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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 169, कुल 408 में से

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पृष्ठ 169

परिणाम / 167
होता है, कोई भी विप्लवी पकड़ा न जाता। विप्लवी लोग अपने को गुप्त रखकर
भी बराबर विप्लव कार्य में लिप्त रहते थे, इसी कारण वे बार-बार विपत्ति में
पड़ते थे। किन्तु केवल प्राण बचाना ही तो विप्लवियों का उद्देश्य न था। जीवन
यदि देश के काम में न लगा तो जीवन बना रहने से क्या बनेगा, यही थी
विप्लवियों की धारणा। उधर पूर्व परिच्छेद में उल्लिखित उसी बैंकॉक के वकील
ने जब विप्लवायोजन के सब सम्वाद सरकार के पास खोल दिये तब उसी सिल-
सिले में कलकत्ता में और कुछ धर-पकड़ हुई। इसी सूत्र से फिर यतीन्द्रनाथ के
अड्डे का सम्वाद भी पुलिस को मिल गया। यतीन्द्रनाथ को भी पता लग गया
कि पुलिस को उनका सुराग़ मिल गया। वे चाहते तो उसी समय भाग सकते थे,
पर तुच्छ प्राणों के डर से यतीन्द्रनाथ भागना न चाहते थे। उद्देश्य-सिद्धि के लिए
यदि उन्हें दूसरी जगह जाना होता तब भी वे अपने साथियों को छोड़कर भागने
को राज़ी न थे। वे अपने साथियों के जीवन और अपने जीवन में कोई भेद न
देखते थे। इसी से तय हुआ कि सभी एक सग ही जाएँगे, किन्तु उनके साथियों में
से दो उस समय बारह मील दूर घने जंगल में थे। उनका किसी प्रकार भी
छोड़कर जाना नही हो सकता। यतीन्द्रनाथ अपने दूसरे संगियों को ले अँधेरी
रात में पहाड़ी रास्ते से जंगल के बीचोंबीच अपने साथियों को लाने के लिए
चल पड़े। अपरिचित रास्ते पर बारह मील रास्ता तय करके फिर बारह मील
वापम आकर दूसरी जगह जाना असंभव था। तब भी यतीन्द्र बाबू का हृदय
इसे असम्भव कहकर रह नही सकता था। असाध्य साधन ही उनके जीवन का
व्रत था—उस दिन भी उस असाध्य साधन में ही वे अग्रसर हुए। लौटते हुए रात
बीत गई। उस समय जंगल के साथ-साथ गाँवों के पड़ोस मे नदी के किनारे-
किनारे चौकियाँ बैठ गई थी; किन्तु इतना आयोजन होने पर भी वे बस्ती में
घुसकर बालेश्वर की ओर भाग चले। उनके साथ चित्तप्रिय, मनोरंजन, नीरेन्द्र
और ज्योतिष ये चार युवक थे। उस समय सबेरा हो गया था, गाँव के लोगों
को पुलिस ने समझा दिया था कि एक भयकर डकैतों का दल उनके इलाक़े में
छिपा हुआ है, उन्हें पकड़ने अथवा पकड़ा देने पर यथेष्ठ पुरस्कार दिया जायगा।
पिछले दो दिन यतीन्द्रनाथ को खाना या सोना कुछ नसीब न हुआ। दिन दोपहर
की धूप में उन्हें फिर भी ग्राम, नदी, नाले पार करके चलना पड़ रहा था। राह
में एक नदी पार होते समय माझी से कहा कि सारा दिन उन्हें कुछ खाने को नही
मिला, थोड़ा-सा भात रांध दे तो उनके प्राण बचें, किन्तु हिन्दू माझी अपने जन्म-
जन्मान्तरों के संस्कारों की रक्षा में ही व्यस्त रहा ब्राह्मण की प्राण-रक्षा हो या
न हो, ब्राह्मण को भोजन करा के वह नरक जाने को प्रस्तुत न था, वह नीच जाति
का होकर ब्राह्मणों को किसी प्रकार भात राँधकर न दे सकता था, इसी कारण
भात रांधने की हाँडी भी न दे सकता था। इधर पुलिस को भी सन्धान मिल गया
कि यतीन्द्रनाथ अमुक गाँव में से गुज़र रहे हैं। यतीन्द्रनाथ के पीछे-पीछे सशस्त्र
पुलिस दल छूट पड़ा। इस प्रदेश में यदि विप्लवियों का आर्गनाइजेशन (संगठन) रहा