बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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सौ पचास कारतूस थे। सात-आठ पिस्तौलधारी विप्लवी सात सौ पचास कारतूस
समेत पंद्रह-की-पंद्रह राइफलें छीन ले गए। किन्तु उस समय दल की कुछ
अच्छी विधि-व्यवस्था न रहने से थोड़े दिनों में ही बन्दूकों समेत पांच विप्लवी
पकड़े गए। उन पाँचों को फाँसी हुई। इससे पहले ही अट्ठाईस व्यक्तियों को
फाँसी हो चुकी थी। इन्हें फाँसी देने के बाद भी फिर से कुछ सिक्ख स्कूल-
मास्टरों ने मिलकर विप्लव की धारा को अक्षुण्ण रखने की चेष्टा की, सम्भवतः
उसका सिलसिला आज भी चलता होगा। डा० मथुरासिंह आदि कई विप्लवी
भारत त्यागने के बाद अफ़गानिस्तान में से होकर फ़ारस में और मेसोपोटामिया
की भारतीय सेनाओं में विप्लव की बातों का प्रचार करते रहे। एक बार घटना-
क्रम से डा० मथुरासिंह भारत-अफ़गानिस्तान के सीमान्त प्रदेश में पकड़े गए।
उन्हें भी फांसी हुई। जो इस प्रकार फाँसी और कालापानी से बच पाए उनमें से
अनेकों को इण्टर्नमेंट (नज़रबन्दी) भोगनी पड़ी। उस युग में बंगाल और पंजाब
की जितनी इण्टर्नमेंट और किसी प्रान्त में नहीं हुई, और कालापानी और फाँसी
उस बार पंजाब में ही और सब प्रान्तों की अपेक्षा अधिक हुई।
उक्त प्रदेश में भी बनारस षड्यन्त्र मामले के बाद मैनपुरी को केन्द्र बनाकर
प्रायः एक बरस-भर में ही फिर एक बड़ा विप्लव दल उठ खड़ा हुआ। इस
विप्लव दल की बात भी प्रायः दो-एक बरस के बीच ही प्रकाशित हो गई। इस
प्रसंग में एक बात कह देना चाहता हूँ; रूस में प्रायः कोई भी विप्लवी दो मास से
अधिक समय तक अप्रकाशित रूप से काम न कर पाते थे। दो महीने के अन्दर ही
या तो वे राज्य से दण्ड पा जाते थे, या उन्हें देश छोड़कर विदेश का आश्रय लेना
पड़ता था। भारतवर्ष में अब तक प्रायः देखा गया है कि यहाँ विप्लवियों का
कार्यकलाप और उनका परिचय दो बरस से अधिक समय गुप्त नहीं रह पाता।
बंगाल में उस समय फांसी और कालापानी की अपेक्षा नज़रबन्दी ही अधिक
हुई। इन नज़रबन्दियों के कारण बंगाल का विप्लव दल बहुत-कुछ टूट गया,
तब यह विप्लव दल भिन्न-भिन्न भागों में बँटकर देश मे बिखर गया। उस समय
यदि विप्लवियों के हाथ में उपयुक्त परिमाण में अस्त्र-शस्त्र रहते तो वे सरकार
का राज्य चलाना असम्भव कर डाल सकते थे।
उस समय तक रासबिहारी काशी में ही थे। एक दिन केन्द्र से संवाद आया
कि बंगाल के प्रसिद्ध विप्लवनेता श्रीयुत यतीन्द्रनाथ मुखोपाध्याय को अज्ञातवास
में रहना होगा, और उन्होंने कांशी में आकर रहने की इच्छा प्रकट की है। हमने
परामर्श करके देखा कि उन्हें काशी में बेखटके रहना कुछ ऐसी कठिन बात नहीं
है; किन्तु हमने यह भी देखा कि काशी के बाहर उनके दल की भूल-चूक के
कारण काशी पर भी विपत्ति आ सकती है। जिस दल की प्रत्येक विधि-व्यवस्था
अपने नियन्त्रण के अधीन हो उसकी भूल-चूक के लिए दायित्व लिया जा सकता
है, और उस अवस्था में भूल-चूक पकड़ना और उसका संशोधन करना भी अपनी
ताक़त में होता है। किन्तु जिस दल की विधि-व्यवस्था के ऊपर अपना कोई हाथ