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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 408 में से

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पृष्ठ 168

166 / बन्दी जीवन
नहीं, उसकी भूल-चूक पकड़ने का सुयोग कहाँ होता है ? यह सच था कि बंगाल के
बहुत-से क्षुद्र-क्षुद्र दल यतीन बाबू के नेतृत्व के अधीन सम्मिलित हो गए थे, किन्तु
वे पूर्व बंगाल की अनुशीलन समिति के साथ अथवा चन्दननगर के विप्लवियों के
अर्थात् रासबिहारी के साथ सम्मिलित न हुए थे, और न होने की कोई चेष्टा ही
करते थे, जापान जाने से पहले रासबिहारी ने उनके साथ भेंट करने की बहुत
चेष्टा की, किन्तु जिस किसी कारण से हो, भेंट न हो सकी। खैर, जो भी हो, जब
यतीन बाबू के काशी आने की बात चली तब हमने सब तरफ देख-भालकर उन्हें
काशी में रखने का भार लेना स्वीकार कर लिया, किन्तु क्या जाने क्यों उन्होंने
खुद ही काशी न आना ही तय किया ।
उस समय भी यतीन बाबू कलकत्ता छोड़कर गए नहीं। एक दिन वे अपने
पाथुरियाघाट वाले एक मकान पर आये हुए थे। वहाँ और भी कई फ़रार विप्लवी
थे । उस समय उसी घर में घटनाक्रम से थोड़े दिनों का परिचित एक आदमी आ
उपस्थित हुआ। इस आदमी पर वे गुप्तचर होने का सन्देह करते थे, इसी से
भली प्रकार आगे-पीछे देख-भाल करने से पहले ही विप्लवियों में से एक ने इस
थोडे दिन के परिचित आदमी को देखते ही गोली दाग़ दी । सुविधा होती तो
यतीन बाबू को गवर्नमेंट निश्चय से पकड़ लेती। यतीन बाबू को बचाने की
ख़ातिर ही सम्भवतः इस युवक ने इस प्रकार गोली दाग़ दी थी। यह बात सच
है कि यतीन बाबू ने गोली नही मारी, किन्तु इस व्यक्ति ने डाइंग-डिक्लेरेशन
(मरते समय के इज़हार) में यतीन बाबू के नाम पर ही गोली मारने का अभियोग
लगा दिया। इस प्रकार यतीन बाबू के नाम पर फांसी का परवाना लिखा गया।
जब उस व्यक्ति को गोली ही मारनी थी तब फिर डाइंग-डिक्लेरेशन देने का
सुयोग क्यों दिया गया, यह कह नहीं सकता।
लाचार यतीन बाबू को दूसरी जगह जाना पड़ा । यतीन बाबू के लिए एक
निरापद स्थान ठीक हुआ। वहाँ जाने का समय आया तो यतीन्द्रनाथ अपने
साथियों से कह उठे, "जब तक मैं भली भाँति न जान लूं कि तुमने और सबके
लिए भी ऐसे ही निरापद स्थान ठीक कर रखे हैं, जैसा मेरे लिए किया है, तब तक मैं
तुम्हारा यह बन्दोबस्त मान नहीं सकूंगा, हम सब बरखास्त किये हुए सिपाही हैं,
हर घड़ी मृत्यु का आदेश सुनने की प्रतीक्षा में हैं, इसीलिए सभी एक संग रहना
चाहते हैं, जिससे एक प्रभावशाली मुठभेड़ (effective struggle) की जा सके,
which will create a moral impression जिससे जनता पर एक नैतिक
प्रभाव हो सके ।
अन्त में उनकी इच्छानुसार ही व्यवस्था हो गई, जिससे वे लोग पाँच व्यक्ति
बालेश्वर के निकट एक अड्डा बनाकर रहने लगे। इधर विप्लवान्दोलन भी बन्द
नहीं हुआ। दूर बालेश्वर में रहते हुए भी यतीन्द्र बाबू विप्लव कार्य की परि-
चालना करते थे। यदि विप्लवी लोग भागकर फिर से विप्लव के कार्य में ध्यान न
देकर निश्चेष्ट होकर केवल अपने को गुप्त रखने का ही खयाल करते, तो मालूम