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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 184, कुल 408 में से

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पृष्ठ 184

182 / बन्दी जीवन
जो भी हो, जो हम कह रहे थे उसी पर फिर आ जाएँ, हम कह रहे थे कि भार-
तोयों का विप्लव प्रयास व्यर्थ क्यों हुआ ?
अनेक लोग कहते हैं कि उपयुक्त समय नही आया था इसी कारण भारतीयों
का विप्लव प्रयास व्यर्थ हुआ, अर्थात् विप्लव प्रयास को सफल करने के लिए जो
परिस्थिति अपेक्षित है वह परिस्थिति भारत में अब भी नही है, भारत के जन-
साधारण सचमुच विप्लव करना नही चाहते, इसीलिए विप्लव का प्रयास व्यर्थ
हुआ । भारतवासी सचमुच स्वाधीनता नही चाहते, पराधीनता की ज्वाला को
सच ही अनुभव नही करते, इसी से वे विप्लव पथ में अग्रसर नही होते; बहुतों के
मत मे विप्लवियों के असफल होने का यही सर्व-प्रधान कारण है ।
किन्तु भारतवासी सच ही स्वाधीनता नही चाहते, पराधीनता की ज्वाला
का अनुभव नही करते, यह तो मैं नही मानता, किन्तु उस स्वाधीनता को पाने
के लिए जिस त्याग, जिस वीरता की आवश्यकता होती है, भारतवासियों में उन
सब गुणो का एकदम अभाव है, यह बात न मानने का भी तो कोई चारा नही
है । किन्तु जो लोग यह कहते है कि देश के अशिक्षित जन साधारण (Mass) ने
इस विप्लवान्दोलन मे योग नही दिया इसी कारण विप्लव का प्रयास व्यर्थ हुआ
उनकी बात भी मुझे ठीक नही मालूम होती—कारण कि विप्लवियों ने कभी
किसी भी दिन प्रकट या गुप्त रूप से देश के किसानो अथवा कुली-मजदूरों को
इस विप्लवान्दोलन मे भाग लेने के लिए पुकारा ही नही, देश के शिक्षित लोगो ने
जब जिस रूप मे जन-साधारण (Mass) को पुकारा है, जन-साधारण ने अनेक
त्याग करके भी बहुधा इस पुकार का उत्तर दिया है । देश के शिक्षित लोग अपने
कर्तव्य को समझ लेने पर भी जो काम नही कर सकते, देश के अशिक्षित जन-
साधारण अनेक बार अपनी सहज बुद्धि से वह काम अनायास ही कर डालते है ।
अवश्य अशिक्षित जनता कर्तव्य की खातिर बहुत दिन तक त्याग अथवा कष्ट
स्वीकार नही कर सकती, इसी से अशिक्षित जनता के खयाल पर निर्भर करके
कोई भी बडा या स्थायी कार्य करना सम्भव नही ।
ओर जो लोग यह कहते है कि देश के अधिकांश लोग अशिक्षित हैं, इसीलिए
भी विप्लव का प्रयास सार्थक नही होता, और जब तक देश के अधिकांश लोग
शिक्षित नही होते, तब तक विप्लव का प्रयास व्यर्थ होगा ही, इनसे मै रूस का
दृष्टान्त दिखाकर कह सकता हूँ कि विप्लव प्रयास की सार्थकता अथवा व्यर्थता
देश के लोगो के लिखना-पढ़ना जानने न जानने पर निर्भर नही करती ।
तो फिर भारत का विप्लव प्रयास व्यर्थ क्यों हुआ ? किन्तु सच ही क्या
भारतीय विप्लवियों का इतना त्याग, इतना अद्भुत साहस सब एकदम व्यर्थ ही
हुआ है ? इन्होंने कितने ही कष्ट सहे, कितनी ही विषम विपत्तियों के बीच ऐसी
निष्ठा के साथ अविचलित रहे, कितनी ही दुर्घटनाओं के तीव्र आघात, कितने ही
विश्वासघातकों के निर्दय व्यवहार और कितनी ही पराजयों की मर्मपीड़ा सहकर
ऐसी दुर्दमनीय दृढ़ता के साथ वे बार-बार अपने संकल्प की साधना में अग्रसर