बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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का आश्रय लिया और अनेकों ने तिल-तिल करके पूर्ण रूप से अपने परिवारवालों
और राज्याधिकारियों द्वारा अनेक कष्ट भोगते हुए जीवन के भोग-विलास को
तुच्छ समझकर विपत्ति के बीच ही जीवन बिता दिया। जो भी हो, विप्लवियों
ने वर्तमान काल में छात्र आदर्श को ही श्रेष्ठ आसन दिया था। इसी से इस
छात्र आदर्श का ही वे भारत के जनसाधारण में प्रचार करने का प्रयास करते
रहे।
इस प्रकार से विप्लवी लोग भारत के गरीब-से-गरीब जनसाधारण तक को
ही समझते थे, किन्तु किस प्रकार ये गरीब-से-गरीब जनसाधारण तक अपनी
अभिलाषाएँ व्यक्त करेंगे और किस प्रकार सचमुच ही इन जनसाधारण की
अभिलाषाएँ अक्षुण्ण रह सकेंगी, देश के समाज में धनी और निर्धनों के बीच,
जमींदारों और उनकी रैयत के बीच, धनी व्यवसायपतियों और कुली-मज़दूरों के
बीच, देशी और विदेशी व्यवसायपतियों के बीच परस्पर जो अनेक स्वार्थों के
द्वंद्व उपस्थित हो गए हैं, और इन विरुद्ध स्वार्थों के संघर्ष के कारण जगत् में जो
अनेक प्रकार की अशान्ति, अनेक प्रकार के वैषम्य, अनेक अत्याचारों, यन्त्रणाओं
और अनेक भीषण रक्तपातों की सृष्टि हो रही है, इन सब द्वंद्वों को कैसे सुलझाना
होगा, और यथार्थ विप्लवी होने पर राष्ट्र के समान समाज को भी चूर-चूर कर
नये सिरे से गढ़ना होगा, ये सब बातें भारत के विप्लवी लोग भली भाँति हृदयंगम
नहीं कर पाए, और इन सब समस्याओं की ओर ध्यान देते हुए भारत के भावी
राष्ट्र को सच ही किसी विशेष रूप में गढ़ना होगा, यह बात भी उन्होंने गम्भीर
चिन्तन के साथ नहीं सोची थी। वे सोचते थे कि ये सब बातें स्वाधीनता पाने
के बाद देखी जाएँगी। तो भी अधिकांश विप्लवियों का यही मत था कि भारत
की राष्ट्र-शासन-पद्धति की नींव गणतन्त्र के आदर्श पर ही स्थापित होगी। इस
व्यापार में अधिकांश विप्लवी राजा के लिए कोई स्थान नहीं रखते थे। अधिकांश
इसलिए कहता हूँ कि इनमें ऐसे भी कुछ व्यक्ति थे जो सोचते थे कि यदि भारत
के कोई स्वाधीन कहलानेवाले राजा भारत के इस स्वाधीनता समर में प्राण और
मन से योग दें तो उन्हें भारत का राज्यासन दिया जा सकता है, और उस दशा
में भारत का राष्ट्र संगठन इंग्लैंड की पार्लियामेंट के अनुसार गठित होगा।
महाराष्ट्र में 'अभिनव भारत' नामक गुप्त समिति की ओर से, 'Choose oh
Indian Princes," (अर्थात् भारत के राजाओ, अपना रास्ता चुन लो) शीर्षक
की एक छोटी-सी पुस्तिका का गुप्त रूप से प्रचार किया गया था, उसमें बड़ौदा
के राजा गायकवाड़ का स्पष्ट रूप से उल्लेख करके ही उपर्युक्त भाव का प्रचार
किया गया था। पंजाब के सिखों में से अनेकों की इच्छा थी कि भारत में फिर
खालसा राज्य स्थापित किया जाय। फिर विप्लवियों में से अधिकांश हिन्दू ही
थे, इसलिए उनके बीच किसी-किसी के दिल में यह इच्छा गुप्त रूप से थी कि
भारत के स्वाधीन होने के माने हिन्दू राज्य की पुनः स्थापना के होंगे। किन्तु
क्रमशः यह भाव बिलकुल लुप्त हो जाता है, और अन्त में यद्यपि वे मुख्यतः