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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 178, कुल 408 में से

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पृष्ठ 178

176 / बन्दी जीवन
“कोन आलोते प्रानेर प्रदीप
ज्वालिए तुमि धराय आस¹
साधक ओगो प्रेमिक ओगो
पागल ओगो धराय आस।”
“हे साधक, हे प्रेमिक, हे पागल, तुम इस भूमि पर आते हो—किस ज्योति
से प्राणों के प्रदीप को जलाकर तुम इस भूमि पर आते हो !’”²

  1. उच्चारण—आसो।
  2. इस अध्याय के कुछ अंश नलिनी बाबू के ‘विप्लववाद’, ‘आत्मशक्ति’ में प्रकाशित,
    गोपेन्द्रलाल राय के एक लेख और ‘शंख’ मे प्रकाशित ‘नलिनी वाक्चि’ की कहानी से
    लिए गए है। —लेखक