बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविप्लव का प्रयास व्यर्थ क्यों हुआ ? / 181
हिन्दुओं के स्वावलम्बन के ऊपर ही भरोसा करके अपने कार्य में आगे बढ़ते थे,
तो भी स्वाधीन भारत की कल्पना में भारत की किसी भी जाति को उन्होंने
दूसरी जाति के अधीन कर रखने का संकल्प नहीं रखा, अर्थात् भारत की
स्वाधीनता के लिए भले ही हिन्दू मुख्यतः परिश्रम करें तो भी स्वाधीन भारत
में प्रत्येक जाति का समान अधिकार रहेगा अर्थात् प्रत्येक जाति का स्वार्थ
अक्षुण्ण रहेगा, यही था भारतीय विप्लवियों का राजनैतिक आदर्श ।
हमारे देश के प्रायः सभी लोग एक सुर मे कहते रहे हैं कि भारत का
विप्लव-प्रयास बिलकुल ही व्यर्थ हुआ है, और इस प्रकार उसका व्यर्थ होना ही
अवश्यम्भावी था । वे कहते हैं, वर्तमान युग में नवीन वैज्ञानिक उन्नति के कारण
किसी भी राजशक्ति के विरुद्ध कोई प्रजा सामरिक शक्ति की सहायता से विप्लव
नहीं कर सकती, और वे सोचते हैं, कि अंग्रेजों के समान शत्रु को सामरिक
शक्ति की सहायता से हराकर स्वाधीनता पाने की कल्पना करना भी निरा
पागलपन है, इसी से वे भारत के विप्लवियों को पागल और अविवेकी अथवा
निर्बोध समझते थे और समझते हैं।—अवश्य ही, इन सब समालोचकों की बाते
यदि सत्य हैं तो भारत को चिरकाल तक पराधीन ही रहना है, कारण कि पूर्ण
स्वाधीनता पाने का और कोई रास्ता भी ये समालोचक लोग दिखा नहीं सके,
और इस आधुनिक युग में भी रूस और जर्मनी के विप्लव दलों ने प्रबल राज-
शक्ति को हरा दिया है, यह बात न मानने का भी तो कोई चारा नहीं है; इसी
से यह कहना, जान पड़ता है, युक्तिसंगत न होगा कि वर्तमान युग में कोई भी
प्रजा शक्ति सुप्रतिष्ठित राज शक्ति को विप्लव के रास्ते से सामरिक शक्ति की
सहायता से हरा नहीं सकेगी, और भारत के विप्लव दल के साथ रूस और
जर्मन के विप्लव दलों की तुलना करने से एक बात विशेष रूप से हमारे ध्यान
में आती है कि जर्मन और रूसी विप्लवियों को अपने ही लोगों के विरुद्ध अस्त्र
धारण करने पड़े थे, परन्तु किसी विदेशी राज शक्ति के साथ लड़ाई हो तो सारे
स्वदेशवासियों की सहानुभूति और सहायता पाने की यथेष्ठ संभावना रहती है।
इसी से विदेशी राज शक्ति के विरुद्ध विप्लव करना सिविल वार (गृह युद्ध)
करने की अपेक्षा अनेक अंशों में सहज है । तो भी यह बात तो सच है कि भारत
का विप्लव प्रयास व्यर्थ हुआ और रूसियों और जर्मनों के विप्लव प्रयास सफल
हुए हैं। यह बात सच भले ही है, किन्तु इस व्यर्थता के कारण के विषय में ही तो
अनेकों के साथ मेरा मतभेद है, और यहाँ मैं इस कारण का ही अनुसंधान कर
रहा हूँ। भारतीयों को सचमुच विप्लव के पथ में जाना चाहिए कि नहीं, इसकी
मैं कोई आलोचना नहीं कर रहा हूँ, यहाँ पर तो केवल अपने विरुद्ध पक्षवालो
की प्रधान युक्ति का ही विश्लेषण कर दिखाने की तनिक-सी चेष्टा की है। एक
बात पाठक मन में रखें कि मैं अतीत की बातों की आलोचना कर रहा हूँ और
अतीत की आलोचना करना ही इतिहास लिखते समय ठीक है, इसी से भविष्य
में क्या होगा अथवा क्या होना उचित है यह मेरा आलोच्य विषय नहीं है। अस्तु,