों
को पुलिस ने समझा दिया था कि एक भयकर डकैतों का दल उनके इलाक़े में
छिपा हुआ है, उन्हें पकड़ने अथवा पकड़ा देने पर यथेष्ठ पुरस्कार दिया जायगा।
पिछले दो दिन यतीन्द्रनाथ को खाना या सोना कुछ नसीब न हुआ। दिन दोपहर
की धूप में उन्हें फिर भी ग्राम, नदी, नाले पार करके चलना पड़ रहा था। राह
में एक नदी पार होते समय माझी से कहा कि सारा दिन उन्हें कुछ खाने को नही
मिला, थोड़ा-सा भात रांध दे तो उनके प्राण बचें, किन्तु हिन्दू माझी अपने जन्म-
जन्मान्तरों के संस्कारों की रक्षा में ही व्यस्त रहा ब्राह्मण की प्राण-रक्षा हो या
न हो, ब्राह्मण को भोजन करा के वह नरक जाने को प्रस्तुत न था, वह नीच जाति
का होकर ब्राह्मणों को किसी प्रकार भात राँधकर न दे सकता था, इसी कारण
भात रांधने की हाँडी भी न दे सकता था। इधर पुलिस को भी सन्धान मिल गया
कि यतीन्द्रनाथ अमुक गाँव में से गुज़र रहे हैं। यतीन्द्रनाथ के पीछे-पीछे सशस्त्र
पुलिस दल छूट पड़ा। इस प्रदेश में यदि विप्लवियों का आर्गनाइजेशन (संगठन) रहा
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होता तो उस विपत्ति में भी वे रक्षा पा सकते थे। किन्तु आर्गनिजेशन न रहने
से उन्हें क्रमशः एक गांव से दूसरे गांव भागना पड़ा। इस प्रकार सन्ध्या के बाद
बालेश्वर के निकट एक जंगल में आ उपस्थित हुए। उस समय ज़िले के मैजिस्ट्रेट
और ज़िले के सुपरिटेण्डेण्ट, आर्मड् (सशस्त्र) पुलिस सर्चलाइट (search
light) इत्यादि खण्डयुद्ध (skirmish) का सब सरंजाम संग लेकर यतीन्द्रनाथ
के पीछे दौड़ते आते थे। यतीन्द्रनाथ दल सहित आगे-आगे जा रहे थे, और पीछे
पुलिस दल दो भागों में बँटकर जंगल के दोनों बाजू पर सर्चलाइट छोड़ते हुए
क्रमशः एक-दूसरे के नजदीक होते हुए यतीन्द्रनाथ का पीछा कर रहा था। इस
प्रकार जंगल में से खिसक जाना यतीन्द्रनाथ के लिए सम्भव न रहा। भोर भी हो
गया। अब और निस्तार नहीं—पुलिस बहुत ही निकट थी। उस समय यतीन्द्र-
नाथ के साथियों ने सजल नेत्रों से प्रार्थना की—वे मरते हैं तो मरें, यतीन्द्रनाथ
कपटवेश से दूसरी जगह निकल जायें। किन्तु यतीन्द्रनाथ ने यह प्रस्ताव नहीं
माना। वे बोले—"प्यारे भाई, देखो, विचार करो, हम सब पिता-माता की
स्नेहमयी गोद, स्त्री-पुत्रों का माया-बन्धन, बन्धु-बान्धवों का प्यार-दुलार और
घर की सुख-शान्ति छोड़कर आये हैं, एक संग काम करेंगे यही कहकर न ? अब
इस विपत्ति के समय वह प्रण क्योंकर छोड़ दें ? मनुष्य तो अमर नहीं है। एक-
न-एक दिन उसे मरना ही होगा। तब कायरों की तरह मरने से लाभ क्या !"
युद्ध करना ही तय पाया। एक ओर प्रायः हज़ार से अधिक गाँववाले, डाकू
पकड़े जा रहे हैं यह समझकर, हथियारबन्द पुलिस सेना का साथ दे रहे है—
दूसरी ओर हैं केवल पांच विप्लवी ! वे फिर जंगल छोड़कर गांव मे आ घुसे।
भूख, अनिद्रा और राह की मेहनत से वे सभी हारे-थके थे। एक पैसे का चना-
चबेना खरीदकर खा लेने का भी चारा न था। इतने मे दोनो दलों ने एक-दूसरे
को देख लिया, दोनों ओर से गोली चली। पुलिस की ओर के एक साहब
विप्लवियों की ओर ज़रा अधिक आगे बढ़े, उसी समय चित्तप्रिय की एक गोली से
उनकी टोपी आसमान में उड़ गई। पुलिस के साहब फिर आगे न बढ़े। विप्लवी
लोग ऊँची-नीची ज़मीन पर लेटकर निशाना बांधकर गोली छोड़ने लगे। पुलिस
की ओर से भी धारा-प्रवाह गोलियां बरसने लगीं। इस प्रकार प्रबल शत्रुओं के
मुक़ाबले में थके-मांदे, भूखे-प्यासे पांच आदमी कब तक युद्ध कर पाते ? विप्लवियों
की गोलियां भी खतम होने को आईं। वे सभी घायल हो गए थे। किन्तु घायल
होने पर भी उन्होंने हथियार नहीं रखे। इतने में एक घातक गोली आकर
चित्तप्रिय को अमर-धाम ले गई, और सब भी उस समय बुरी तरह घायल थे।
यतीन्द्रनाथ उस समय साथियों से बोले, "अब और शक्ति क्षय करने से कुछ लाभ
न होगा। चित्तप्रिय गया, मैं भी बचूँगा नहीं, तुम अब वृथा प्राण न दो, शायद
तुम फिर भविष्य में कुछ काम कर सको," किन्तु साथी लोग लड़कर प्राण देना
चाहते थे, पर यतीन्द्रनाथ उनके प्राण बचाना चाहते थे। अन्त में उन्होंने यतीन्द्र-
नाथ के आग्रहपूर्ण अनुरोध से आत्मसमर्पण कर दिया। बहुत खून गिरने से
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यतीन्द्रनाथ का शरीर अबसन्न होकर गिर पड़ा, प्यास से उनका गला सूख गया
था । डूबती आवाज में उन्होने कहा, "पानी ! " बालक मनोरंजन के शरीर से
उस वक्त रक्त-धारा बह रही थी । किन्तु नेता की इस अन्तिम आकांक्षा को पूर्ण
करने के लिए वह उस समय भी पास के जलाशय से चादर भिगोकर पानी लाने
के लिए चल पड़ा । इस दृश्य से पुलिस के साहब भी पिघल गए । वे मनोरंजन
से बैठने को कहकर कोई बर्त्तन न होने से अपनी टोपी में ही जल भरकर मरते
आदमी के मुंह में डालने लगे । गले में पानी पहुँचने पर यतीन्द्रनाथ के मुंह से
बात निकली, उस समय स्निग्ध मधुर हँसी हँसकर वे साहब से बोले, "इस मामले
में मैं ही अकेला उत्तरदायी हूँ, इन मेरे साथियों ने मेरे आदेश का ही पालन
किया है ।" यतीन्द्रनाथ ने कटक के अस्पताल में प्राण-त्याग किया । मनोरंजन
और नीरेन्द्र को फांसी हुई । ज्योतिष को आजन्म कालेपानी की सजा मिली ।
यही ज्योतिषचन्द्र बच गए थे, इसी से उनके पास से यह सब संवाद पाकर आज
हम देशवासियों को दे सके हैं । अण्डमन जेल मे नाना रूप निर्यातन्रों को सह न
सकने से ज्योतिषचन्द्र वही पागल हो गए थे । आजकल सुना है वे बहरामपुर के
पागलखाने में रहते हैं ।¹
मृत्यु की गोद में बैठे हुए, कटक के फांसी-घर के अंधेरे कोने से मनोरंजन
और नीरेन्द्र ने जो अन्तिम चिट्ठी कलकत्ते भेजी थी, उस अतीत की स्वप्नमय
कहानी प्रकाशित करते हुए छाती मे कैसे-कैसे स्पन्दन अनुभव होते हैं ! उन्होने
लिखा था—
“चित्तप्रिय और दादा (भैया) चले गए, हम भी जाते है । आशा है आप लोग
पहले की तरह काम चलाएँगे । भगवान् आप लोगो को सफलता दान करेंगे ।
आज हमारे जीवन की विजयदशमी है । अलविदा ! अलविदा ! जो चले गए
उन्हें लौटा लाने का कोई उपाय नही । किन्तु ज्योतिष की मुक्ति के लिए क्या
करना चाहिए, यह उनके स्वदेशवासी ही निश्चय कर सकेंगे ।”
इस चिट्ठी के प्रसंग से एक और चिट्ठी की बात याद आ गई । जैन-
धर्मावलम्बी होते हुए भी उन्होने कर्त्तव्य की खातिर देश के मगल के लिए सशस्त्र
विप्लव का मार्ग पकड़ा था । 'निमेज'² के खून के अपराध में वे भी जब फांसी की
कोठरी में क़ैद थे, तब उन्होने भी जीवन-मरण के वैसे ही सन्धिस्थल में अपने
विप्लव के साथियों के पास जो पत्र भेजा था, उसका सार कुछ ऐसा था, “भाई,
मरने से डरे नहीं और जीवन की भी कोई साध नही है; भगवान् जब जहां जैसी
अवस्था में रखेंगे, वैसी ही अवस्था में सन्तुष्ट रहेंगे ।” इन दो युवकों में से एक का
- पीछे फ़ारवर्ड में छपा था कि ज्योतिषचन्द्रपाल बहरामपुर के पागलखाने मे स्वर्गवासी हो
गए । - निमेज के महन्त का वध सन् 1913 में हुआ था । रोलट कमेटी की रिपोर्ट के बिहार-
उड़ीसा प्रकरण (आठवे अध्याय) मे उसका उल्लेख है ।
170 / बन्दी जीवन
नाम था मोतीचन्द और दूसरे का नाम था माणिकचन्द या जयचन्द ।
इन सब विप्लवियों के मत के तार ऐसे ऊँचे सुर में बँधे थे, जो प्रायः साधु
और फ़क़ीरों के बीच ही पाया जाता है। इन सब विप्लवियों के जो प्रतिपक्षी थे,
वे अंग्रेज भी अनेक बार दिल खोलकर इनकी प्रशंसा किए बिना नही रह सके।
उस जमाने के खुफ़िया विभाग के सर्वेसर्वा, आजकल कलकत्ता के पुलिस-कमिश्नर
मि० टेगार्ट ने, सुनते हैं, परलोक गत प्रतिष्ठित बैरिस्टर मि० जे० एन० राय को
यतीन्द्रनाथ के सम्बन्ध में कहा था, “Though I had to do my duties I
have great admiration for him. He was the only Bengali who
died in an open fight from a trench.” (यद्यपि मुझे अपना कर्त्तव्य
पालना पड़ा, पर मेरे दिल में उसके लिए बड़ा आदर है। वह एकमात्र बंगाली
था जो एक खुली लड़ाई में खन्दक से लड़ता हुआ मारा गया)।” किन्तु टेगार्ट
साहब ने जिस समय यह बात कही थी उसके बाद और भी अनेक बंगाली ऐसी
ही खुली लड़ाई में काम आए, उनका भी थोड़ा-सा परिचय पाठको को देता
हूँ ।
9 सितम्बर सन् 1915 को यतीन बाबू और उनके साथियों ने खुली लड़ाई
में प्राण दिए। किन्तु उसके बाद भी प्रायः 1918 तक विप्लवियों के अस्तित्व का
परिचय विशेष रूप से मिलता रहा। सन् 1916 के अन्तिम भाग में खुफिया
विभाग के डिप्टी सुपरिण्टेण्डेण्ट बसन्तकुमार चट्टोपाध्याय पर, जो इससे पहले दो
बार आश्चर्यमय तरीकों से बच गए थे, तीसरी बार विप्लवियों ने हाथ साफ़
किया। सन् 1917 में गोहाटी में विप्लवियों के साथ पुलिस का खंड-युद्ध
(skirmish) हुआ, और सन् 1918 में ढाका में फिर पुलिस के साथ विप्लवियों
का सशस्त्र मुकाबला हुआ, जिसमें विप्लवियों के दो व्यक्ति खेत रहे। पाबना मे
भी एक छोटी-मोटी मुठभेड़ हुई, इस सबके अलावा खून-डकैती तो जारी ही थी।
इन सब सशस्त्र मुठभेड़ों का थोड़ा-बहुत परिचय यहाँ देते हैं। सम्भवतः सन् 1916
में विप्लव दल की ओर से बिहार में विप्लववाद का प्रचार करने को वीरभूम के
नलिनी वाक्चि भागलपुर के कालेज में पढ़ने भेजे गए। कुछ ही दिन में इस
बंगाली पर पुलिस की नज़र पड़ गई। नलिनी पढ़ना छोड़कर फ़रार हो गए।
नलिनी छात्रवृत्ति पाने वाले अच्छे विद्यार्थी थे, पर छात्रवृत्ति के झंझट में कौन
पड़े ? नलिनी एकदम खालिस बिहारी बनकर बिहार के शहर-शहर में घूमने
लगे। कुछ दिन बाद फिर पुलिस की नज़र में पड़े। नलिनी बंगाल आए तब था
सन् 1917, बंगाल का उस समय बुरा हाल और टेढ़े दिन थे—चारों ओर थी घर-
पकड़, खाना-तलाशी, इण्टर्नमेण्ट (नज़रबन्दी), डिपोर्टेशन (देशनिकाला) और
गोलियों की बौछार ! इसी से बंगाल में रहना तब बेखटके न था। विप्लव दल में
तब यह फैसला हुआ कि दल के अच्छे-अच्छे कार्यकर्त्ताओं को आसाम के किसी
अच्छे स्थान में रिज़र्व फोर्स (सुरक्षित सेना) के रूप में रखा जाए। फलतः नलिनी
वाक्चि, नलिनी घोष, नरेन बैनर्जी और अन्य अनेक लोगों ने गोहाटी (आसाम)
परिणाम / 171
में आकर आश्रय लिया । सोते समय उनके बिछौने के तले भरी रिवाल्वरें रहतीं
और उन्हीं में से एक-एक आदमी दो-दो घंटे के लिए पहरेदार के रूप में खिड़की
के नजदीक सावधानी से बैठा रहता। कलकत्ते की पुलिस ने किसी गिरफ्तार
विप्लववादी के पास से गोहाटी का संवाद पाकर, 9 जनवरी सन् 1917 को यह
मकान घेर लिया। पहरेदार ने पुलिस को आते देख सबको जगा दिया, पर
चुपचाप ही। रिवाल्वर और पिस्तोल हाथ में लेकर सभी बाहर आकर पुलिस
पर गोलियां दागने लगे। इस एकाएक आक्रमण से पुलिस छिन्न-भिन्न हो गई,
और इसी बीच विप्लवी भी पहाड़ की ओर खिसक गए, किन्तु तीसरे पहर
अनगिनत सशस्त्र पुलिस ने आकर सारी पहाड़ी के आस-पास घेरा डाल दिया।
दोनों ओर से गोली चली। बहुत-से घायल होकर पकड़े गए। इनमें से केवल दो
जन पुलिस की आँख बचाकर भाग सके। इन दो में से एक यही नलिनी थे। छः
दिन रास्ता चलकर पहाड़ पार होकर नलिनी लामडिंग स्टेशन पर आ पहुँचे ।
वह यात्रा क्या सीधी बात थी ? बगैर खाये और सोये प्रतिदिन चढ़ाई-उतराई पर
गोड़े तोड़ने पड़े थे। सदा पुलिस की नज़र से अपने को बचाते हुए, कभी वृक्ष पर
चढ़कर, कभी पहाड़ की चोटी पर--किसी चट्टान पर सोकर रात कटती थी।
बराबर तेज चाल से पहाड़ की चढ़ाई-उतराई में चलते-चलते हाथ-पैर की तलियों
मे दरारें पड़ गईं। फिर क्या केवल चलने का ही कष्ट था ? पहाड़ की एक किस्म
की चिपचिपी चिचड़ी नलिनी के माथे और पीठ में चिपट गई, अनेक तरह से
खींचने-छुटाने से भी वह नहीं छूटी। इस चिचड़ी का विष चढ़ जाने की पीड़ा से
जर्जरित होकर नलिनी एकदम बेहाल हो गए। अस्तु, मौत के साथ लड़ाई लड़कर
आसाम की पुलिस के हाथ से बचकर नलिनी बिहार आए; किन्तु वहाँ रहना
निरापद न था। यह देख वे फिर बंगाल चले आए। हावड़ा स्टेशन पर उतरकर
जिनके मिलने की आशा की थी उनमें से किसी को न देख पाया। संग में एक
रिवाल्वर था। कहाँ जाएँ ? पखवाड़े से अधिक हो चुका था जब से न खाना, न
सोना, न कोई और नियम रहा था, शरीर टूट चुका था, जहरीला कीड़ा तब भी
माथे और देह में चिपटा हुआ था, हावड़ा में ही नलिनी को तेज़ बुखार हो गया।
लाचार कोई उपाय न देखकर वे किले के मैदान के एक पेड़ के नीचे सो गए। मुर्दे
की तरह दिन-रात वही पड़े रहे। परले दिन दैवयोग से उनके एक परिचित
विप्लवी ने उन्हें देख लिया। उनके सब अंगों में उस समय चेचक के चिह्न दिखाई
दिए। कलकत्ते में विप्लवियों की अवस्था उस समय अत्यन्त शोचनीय थी, प्रायः
सभी विप्लवी पकड़े जा चुके थे। टका-पैसा तब किसी के हाथ में न था, दो-चार
जन जो बाकी थे वे भी तब क्षीण आशा के साथ इधर-उधर घूमते फिरते थे।
कलकत्ते की एक छोटी-सी कोठरी में उन्हें रखा गया। चेचक से उनकी आँखें
और मुँह ढक गए, जिह्वा अचल हो गई थी। तीन दिन तक बात करना भी बन्द
रहा। इस प्रकार पैसा पास न होने से चिकित्सा कराए बिना दिन काटते रहे। इस
मकान में उस समय केवल एक और विप्लववादी अपने-आपको छिपाये हुए थे।
172 / बन्दी जीवन
मृत देह की यथोचित क्रिया करने को भी लोग कैसे जुटेंगे, यह समझ में न आता
था। सन् 1918 में विप्लवियों की अवस्था ऐसी ही शोचनीय हो गई थी। किन्तु
नलिनी इस बेवक से भी मरे नहीं। मृत्यु और भी महनीय रूप में दिखाई देने के
लिए उस समय तक ढाका में प्रतीक्षा कर रही थी। चंगे होकर नलिनी बुझते
विप्लव दीप का भार लेकर फिर ढाका में आ रहे। नलिनी और तारिणी मजूमदार
एक ही मकान में रहते थे। सन् 1918 की 15 जून को भोर के समय पुलिस ने
फिर नलिनी का मकान घेर लिया। फिर दोनों ओर से गोली चली। तारिणी के
अंगों में बहुत गोलियां लगने से वे वहीं मरकर गिर पड़े। नलिनी ने गोली खाकर
भी भागने की चेष्टा की, परन्तु फिर बन्दूक की गोली से घायल होकर उनका
शरीर भी जमीन पर लोटने लगा।
विप्लववादी नलिनी घायल अवस्था में अस्पताल में लेटाये हुए हैं—पुलिस
नाम-धाम लेने में व्यग्र है,—डाइंग-डिक्लेरेशन—मरते समय का इजहार, मांगती
है।
मृत्यु-शय्या पर लेटे हुए घायल विप्लववादी असह्य यन्त्रणा सहते हुए मृत्यु
की प्रतीक्षा में हैं। ऐसे समय साधारण व्यक्ति अपने को छिपा नहीं सकता, वरन्
इच्छा होती है कि उसके कार्यों को देशवासी भली भांति जान जाएँ। जिनके
लिए वह मरता है वे जान जाएँ कि किस प्रकार वह दूसरों के लिए प्राण दे गया,
साधारण मनुष्य की यही इच्छा होती है। किन्तु विप्लववादियों की अपने को
छिपाने की शैली साधारण नहीं होती। शिक्षा और साधना के बिना आत्मगोपन
का वैसा सामर्थ्य आता ही नहीं। मृत्यु के समय भी इच्छा नहीं है, कोई उन्हें
जान जाए, या कोई उनका 'मूल्य' समझ ले—कोई मैसेज (सन्देश) नही है¹—
'Unwept, unhonoured, unsung' ही वह जाना चाहता है! वह नहीं चाहता
कोई उस पर आंसू बहाये, कोई उसका नाम याद करे, कोई भी उसका गीत
गाए! —इसलिए मृत्यु-शय्या पर पड़े विप्लववादी के क्षीण कण्ठ से उत्तर
निकला, 'Don't disturb please, let me die peacefully', 'तंग न करो
भाई, मुझे शान्ति से मरने दो।'
पुलिस ने अनेक प्रकार से बात निकालने की चेष्टा की—कहा नाम तो
बताओ—घर कहाँ है? किन्तु उसका वह एक ही उत्तर था, "don't disturb
please, let me die peacefully—कृपा कर और तंग न करो भाई, शान्ति से
मरने दो।"
इस प्रकार जो मृत्यु को महिमामय बना सकते थे, इस प्रकार जिन्होंने आत्म-
गोपन करना सीखा था, उनकी कहानी पर देशवासियों ने क्या कभी गौर करके
- इस प्रसंग में असहयोग के दिन की याद आ जाती है, जब प्रत्येक छोटे-बड़े नेता चार दिन
की हवालात होने पर भी कॉलमों लम्बे 'मैसेज' अखबारों में भेजना अपना पहला कर्त्तव्य
समझते थे।
देखा है ? वे लोग जीवन की सब आशा-प्रतीक्षा अपूर्ण रखकर संसार से एकदम
निश्चिन्त हो गए हैं। प्रतिष्ठा की रत्ती-भर भी कामना उन्होंने नहीं रखी। मृत्यु
के दरवाजे पर पहुँचकर, जहाँ कोई बात खुल जाने का डर नहीं, वहाँ भी ख्याति
का निषेध करके वे शान्ति से मरते हैं। वे अपने कर्म से यदि किसी को तृप्त करना
चाहते हैं तो अपने ही अन्तरारमा को, इसीलिए किसी और से कुछ भी अपेक्षा न
रखकर शान्ति से मरना चाहते हैं। संसार की किसी चीज की भी चाह नहीं है, वे
केवल देने के ही धनी हैं।
इन सब विप्लवियों को न जाने क्या कहकर पुकारना चाहिए ? शायद ये
पागल थे, या शायद ये भ्रान्त निर्बोध बालक थे, क्योंकि हमारे इस अभागे देश के
अभिज्ञ नेता और राजनीति-विशारद विचक्षण पंडित इन्हें इन्हीं शब्दों से पुकारते
रहे हैं।
इन विप्लवियों का सबसे बड़ा दोष, जान पड़ता है, यही था कि ये अपने
उद्देश्य-साधन में कृतकार्य नही हो सके। मास के बाद मास और बरस के बाद
बरस विप्लव के लिए अनथक परिश्रम करने के बाद भी ये केवल एक बड़ी व्यर्थता
का ही उपार्जन कर सके ? जिस पथ का अन्तिम परिणाम केवल व्यर्थता हो वह
पथ क्या भ्रान्त नही है ? इस व्यर्थता का कुछ भी मूल्य है ? भारत के अभिज्ञ
नेता और विचक्षण समालोचक विप्लवियों से ऐसे ही प्रश्न प्रायः करते रहे
हैं।
व्यर्थता के एक ही पहलू पर हमारा ध्यान जाता है; किन्तु इस व्यर्थता की
आड़ में जगत् की श्रेष्ठ सम्पद् किस प्रकार अपने को छिपाए रहती है, विफलताओं
के द्वारा किस प्रकार शक्ति का संचार होते-होते एक दिन इस व्यर्थता के बीच
सार्थकता आकर दर्शन देती है, विफलता और पराजय के निराशा-वेदना पूर्ण
अवसाद के समय में इन सब बातों को हम में से बहुत-से हृदयंगम नही कर पाते।
सभी समाजों में, सभी समयों मे विप्लवी लोगों पर समाज के विज्ञ और अभिज्ञ
लोग हँसते और लांछन लगाते रहे हैं। इसका कारण यही है कि प्रायः सभी देशों
के सभी विप्लवियों की पहली चेष्टाएं व्यर्थ हुई हैं, और समाज के विज्ञ और
अभिज्ञ लोग इसी व्यर्थता के माप से ही सब विषयों पर विचार करते रहे हैं। उसी
नियम से भारत के विप्लववादी भी विज्ञ और अभिज्ञ लोगों के मत में भ्रान्त-पथ
के यात्री हैं। और इन समालोचकों में से जो बड़े ही प्रवीण और होशियार हैं वे
इन विप्लवियों को 'ईडियट' (बुद्धू, पागल) कहने में भी संकोच नही करते।
भारत की लब्धप्रतिष्ठ मासिक पत्रिका 'मॉडर्न रिव्यू' के विचक्षण सम्पादक ने
विप्लवियों को निर्देश करके कहा था कि 'यदि भारत में कुछ भी लोग सशस्त्र
विप्लववादी हैं तो भारतवासियों को निश्चय से अपनी बुद्धि-विवेचना पर सन्देह
करना होगा।'
विप्लवियो और समालोचको मे भेद यही है कि विप्लवी लोगों की अपने
आदर्श पर अटूट श्रद्धा है, इसीलिए उन्होने अद्भुत निष्ठा के साथ अपने आदर्श
बनारस षड्यन्त्र अभियोग, आजीवन कारावास एवं कालापानी (अण्डमान) प्रस्थान
174 / बन्दी जीवन
की ओर जानेवाले पथ पर चलते हुए जीवन बिताया है, और इन समालोचक
लोगों ने आराम-चौकी पर बैठकर समालोचना करने को ही जीवन का पेशा बना
डाला है और बहुतों का तो यह समालोचना करना ही जीविका अर्जन करने
का मुख्य अवलम्ब हो गया है। जीविका कमाने के लिए अनेक बातों का हिसाब
करके चलना होता है, किन्तु इस प्रकार हिसाब करके चलने से हमेशा सत्य की
मर्यादा को अटूट रखना शायद सम्भव नहीं होता। इस सबके अलावा विप्लवियों
में और इन सारे समालोचकों में एक और भी बड़ा भेद है, विप्लवियों के नजदीक
जो चीज़ 'Faith' (श्रद्धा) है; समालोचकों के लिए वह केवल 'Opinion
(सम्मति) है। यह 'सम्मति' प्रायः सफलता का मोह पार नहीं कर सकती; इसी-
लिए फलाफल पर निर्भर होकर ही बहुधा 'सम्मति' बनती है। किन्तु जो लोग
इतिहास-स्रष्टा के आसन पर बैठते हैं वे इस 'सम्मति' की परवाह नही करते;
वे निष्ठावान् और श्रद्धा-सम्पन्न व्यक्ति होते हैं। विफलता उन्हें श्रद्धा-भ्रष्ट
नही कर पाती। इसी कारण इतिहास मे वे चिरस्मरणीय हो जाते हैं; इसी से
ये श्रद्धा-सम्पन्न व्यक्ति ही जगत् में कुछ स्थायी काम कर जाने मे समर्थ होते
हैं।
भारत के विप्लववादी भी ऐसे ही श्रद्धा-सम्पन्न व्यक्ति थे। भारत के इन
विप्लवियों की ओर निर्देश करके ही प्रसिद्ध कानून-वेत्ता बैरिस्टर नार्टन साहब
ने एक बार कहा था, "ये सब विप्लवी अपने अभीष्ट साधन मे कृतकार्य नही हो
पाते, इसी कारण आज वे सरकार के अपराधी हैं, किन्तु यदि ये अपने उद्देश्य को
सफल कर सकते तो फिर यही संसार मे स्वदेश-भक्त, वीर तथा साधक कहकर
पूजे जाते।"
भारतीय विप्लवियों ने जो मार्ग ग्रहण किया था उस मार्ग से ही भारत की
मुक्ति होगी कि नहीं, कौन कह सकता है ! शायद उन्होंने उल्टा ही रास्ता ग्रहण
किया हो; किन्तु उनके साथ हमारा मत नही मिलता, इसी कारण तो उन्हें
'ईडियट' (बुद्धू) कहना उचित नहीं है। न जाने संसार के सभ्य लोगों में भारत-
वासियों के मान-इज्जत की इन विप्लवियों के द्वारा अधिक रक्षा हुई है अथवा
इनके विरोधी समालोचकों की युक्तियों के ज़ोर पर ! तो भी यह बात तो हम
जानते हैं कि गत साठ बरसों तक जब रूसी विप्लववादियों के सभी प्रयास निष्फल
हुए थे, जब प्रबल प्रतापी आस्ट्रिया की राजशक्ति के विरुद्ध इटली के मुट्ठी-भर
विप्लववादियों ने पहले-पहल सिर उठाया था, तब इन देशों के विप्लववादियों को भी
ऐसे ही व्यंग्य और गालियां सहनी पड़ती थीं। साठ बरस के अनथक परिश्रम के बाद,
अनेक बाधाओं और व्यर्थताओं में से गुज़रकर सारे जगत् की उपेक्षा और प्रति-
कूलता को सहकर आज रूसी विप्लववादियों की आशा सफल होने जा रही है।
प्रायः चालीस बरस की कशमकश के बाद, कितने त्याग, कितने कष्ट और कितनी
अशान्तियों को लांघकर इटली ने स्वाधीनता पाई थी। किन्तु जो इस मुक्ति-पथ
के प्रथम यात्री थे उन्हें उनकी पहली विप्लव चेष्टाओं के व्यर्थ होने के दिन
परिणाम / 175
कितनी निन्दाएँ सहन न करनी पड़ी थीं ! इस प्रसंग में आइरिश वीर टी०
मेक्सिवनी की चिरस्मरणीय बात याद आती है—“Any man who tells you
that an act of armed resistance---even if offered by ten men
only — even if offered by men armed with stones — any men
who tell you that such an act of resistance is premature, impr-
udent, or dangerous, any and every such man should be
atonce spurned and spat at, for remark you this and recoll-
ect that somewher and somehow and by somebody a beginn-
ing must be made and that the first act of resistance is always
and must be ever premature, imprudent and dangerous.” अर्थात्
“कोई आदमी जो तुम्हें यह कहे कि एक सशस्त्र मुकाबला—चाहे दस आदमी ही
ऐसा मुकाबला करें—चाहे उन आदमियों के पास पत्थरों के सिवाय और कोई
हथियार न हो—कोई आदमी जो तुम्हें कहे कि ऐसा मुकाबला अपरिपक्व है,
अक्लमन्दी का काम नहीं है या खतरनाक है; प्रत्येक ऐसा आदमी लात खाने
लायक और मुंह पर थूका जाने लायक है। क्योंकि यह बात समझ लो और याद
रखो कि कहीं-न-कहीं, किसी-न-किसी तरह और किसी-न-किसी को मुकाबले का
आरम्भ करना होगा और मुकाबले का पहला काम हमेशा अपरिपक्व और
खतरनाक होता है और होना ही चाहिए।”
मैंने अपनी शक्ति के अनुसार इन विप्लवियों का एक संक्षिप्त क्रमबद्ध
इतिहास लिखने की चेष्टा की है। किन्तु इतिहास का प्राणहोता है—जजमेण्ट—
निर्णय। इस जजमेण्ट (निर्णय) के बिना इतिहास खाली घटना-पंजिका (chr-
onicle of events) रह जाता है। इसी से मैं वक़्त-ब-वक़्त घटनाएं छोड़कर
और अनेक बातों को भी ले आया हूँ और विप्लवियों की मैंने प्रशंसा की है, इससे
कोई यह न समझे कि मैं विप्लववाद का प्रचार करता हूँ। मैं कहना चाहता हूँ कि
उनके साथ हमारा मतभेद रहने पर भी उनके चरित्र-बल को हम अस्वीकार
नहीं कर सकते। किन्ही के साथ मतभेद रहने से ही उनसे घृणा करना या उनको
गाली-गलोज करना तो अभीष्ट नहीं है, और विप्लवियों के विरोधी अंग्रेज़ राज्या-
धिकारियों ने भी इनके चरित्र की भरपूर प्रशंसा की है, इससे वे (अंग्रेज़) भी
सचमुच विप्लववादी नहीं हो गए।
इतिहास लिखने बैठा हूँ, इसी से भारतीय विप्लवियों को भारतवासी
किस दृष्टि से देखते थे, क्यों इस दृष्टि से देखते थे, और उन्हें किस दृष्टि से
देखना उचित है? इन सब विषयों की भी आलोचना कर गया हूँ। विप्लवियों
ने सचमुच पागलपन किया था कि नहीं, यह नहीं जानता हूँ, तो भी उनके
पागलपन की बात सुनकर रवि बाबू की एक कविता के कुछ पद याद आते
हैं—
176 / बन्दी जीवन
“कोन आलोते प्रानेर प्रदीप
ज्वालिए तुमि धराय आस¹
साधक ओगो प्रेमिक ओगो
पागल ओगो धराय आस।”
“हे साधक, हे प्रेमिक, हे पागल, तुम इस भूमि पर आते हो—किस ज्योति
से प्राणों के प्रदीप को जलाकर तुम इस भूमि पर आते हो !’”²
- उच्चारण—आसो।
- इस अध्याय के कुछ अंश नलिनी बाबू के ‘विप्लववाद’, ‘आत्मशक्ति’ में प्रकाशित,
गोपेन्द्रलाल राय के एक लेख और ‘शंख’ मे प्रकाशित ‘नलिनी वाक्चि’ की कहानी से
लिए गए है। —लेखक
7
विप्लव का प्रयास व्यर्थ क्यों हुश्रा ?
भारतीय विप्लवियों के सभी प्रयास क्यो व्यर्थ हुए। यह जानने के लिए
पहले यह समझ लेना होगा कि वे चाहते क्या थे ? उनका उद्देश्य भली भाँति
समझे बिना यह जानना भी कठिन होगा कि वे कहाँ तक विफल हुए कहाँ तक
नही, और उनकी इस विफलता का कारण क्या था । इसीलिए उनकी इस
व्यर्थता का कारण खोजने से पहले उनका उद्देश्य क्या था इस विषय की कुछ
आलोचना करना आवश्यक है ।
भारतीय विप्लववादियो का उद्देश्य क्या था, इस विषय पर कहने को इतनी
बातें हैं कि यहाँ पर उनकी पूरी आलोचना सम्भव नही है, कारण कि यह आलो-
चना करने के लिए भारत के राष्ट्रक्षेत्र मे इस विप्लव के आविर्भाव से आरम्भ
कर उनकी क्रमिक परिणति के इतिहास की भी आलोचना करना आवश्यक हो
जाता है, और इस प्रकार यह आलोचना इतनी बड़ी हो जाएगी कि हम आलोच्य
विषय से बहुत दूर जा पड़ेंगे । इसीलिए इन सब आलोचनाओं को किसी और
समय करने की इच्छा है। इस समय केवल अपना विषय समझाने के लिए जितनी
आलोचना आवश्यक प्रतीत होती है, उतनी ही करूँगा।
भारतीय विप्लव दल के बीच चाहे कितने ही मतभेद क्यो न रहे हों, परन्तु
इस विषय मे सभी सम्पूर्णतः एकमत थे कि भारत को अक्षुण्ण स्वाधीनता प्राप्त
करनी ही होगी, अर्थात् भारत-भिन्न कोई भी जाति भारत के भले-बुरे की
विचारकर्त्ता होकर भारत के मगल के लिए भारत के किसी भी काम मे हस्तक्षेप
न कर सके—भारत के लिए किस प्रकार की शासन-प्रणाली सबसे अधिक मंगल-
कारी होगी इस विषय के विचारकर्त्ता और परिचालक भारतवासी ही हों ।
भारत का सामाजिक आदर्श क्या होगा, भारत मे सामाजिक समस्या का समाधान
किस प्रकार करना सबसे अधिक मगलजनक होगा, भारतेतर राष्ट्रों के साथ
भारत किस प्रकार का सम्बन्ध-सूत्र स्थापित करेगा, भारत के व्यवसाय-वाणिज्य
को किस प्रकार परिचालित करने से भारत का और जगत् का मगल होगा, इन
सब बातो को भारतवासी ही जैसा ठीक समझें वैसा ही हो, और किसी भी
178 / बन्दी जीवन
राष्ट्र का उसमें कोई हाथ न रहे—यही थी भारतीय विप्लवियों की दुराकांक्षा !
भारत की यह स्वाधीनता ब्रिटिश साम्राज्य के बीच रहकर किसी तरह भी
अक्षुण्ण नहीं रह सकती, बालक जिस प्रकार निःसंशय रूप से अपने माता-पिता
को पहचानता है, भारत के विप्लवी भी यह बात उसी प्रकार निःसंशय रूप से
जानते थे। इसी से भारतीय विप्लवियों की सब चेष्टाओं की जड़ में यह बात थी
कि भारत को इस प्रकार शक्ति सामर्थ्य-सम्पन्न कर दिया जाय जिससे वह
भारत-भिन्न सभी जातियों के हाथ से सब प्रकार से छुटकारा पा सके। इस
भारतेतर राष्ट्रों के समूह में अंग्रेज़ अपवाद नहीं हैं, वरन् साक्षात् रूप से इन
अंग्रेजों के साथ ही पहला संघर्ष आरम्भ होता है। कारण कि अंग्रेजों का ही
साक्षात् रूप से भारत की सब अभिलाषा-आकांक्षाओं और भारत के सब उद्यमों
के साथ घनिष्ठ रूप से संसर्ग है और वे लोग यह समझते थे कि भारत को इस
प्रकार स्वाधीन करने का सबसे मुख्य उपाय है, भारत की क्षात्र शक्ति को
जागृत कर देना—इस क्षात्र शक्ति के आदर्श को ही केन्द्र बनाकर हमारे विप्ल-
वियों ने अपनी सर्व कर्म-प्रचेष्टा को नियन्त्रित किया था। महात्मा गांधी का
भारत के राष्ट्र-क्षेत्र में आविर्भाव होने से बहुत पहले से ही हमारे विप्लवियों
को इस क्षात्र आदर्श और ब्राह्मण्य आदर्श के विषय में बहुत आलोचनाएँ और द्वंद्व
करने पड़े हैं। उन दार्शनिक आदर्शों का विचार और विश्लेषण करने की जगह
यहाँ नहीं है, समय और सुयोग मिलने पर किसी और जगह वह करने की
इच्छा है। तो भी, संक्षेप से यहाँ इस सम्बन्ध में केवल दो-चार बातें कह देना
बुरा न होगा। यथार्थ बात तो यह है कि ब्राह्मण्य आदर्श और क्षात्र आदर्श
में, सच-मच कहें तो, कोई भेद नहीं है, क्योंकि ब्राह्मण्य आदर्श की अंतिम
परिणति जहाँ होती है, क्षात्र आदर्श की भी अन्तिम परिणति ठीक वही होती
है। अर्थात् क्षत्रिय धर्मावलम्बी पुरुष जब प्रकृति-ज्ञान का अवलम्बन करके जीवन
को नियन्त्रित करते हैं तब उसका जो फल होता है, ब्राह्मण भावापन्न पुरुष भी
वैसे ही प्रकृति ज्ञान का अवलम्बन लेकर जीवन बिताएँ, तो उसका भी वही एक
ही फल होता है। अर्थात् यह जगत् ब्रह्म का ही प्रकाश है, और ब्रह्म ही कभी
सगुण और कभी निर्गुण रूप में अपना प्रकाश करते हैं, यह विश्व ब्रह्माण्ड जो नित्य
नये-नये रूपों में परिवर्तित होता है वह भी उसी ब्रह्म का ही सगुण प्रकाश है,
और जो अनिर्वचनीय है, जो मुंह से प्रकट नहीं किया जाता, जहाँ जाकर मन-बुद्धि
धक्का खाकर प्रवेश करने में असमर्थ होकर वापस लौट आते हैं, जिसे किसी भी
विशेषण से विशेषित नहीं किया जा सकता, अर्थात् जो ब्रह्म का ही निर्गुण स्वरूप
है—उस निर्गुण और सगुण ब्रह्म में यथार्थ में कोई भेद नहीं है, उस ज्ञान की
उपलब्धि करना ही ब्राह्मण्य और क्षात्र आदर्श का अन्तिम लक्ष्य रहा है। वेदान्त
के इस आदर्श का अनुसरण करें तो ब्राह्मण्य और क्षात्र धर्म में सचमुच कोई भेद
नहीं रहता, किन्तु वेदान्त के इस धर्म को सब लोग स्वीकार नहीं करते; भारत
के सब सम्प्रदाय यह बात नहीं मानते कि ब्रह्म का सगुण स्वरूप सम्भव है। वे
विप्लव का प्रयास व्यर्थ क्यों हुआ ? / 179.
कहते है, गुणातीत ब्रह्म का रूप-भेद सम्भव नही है, ब्रह्म ही एकमात्र वस्तु है,
और सभी अनित्य है, ब्रह्म के सिवाय और किसी वस्तु का यथार्थ रूप मे कोई
अस्तित्व नही है—आपातत. उनका होना प्रतीत होता है, पर वह भ्रममात्र है,
यही ब्रह्म माया है । यह माया कहाँ से आई और इस माया का स्वरूप क्या है ?
इस सम्बन्ध मे वे कहते है कि वह कहा नही जाता, वह अनिर्वचनीय है,—इसी से
वे ससार को भी अनित्य कहते है और इसी से उनके जीवन का श्रेष्ठ आदर्श रहा
है इस संसार को त्यागकर, ससार के रास्ते से दूर जाकर निर्जन मे, वन मे,
पर्वत मे, गुफा मे रहकर अर्थात् सन्यास लेकर तपस्या करना, भगवान् की
आराधना करना । ब्राह्मणो द्वारा परिचालित हिन्दू समाज का यही सनातन और
सर्वश्रेष्ठ आदर्श रहा है यह बहुतो की धारणा है, इस आदर्श को ही जो मानव-
समाज के सम्मुख श्रेष्ठ आसन पर प्रतिष्ठित करना चाहते है, वे ब्राह्मण्य धर्म के
पक्षपाती है, इसी आदर्श का मैने ब्राह्मण्य धर्म कहकर उल्लेख किया है। और
क्षात्र धर्म कहने से मेरा प्रयोजन उस आदर्श से है, जिस आदर्श मे इस नित्य नूतन
परिवर्तनशील जीव-जगत् को मिथ्या माया कहकर उड़ा नही दिया जाता, जिस
आदर्श मे इस जीव-जगत् को इस ससार को निर्गुण ब्रह्म से अभिन्न समझा जाता
है, जिस आदर्श की प्राप्ति के लिए इस ससार की अवहेलना न करके, इसका
त्याग न करके, इस ससार के भले-बुरे को, इष्ट-अनिष्ट को, हिंसा-अहिंसा को,
राग-द्वेष को समतुल्य समझकर इस भीषण सग्रामस्थल मे रहकर ही ब्रह्म ही
जीव-जगत् हुए है और इस जीव-जगत् मे जो कुछ भला या बुरा है वह सभी ब्रह्म
का ही स्वरूप है, इस सत्य की उपलब्धि करने के लिए सासारिक कर्म मे लिप्त
रहकर ही अर्थात् सासारिक कर्म के साथ ज्ञानयोग को युक्त करके, कर्मयोग के
पथ मे जो साधन करना होता है, उसको ही मै क्षात्र धर्म कहकर पुकारता हूँ ।
इन दोनो आदर्शों मे सचमुच तीव्र द्वंद्व रहा है। एक का आदर्श है बुद्ध और दूसरे
का आदर्श वही कुरुक्षेत्र के श्रीकृष्ण, एक का आदर्श है श्री चैतन्य और दूसरे का
आदर्श गुरु गोविन्द । एक के आदर्श का अनुसरण करने पर इस ससार को अनित्य
माया-ज्ञान कहकर इसकी अवज्ञा और अवहेलना करनी होती है और दूसरे
के आदर्श की प्राप्ति करने के लिए इस ससार को नित्य नये-नये रूपो मे सजाकर
पूजना होता है, युग-युग मे सृष्टि की उद्दाम प्रेरणा से उस संसार को तोड-फोडकर,
चूर-चूरकर फिर नये सिरे से गढकर खडा करना होता है। कभी ज्ञान के आलोक
मे जगत को उद्भासित करके, कभी खड्ग की धार से रक्त का स्रोत बहाकर,
पृथ्वी को रंगकर, कभी प्रेम के प्रवाह मे धरित्री सुन्दरी को स्नान करा के,
संसार के सौन्दर्य को अद्भुत कारीगरी के साथ विविध आभाओ मे अनेक रंगों
मे रंगीन, स्निग्ध और उज्ज्वल करके विस्मयकर बना डालना होता है ।
आदर्शों का यह सब द्वंद्व केवल वाक्चातुरी अथवा भाषा का द्वंद्व ही न था,
इस दल मे जिन्होने जिस आदर्श को श्रेष्ठ समझा, उन्होने उसी आदर्श के पीछे
सारा जीवन व्यतीत किया; इस प्रकार कितनो ने ही घर-बार छोड़कर सन्यास
180 / बन्दी जीवन
का आश्रय लिया और अनेकों ने तिल-तिल करके पूर्ण रूप से अपने परिवारवालों
और राज्याधिकारियों द्वारा अनेक कष्ट भोगते हुए जीवन के भोग-विलास को
तुच्छ समझकर विपत्ति के बीच ही जीवन बिता दिया। जो भी हो, विप्लवियों
ने वर्तमान काल में छात्र आदर्श को ही श्रेष्ठ आसन दिया था। इसी से इस
छात्र आदर्श का ही वे भारत के जनसाधारण में प्रचार करने का प्रयास करते
रहे।
इस प्रकार से विप्लवी लोग भारत के गरीब-से-गरीब जनसाधारण तक को
ही समझते थे, किन्तु किस प्रकार ये गरीब-से-गरीब जनसाधारण तक अपनी
अभिलाषाएँ व्यक्त करेंगे और किस प्रकार सचमुच ही इन जनसाधारण की
अभिलाषाएँ अक्षुण्ण रह सकेंगी, देश के समाज में धनी और निर्धनों के बीच,
जमींदारों और उनकी रैयत के बीच, धनी व्यवसायपतियों और कुली-मज़दूरों के
बीच, देशी और विदेशी व्यवसायपतियों के बीच परस्पर जो अनेक स्वार्थों के
द्वंद्व उपस्थित हो गए हैं, और इन विरुद्ध स्वार्थों के संघर्ष के कारण जगत् में जो
अनेक प्रकार की अशान्ति, अनेक प्रकार के वैषम्य, अनेक अत्याचारों, यन्त्रणाओं
और अनेक भीषण रक्तपातों की सृष्टि हो रही है, इन सब द्वंद्वों को कैसे सुलझाना
होगा, और यथार्थ विप्लवी होने पर राष्ट्र के समान समाज को भी चूर-चूर कर
नये सिरे से गढ़ना होगा, ये सब बातें भारत के विप्लवी लोग भली भाँति हृदयंगम
नहीं कर पाए, और इन सब समस्याओं की ओर ध्यान देते हुए भारत के भावी
राष्ट्र को सच ही किसी विशेष रूप में गढ़ना होगा, यह बात भी उन्होंने गम्भीर
चिन्तन के साथ नहीं सोची थी। वे सोचते थे कि ये सब बातें स्वाधीनता पाने
के बाद देखी जाएँगी। तो भी अधिकांश विप्लवियों का यही मत था कि भारत
की राष्ट्र-शासन-पद्धति की नींव गणतन्त्र के आदर्श पर ही स्थापित होगी। इस
व्यापार में अधिकांश विप्लवी राजा के लिए कोई स्थान नहीं रखते थे। अधिकांश
इसलिए कहता हूँ कि इनमें ऐसे भी कुछ व्यक्ति थे जो सोचते थे कि यदि भारत
के कोई स्वाधीन कहलानेवाले राजा भारत के इस स्वाधीनता समर में प्राण और
मन से योग दें तो उन्हें भारत का राज्यासन दिया जा सकता है, और उस दशा
में भारत का राष्ट्र संगठन इंग्लैंड की पार्लियामेंट के अनुसार गठित होगा।
महाराष्ट्र में 'अभिनव भारत' नामक गुप्त समिति की ओर से, 'Choose oh
Indian Princes," (अर्थात् भारत के राजाओ, अपना रास्ता चुन लो) शीर्षक
की एक छोटी-सी पुस्तिका का गुप्त रूप से प्रचार किया गया था, उसमें बड़ौदा
के राजा गायकवाड़ का स्पष्ट रूप से उल्लेख करके ही उपर्युक्त भाव का प्रचार
किया गया था। पंजाब के सिखों में से अनेकों की इच्छा थी कि भारत में फिर
खालसा राज्य स्थापित किया जाय। फिर विप्लवियों में से अधिकांश हिन्दू ही
थे, इसलिए उनके बीच किसी-किसी के दिल में यह इच्छा गुप्त रूप से थी कि
भारत के स्वाधीन होने के माने हिन्दू राज्य की पुनः स्थापना के होंगे। किन्तु
क्रमशः यह भाव बिलकुल लुप्त हो जाता है, और अन्त में यद्यपि वे मुख्यतः
विप्लव का प्रयास व्यर्थ क्यों हुआ ? / 181
हिन्दुओं के स्वावलम्बन के ऊपर ही भरोसा करके अपने कार्य में आगे बढ़ते थे,
तो भी स्वाधीन भारत की कल्पना में भारत की किसी भी जाति को उन्होंने
दूसरी जाति के अधीन कर रखने का संकल्प नहीं रखा, अर्थात् भारत की
स्वाधीनता के लिए भले ही हिन्दू मुख्यतः परिश्रम करें तो भी स्वाधीन भारत
में प्रत्येक जाति का समान अधिकार रहेगा अर्थात् प्रत्येक जाति का स्वार्थ
अक्षुण्ण रहेगा, यही था भारतीय विप्लवियों का राजनैतिक आदर्श ।
हमारे देश के प्रायः सभी लोग एक सुर मे कहते रहे हैं कि भारत का
विप्लव-प्रयास बिलकुल ही व्यर्थ हुआ है, और इस प्रकार उसका व्यर्थ होना ही
अवश्यम्भावी था । वे कहते हैं, वर्तमान युग में नवीन वैज्ञानिक उन्नति के कारण
किसी भी राजशक्ति के विरुद्ध कोई प्रजा सामरिक शक्ति की सहायता से विप्लव
नहीं कर सकती, और वे सोचते हैं, कि अंग्रेजों के समान शत्रु को सामरिक
शक्ति की सहायता से हराकर स्वाधीनता पाने की कल्पना करना भी निरा
पागलपन है, इसी से वे भारत के विप्लवियों को पागल और अविवेकी अथवा
निर्बोध समझते थे और समझते हैं।—अवश्य ही, इन सब समालोचकों की बाते
यदि सत्य हैं तो भारत को चिरकाल तक पराधीन ही रहना है, कारण कि पूर्ण
स्वाधीनता पाने का और कोई रास्ता भी ये समालोचक लोग दिखा नहीं सके,
और इस आधुनिक युग में भी रूस और जर्मनी के विप्लव दलों ने प्रबल राज-
शक्ति को हरा दिया है, यह बात न मानने का भी तो कोई चारा नहीं है; इसी
से यह कहना, जान पड़ता है, युक्तिसंगत न होगा कि वर्तमान युग में कोई भी
प्रजा शक्ति सुप्रतिष्ठित राज शक्ति को विप्लव के रास्ते से सामरिक शक्ति की
सहायता से हरा नहीं सकेगी, और भारत के विप्लव दल के साथ रूस और
जर्मन के विप्लव दलों की तुलना करने से एक बात विशेष रूप से हमारे ध्यान
में आती है कि जर्मन और रूसी विप्लवियों को अपने ही लोगों के विरुद्ध अस्त्र
धारण करने पड़े थे, परन्तु किसी विदेशी राज शक्ति के साथ लड़ाई हो तो सारे
स्वदेशवासियों की सहानुभूति और सहायता पाने की यथेष्ठ संभावना रहती है।
इसी से विदेशी राज शक्ति के विरुद्ध विप्लव करना सिविल वार (गृह युद्ध)
करने की अपेक्षा अनेक अंशों में सहज है । तो भी यह बात तो सच है कि भारत
का विप्लव प्रयास व्यर्थ हुआ और रूसियों और जर्मनों के विप्लव प्रयास सफल
हुए हैं। यह बात सच भले ही है, किन्तु इस व्यर्थता के कारण के विषय में ही तो
अनेकों के साथ मेरा मतभेद है, और यहाँ मैं इस कारण का ही अनुसंधान कर
रहा हूँ। भारतीयों को सचमुच विप्लव के पथ में जाना चाहिए कि नहीं, इसकी
मैं कोई आलोचना नहीं कर रहा हूँ, यहाँ पर तो केवल अपने विरुद्ध पक्षवालो
की प्रधान युक्ति का ही विश्लेषण कर दिखाने की तनिक-सी चेष्टा की है। एक
बात पाठक मन में रखें कि मैं अतीत की बातों की आलोचना कर रहा हूँ और
अतीत की आलोचना करना ही इतिहास लिखते समय ठीक है, इसी से भविष्य
में क्या होगा अथवा क्या होना उचित है यह मेरा आलोच्य विषय नहीं है। अस्तु,
182 / बन्दी जीवन
जो भी हो, जो हम कह रहे थे उसी पर फिर आ जाएँ, हम कह रहे थे कि भार-
तोयों का विप्लव प्रयास व्यर्थ क्यों हुआ ?
अनेक लोग कहते हैं कि उपयुक्त समय नही आया था इसी कारण भारतीयों
का विप्लव प्रयास व्यर्थ हुआ, अर्थात् विप्लव प्रयास को सफल करने के लिए जो
परिस्थिति अपेक्षित है वह परिस्थिति भारत में अब भी नही है, भारत के जन-
साधारण सचमुच विप्लव करना नही चाहते, इसीलिए विप्लव का प्रयास व्यर्थ
हुआ । भारतवासी सचमुच स्वाधीनता नही चाहते, पराधीनता की ज्वाला को
सच ही अनुभव नही करते, इसी से वे विप्लव पथ में अग्रसर नही होते; बहुतों के
मत मे विप्लवियों के असफल होने का यही सर्व-प्रधान कारण है ।
किन्तु भारतवासी सच ही स्वाधीनता नही चाहते, पराधीनता की ज्वाला
का अनुभव नही करते, यह तो मैं नही मानता, किन्तु उस स्वाधीनता को पाने
के लिए जिस त्याग, जिस वीरता की आवश्यकता होती है, भारतवासियों में उन
सब गुणो का एकदम अभाव है, यह बात न मानने का भी तो कोई चारा नही
है । किन्तु जो लोग यह कहते है कि देश के अशिक्षित जन साधारण (Mass) ने
इस विप्लवान्दोलन मे योग नही दिया इसी कारण विप्लव का प्रयास व्यर्थ हुआ
उनकी बात भी मुझे ठीक नही मालूम होती—कारण कि विप्लवियों ने कभी
किसी भी दिन प्रकट या गुप्त रूप से देश के किसानो अथवा कुली-मजदूरों को
इस विप्लवान्दोलन मे भाग लेने के लिए पुकारा ही नही, देश के शिक्षित लोगो ने
जब जिस रूप मे जन-साधारण (Mass) को पुकारा है, जन-साधारण ने अनेक
त्याग करके भी बहुधा इस पुकार का उत्तर दिया है । देश के शिक्षित लोग अपने
कर्तव्य को समझ लेने पर भी जो काम नही कर सकते, देश के अशिक्षित जन-
साधारण अनेक बार अपनी सहज बुद्धि से वह काम अनायास ही कर डालते है ।
अवश्य अशिक्षित जनता कर्तव्य की खातिर बहुत दिन तक त्याग अथवा कष्ट
स्वीकार नही कर सकती, इसी से अशिक्षित जनता के खयाल पर निर्भर करके
कोई भी बडा या स्थायी कार्य करना सम्भव नही ।
ओर जो लोग यह कहते है कि देश के अधिकांश लोग अशिक्षित हैं, इसीलिए
भी विप्लव का प्रयास सार्थक नही होता, और जब तक देश के अधिकांश लोग
शिक्षित नही होते, तब तक विप्लव का प्रयास व्यर्थ होगा ही, इनसे मै रूस का
दृष्टान्त दिखाकर कह सकता हूँ कि विप्लव प्रयास की सार्थकता अथवा व्यर्थता
देश के लोगो के लिखना-पढ़ना जानने न जानने पर निर्भर नही करती ।
तो फिर भारत का विप्लव प्रयास व्यर्थ क्यों हुआ ? किन्तु सच ही क्या
भारतीय विप्लवियों का इतना त्याग, इतना अद्भुत साहस सब एकदम व्यर्थ ही
हुआ है ? इन्होंने कितने ही कष्ट सहे, कितनी ही विषम विपत्तियों के बीच ऐसी
निष्ठा के साथ अविचलित रहे, कितनी ही दुर्घटनाओं के तीव्र आघात, कितने ही
विश्वासघातकों के निर्दय व्यवहार और कितनी ही पराजयों की मर्मपीड़ा सहकर
ऐसी दुर्दमनीय दृढ़ता के साथ वे बार-बार अपने संकल्प की साधना में अग्रसर
विप्लव का प्रयास व्यर्थ क्यों हुआ ? / 183
रहे, यह सब क्या सच ही एकदम व्यर्थ हो गया ! क्षात्र शक्ति के आदर्श ने क्या
देश में कुछ भी प्रतिष्ठा नहीं पाई ? मरने का डर क्या भारतवासियों के मन से
कुछ भी दूर नही हुआ ? देश के अन्यान्य प्रकाश्य आन्दोलनों पर विप्लव आन्दोलन
क्या किसी तरह का भी प्रभाव नही डाल पाया ? वर्ल्ड पॉलिटिक्स (विश्व की
राजनीति) पर, संसार के सभ्य देशों में क्या भारत का यह विप्लवान्दोलन कुछ
भी छाया नही डाल सका ? अथवा इस विप्लवान्दोलन के कारण भारत का
गौरव जगत् की सभा में कुछ भी नही बढ़ा ? इस सम्बन्ध में हार्वर्ड विश्वविद्यालय
के प्रोफेसर ऐसर लिखित 'पैन-जर्मनिजम', बर्न हार्डी कृत 'जर्मनी एण्ड दि नेक्स्ट
वार' इत्यादि ग्रन्थों की ओर ध्यान देने का पाठकों से अनुरोध करता हूँ—इससे
वे मेरी बात का तात्पर्य बहुत-कुछ हृदयंगम कर सकेंगे ।
बहुत लोग कहते हैं कि विप्लवियों के कार्यों के कारण मंगल की अपेक्षा
अमंगल ही अधिक हुआ, अंग्रेज सरकार को इन विप्लवियों के कारण ही प्रजा-
पीड़न का अधिक सुयोग मिल गया है, इसी से नित्य नये-नये कठोर-से-कठोर
क़ानूनों के सहारे भारत के वैध खुले आन्दोलनो मे भी अंग्रेज सरकार अनेक
प्रकार से बाधाएँ डाल पाई है। पर सच बात कहें तो वैध प्रकाश्य आन्दोलन का
दमन होने के बाद से ही विप्लव का कार्य-कलाप प्रकाशित होने लगा है, और
रोलट कमेटी की सिडीशन रिपोर्ट मे अग्रेजो ने कदाचित् अनजान मे ही इस
प्रकार सब विषयों की आलोचना की है जिससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि विप्लवियों
के प्रत्येक उद्योग के कारण ही बारी-बारी अंग्रेज़ों ने भारत को राजनैतिक
अधिकार दिए हैं।
यह बात भी अवश्य ही बहुत लोग स्वीकार करते हैं कि भारत को जो कुछ
सामान्य राजनैतिक अधिकार मिले है वे मुख्यतः भारत के इन दृढ़चित्त विप्लवियों
के प्रयास से ही मिले हैं।
खैर, जो भी हो, विप्लवियो ने जो चाहा था वह तो नही हो पाया ; विप्लवी
देश को स्वाधीन करना चाहते थे, सो वे कर नही सके, विप्लवियों की मुख्य चेष्टा
व्यर्थ हुई ।
मैं समझता हूँ, चिन्तनशील प्रतिभावान् उपयुक्त नेता का अभाव ही इस
व्यर्थता का सबसे बड़ा कारण था। रूस या जर्मनी के विप्लव दल के बीच ऐसे
बहुत व्यक्ति हैं या थे, जो संसार के श्रेष्ठ चिन्तनशील व्यक्तियों मे आसन पाने
योग्य थे, किन्तु भारतीय विप्लव दल में ऐसे कोई भी चिन्तनशील शक्तिमान्
व्यक्ति न थे जिन्हें ठीक थिंकर (विचारक) कहा जा सके, इसी से भारतीय
विप्लव दल अपना प्रचार-कार्य, कहना चाहिए, कुछ भी नही कर पाया और
इसीलिए इस विप्लव दल का प्रभाव वैसा नही दिखाई दिया जैसा होना चाहिए
था। यह भले ही सच है कि भारत के इस विप्लववाद के अन्दर विवेकानन्द का
ज्वलन्त आदर्श वर्तमान था और भारतीय विप्लवियों में से अधिकांश इसी महा-
पुरुष की प्रेरणा से अनुप्राणित थे किन्तु विवेकानन्द के समान कोई भी प्रतिभा-