बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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की ओर जानेवाले पथ पर चलते हुए जीवन बिताया है, और इन समालोचक
लोगों ने आराम-चौकी पर बैठकर समालोचना करने को ही जीवन का पेशा बना
डाला है और बहुतों का तो यह समालोचना करना ही जीविका अर्जन करने
का मुख्य अवलम्ब हो गया है। जीविका कमाने के लिए अनेक बातों का हिसाब
करके चलना होता है, किन्तु इस प्रकार हिसाब करके चलने से हमेशा सत्य की
मर्यादा को अटूट रखना शायद सम्भव नहीं होता। इस सबके अलावा विप्लवियों
में और इन सारे समालोचकों में एक और भी बड़ा भेद है, विप्लवियों के नजदीक
जो चीज़ 'Faith' (श्रद्धा) है; समालोचकों के लिए वह केवल 'Opinion
(सम्मति) है। यह 'सम्मति' प्रायः सफलता का मोह पार नहीं कर सकती; इसी-
लिए फलाफल पर निर्भर होकर ही बहुधा 'सम्मति' बनती है। किन्तु जो लोग
इतिहास-स्रष्टा के आसन पर बैठते हैं वे इस 'सम्मति' की परवाह नही करते;
वे निष्ठावान् और श्रद्धा-सम्पन्न व्यक्ति होते हैं। विफलता उन्हें श्रद्धा-भ्रष्ट
नही कर पाती। इसी कारण इतिहास मे वे चिरस्मरणीय हो जाते हैं; इसी से
ये श्रद्धा-सम्पन्न व्यक्ति ही जगत् में कुछ स्थायी काम कर जाने मे समर्थ होते
हैं।
भारत के विप्लववादी भी ऐसे ही श्रद्धा-सम्पन्न व्यक्ति थे। भारत के इन
विप्लवियों की ओर निर्देश करके ही प्रसिद्ध कानून-वेत्ता बैरिस्टर नार्टन साहब
ने एक बार कहा था, "ये सब विप्लवी अपने अभीष्ट साधन मे कृतकार्य नही हो
पाते, इसी कारण आज वे सरकार के अपराधी हैं, किन्तु यदि ये अपने उद्देश्य को
सफल कर सकते तो फिर यही संसार मे स्वदेश-भक्त, वीर तथा साधक कहकर
पूजे जाते।"
भारतीय विप्लवियों ने जो मार्ग ग्रहण किया था उस मार्ग से ही भारत की
मुक्ति होगी कि नहीं, कौन कह सकता है ! शायद उन्होंने उल्टा ही रास्ता ग्रहण
किया हो; किन्तु उनके साथ हमारा मत नही मिलता, इसी कारण तो उन्हें
'ईडियट' (बुद्धू) कहना उचित नहीं है। न जाने संसार के सभ्य लोगों में भारत-
वासियों के मान-इज्जत की इन विप्लवियों के द्वारा अधिक रक्षा हुई है अथवा
इनके विरोधी समालोचकों की युक्तियों के ज़ोर पर ! तो भी यह बात तो हम
जानते हैं कि गत साठ बरसों तक जब रूसी विप्लववादियों के सभी प्रयास निष्फल
हुए थे, जब प्रबल प्रतापी आस्ट्रिया की राजशक्ति के विरुद्ध इटली के मुट्ठी-भर
विप्लववादियों ने पहले-पहल सिर उठाया था, तब इन देशों के विप्लववादियों को भी
ऐसे ही व्यंग्य और गालियां सहनी पड़ती थीं। साठ बरस के अनथक परिश्रम के बाद,
अनेक बाधाओं और व्यर्थताओं में से गुज़रकर सारे जगत् की उपेक्षा और प्रति-
कूलता को सहकर आज रूसी विप्लववादियों की आशा सफल होने जा रही है।
प्रायः चालीस बरस की कशमकश के बाद, कितने त्याग, कितने कष्ट और कितनी
अशान्तियों को लांघकर इटली ने स्वाधीनता पाई थी। किन्तु जो इस मुक्ति-पथ
के प्रथम यात्री थे उन्हें उनकी पहली विप्लव चेष्टाओं के व्यर्थ होने के दिन