बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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मृत देह की यथोचित क्रिया करने को भी लोग कैसे जुटेंगे, यह समझ में न आता
था। सन् 1918 में विप्लवियों की अवस्था ऐसी ही शोचनीय हो गई थी। किन्तु
नलिनी इस बेवक से भी मरे नहीं। मृत्यु और भी महनीय रूप में दिखाई देने के
लिए उस समय तक ढाका में प्रतीक्षा कर रही थी। चंगे होकर नलिनी बुझते
विप्लव दीप का भार लेकर फिर ढाका में आ रहे। नलिनी और तारिणी मजूमदार
एक ही मकान में रहते थे। सन् 1918 की 15 जून को भोर के समय पुलिस ने
फिर नलिनी का मकान घेर लिया। फिर दोनों ओर से गोली चली। तारिणी के
अंगों में बहुत गोलियां लगने से वे वहीं मरकर गिर पड़े। नलिनी ने गोली खाकर
भी भागने की चेष्टा की, परन्तु फिर बन्दूक की गोली से घायल होकर उनका
शरीर भी जमीन पर लोटने लगा।
विप्लववादी नलिनी घायल अवस्था में अस्पताल में लेटाये हुए हैं—पुलिस
नाम-धाम लेने में व्यग्र है,—डाइंग-डिक्लेरेशन—मरते समय का इजहार, मांगती
है।
मृत्यु-शय्या पर लेटे हुए घायल विप्लववादी असह्य यन्त्रणा सहते हुए मृत्यु
की प्रतीक्षा में हैं। ऐसे समय साधारण व्यक्ति अपने को छिपा नहीं सकता, वरन्
इच्छा होती है कि उसके कार्यों को देशवासी भली भांति जान जाएँ। जिनके
लिए वह मरता है वे जान जाएँ कि किस प्रकार वह दूसरों के लिए प्राण दे गया,
साधारण मनुष्य की यही इच्छा होती है। किन्तु विप्लववादियों की अपने को
छिपाने की शैली साधारण नहीं होती। शिक्षा और साधना के बिना आत्मगोपन
का वैसा सामर्थ्य आता ही नहीं। मृत्यु के समय भी इच्छा नहीं है, कोई उन्हें
जान जाए, या कोई उनका 'मूल्य' समझ ले—कोई मैसेज (सन्देश) नही है¹—
'Unwept, unhonoured, unsung' ही वह जाना चाहता है! वह नहीं चाहता
कोई उस पर आंसू बहाये, कोई उसका नाम याद करे, कोई भी उसका गीत
गाए! —इसलिए मृत्यु-शय्या पर पड़े विप्लववादी के क्षीण कण्ठ से उत्तर
निकला, 'Don't disturb please, let me die peacefully', 'तंग न करो
भाई, मुझे शान्ति से मरने दो।'
पुलिस ने अनेक प्रकार से बात निकालने की चेष्टा की—कहा नाम तो
बताओ—घर कहाँ है? किन्तु उसका वह एक ही उत्तर था, "don't disturb
please, let me die peacefully—कृपा कर और तंग न करो भाई, शान्ति से
मरने दो।"
इस प्रकार जो मृत्यु को महिमामय बना सकते थे, इस प्रकार जिन्होंने आत्म-
गोपन करना सीखा था, उनकी कहानी पर देशवासियों ने क्या कभी गौर करके
- इस प्रसंग में असहयोग के दिन की याद आ जाती है, जब प्रत्येक छोटे-बड़े नेता चार दिन
की हवालात होने पर भी कॉलमों लम्बे 'मैसेज' अखबारों में भेजना अपना पहला कर्त्तव्य
समझते थे।