बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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होता तो उस विपत्ति में भी वे रक्षा पा सकते थे। किन्तु आर्गनिजेशन न रहने
से उन्हें क्रमशः एक गांव से दूसरे गांव भागना पड़ा। इस प्रकार सन्ध्या के बाद
बालेश्वर के निकट एक जंगल में आ उपस्थित हुए। उस समय ज़िले के मैजिस्ट्रेट
और ज़िले के सुपरिटेण्डेण्ट, आर्मड् (सशस्त्र) पुलिस सर्चलाइट (search
light) इत्यादि खण्डयुद्ध (skirmish) का सब सरंजाम संग लेकर यतीन्द्रनाथ
के पीछे दौड़ते आते थे। यतीन्द्रनाथ दल सहित आगे-आगे जा रहे थे, और पीछे
पुलिस दल दो भागों में बँटकर जंगल के दोनों बाजू पर सर्चलाइट छोड़ते हुए
क्रमशः एक-दूसरे के नजदीक होते हुए यतीन्द्रनाथ का पीछा कर रहा था। इस
प्रकार जंगल में से खिसक जाना यतीन्द्रनाथ के लिए सम्भव न रहा। भोर भी हो
गया। अब और निस्तार नहीं—पुलिस बहुत ही निकट थी। उस समय यतीन्द्र-
नाथ के साथियों ने सजल नेत्रों से प्रार्थना की—वे मरते हैं तो मरें, यतीन्द्रनाथ
कपटवेश से दूसरी जगह निकल जायें। किन्तु यतीन्द्रनाथ ने यह प्रस्ताव नहीं
माना। वे बोले—"प्यारे भाई, देखो, विचार करो, हम सब पिता-माता की
स्नेहमयी गोद, स्त्री-पुत्रों का माया-बन्धन, बन्धु-बान्धवों का प्यार-दुलार और
घर की सुख-शान्ति छोड़कर आये हैं, एक संग काम करेंगे यही कहकर न ? अब
इस विपत्ति के समय वह प्रण क्योंकर छोड़ दें ? मनुष्य तो अमर नहीं है। एक-
न-एक दिन उसे मरना ही होगा। तब कायरों की तरह मरने से लाभ क्या !"
युद्ध करना ही तय पाया। एक ओर प्रायः हज़ार से अधिक गाँववाले, डाकू
पकड़े जा रहे हैं यह समझकर, हथियारबन्द पुलिस सेना का साथ दे रहे है—
दूसरी ओर हैं केवल पांच विप्लवी ! वे फिर जंगल छोड़कर गांव मे आ घुसे।
भूख, अनिद्रा और राह की मेहनत से वे सभी हारे-थके थे। एक पैसे का चना-
चबेना खरीदकर खा लेने का भी चारा न था। इतने मे दोनो दलों ने एक-दूसरे
को देख लिया, दोनों ओर से गोली चली। पुलिस की ओर के एक साहब
विप्लवियों की ओर ज़रा अधिक आगे बढ़े, उसी समय चित्तप्रिय की एक गोली से
उनकी टोपी आसमान में उड़ गई। पुलिस के साहब फिर आगे न बढ़े। विप्लवी
लोग ऊँची-नीची ज़मीन पर लेटकर निशाना बांधकर गोली छोड़ने लगे। पुलिस
की ओर से भी धारा-प्रवाह गोलियां बरसने लगीं। इस प्रकार प्रबल शत्रुओं के
मुक़ाबले में थके-मांदे, भूखे-प्यासे पांच आदमी कब तक युद्ध कर पाते ? विप्लवियों
की गोलियां भी खतम होने को आईं। वे सभी घायल हो गए थे। किन्तु घायल
होने पर भी उन्होंने हथियार नहीं रखे। इतने में एक घातक गोली आकर
चित्तप्रिय को अमर-धाम ले गई, और सब भी उस समय बुरी तरह घायल थे।
यतीन्द्रनाथ उस समय साथियों से बोले, "अब और शक्ति क्षय करने से कुछ लाभ
न होगा। चित्तप्रिय गया, मैं भी बचूँगा नहीं, तुम अब वृथा प्राण न दो, शायद
तुम फिर भविष्य में कुछ काम कर सको," किन्तु साथी लोग लड़कर प्राण देना
चाहते थे, पर यतीन्द्रनाथ उनके प्राण बचाना चाहते थे। अन्त में उन्होंने यतीन्द्र-
नाथ के आग्रहपूर्ण अनुरोध से आत्मसमर्पण कर दिया। बहुत खून गिरने से