बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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कितनी निन्दाएँ सहन न करनी पड़ी थीं ! इस प्रसंग में आइरिश वीर टी०
मेक्सिवनी की चिरस्मरणीय बात याद आती है—“Any man who tells you
that an act of armed resistance---even if offered by ten men
only — even if offered by men armed with stones — any men
who tell you that such an act of resistance is premature, impr-
udent, or dangerous, any and every such man should be
atonce spurned and spat at, for remark you this and recoll-
ect that somewher and somehow and by somebody a beginn-
ing must be made and that the first act of resistance is always
and must be ever premature, imprudent and dangerous.” अर्थात्
“कोई आदमी जो तुम्हें यह कहे कि एक सशस्त्र मुकाबला—चाहे दस आदमी ही
ऐसा मुकाबला करें—चाहे उन आदमियों के पास पत्थरों के सिवाय और कोई
हथियार न हो—कोई आदमी जो तुम्हें कहे कि ऐसा मुकाबला अपरिपक्व है,
अक्लमन्दी का काम नहीं है या खतरनाक है; प्रत्येक ऐसा आदमी लात खाने
लायक और मुंह पर थूका जाने लायक है। क्योंकि यह बात समझ लो और याद
रखो कि कहीं-न-कहीं, किसी-न-किसी तरह और किसी-न-किसी को मुकाबले का
आरम्भ करना होगा और मुकाबले का पहला काम हमेशा अपरिपक्व और
खतरनाक होता है और होना ही चाहिए।”
मैंने अपनी शक्ति के अनुसार इन विप्लवियों का एक संक्षिप्त क्रमबद्ध
इतिहास लिखने की चेष्टा की है। किन्तु इतिहास का प्राणहोता है—जजमेण्ट—
निर्णय। इस जजमेण्ट (निर्णय) के बिना इतिहास खाली घटना-पंजिका (chr-
onicle of events) रह जाता है। इसी से मैं वक़्त-ब-वक़्त घटनाएं छोड़कर
और अनेक बातों को भी ले आया हूँ और विप्लवियों की मैंने प्रशंसा की है, इससे
कोई यह न समझे कि मैं विप्लववाद का प्रचार करता हूँ। मैं कहना चाहता हूँ कि
उनके साथ हमारा मतभेद रहने पर भी उनके चरित्र-बल को हम अस्वीकार
नहीं कर सकते। किन्ही के साथ मतभेद रहने से ही उनसे घृणा करना या उनको
गाली-गलोज करना तो अभीष्ट नहीं है, और विप्लवियों के विरोधी अंग्रेज़ राज्या-
धिकारियों ने भी इनके चरित्र की भरपूर प्रशंसा की है, इससे वे (अंग्रेज़) भी
सचमुच विप्लववादी नहीं हो गए।
इतिहास लिखने बैठा हूँ, इसी से भारतीय विप्लवियों को भारतवासी
किस दृष्टि से देखते थे, क्यों इस दृष्टि से देखते थे, और उन्हें किस दृष्टि से
देखना उचित है? इन सब विषयों की भी आलोचना कर गया हूँ। विप्लवियों
ने सचमुच पागलपन किया था कि नहीं, यह नहीं जानता हूँ, तो भी उनके
पागलपन की बात सुनकर रवि बाबू की एक कविता के कुछ पद याद आते
हैं—