बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदेखा है ? वे लोग जीवन की सब आशा-प्रतीक्षा अपूर्ण रखकर संसार से एकदम
निश्चिन्त हो गए हैं। प्रतिष्ठा की रत्ती-भर भी कामना उन्होंने नहीं रखी। मृत्यु
के दरवाजे पर पहुँचकर, जहाँ कोई बात खुल जाने का डर नहीं, वहाँ भी ख्याति
का निषेध करके वे शान्ति से मरते हैं। वे अपने कर्म से यदि किसी को तृप्त करना
चाहते हैं तो अपने ही अन्तरारमा को, इसीलिए किसी और से कुछ भी अपेक्षा न
रखकर शान्ति से मरना चाहते हैं। संसार की किसी चीज की भी चाह नहीं है, वे
केवल देने के ही धनी हैं।
इन सब विप्लवियों को न जाने क्या कहकर पुकारना चाहिए ? शायद ये
पागल थे, या शायद ये भ्रान्त निर्बोध बालक थे, क्योंकि हमारे इस अभागे देश के
अभिज्ञ नेता और राजनीति-विशारद विचक्षण पंडित इन्हें इन्हीं शब्दों से पुकारते
रहे हैं।
इन विप्लवियों का सबसे बड़ा दोष, जान पड़ता है, यही था कि ये अपने
उद्देश्य-साधन में कृतकार्य नही हो सके। मास के बाद मास और बरस के बाद
बरस विप्लव के लिए अनथक परिश्रम करने के बाद भी ये केवल एक बड़ी व्यर्थता
का ही उपार्जन कर सके ? जिस पथ का अन्तिम परिणाम केवल व्यर्थता हो वह
पथ क्या भ्रान्त नही है ? इस व्यर्थता का कुछ भी मूल्य है ? भारत के अभिज्ञ
नेता और विचक्षण समालोचक विप्लवियों से ऐसे ही प्रश्न प्रायः करते रहे
हैं।
व्यर्थता के एक ही पहलू पर हमारा ध्यान जाता है; किन्तु इस व्यर्थता की
आड़ में जगत् की श्रेष्ठ सम्पद् किस प्रकार अपने को छिपाए रहती है, विफलताओं
के द्वारा किस प्रकार शक्ति का संचार होते-होते एक दिन इस व्यर्थता के बीच
सार्थकता आकर दर्शन देती है, विफलता और पराजय के निराशा-वेदना पूर्ण
अवसाद के समय में इन सब बातों को हम में से बहुत-से हृदयंगम नही कर पाते।
सभी समाजों में, सभी समयों मे विप्लवी लोगों पर समाज के विज्ञ और अभिज्ञ
लोग हँसते और लांछन लगाते रहे हैं। इसका कारण यही है कि प्रायः सभी देशों
के सभी विप्लवियों की पहली चेष्टाएं व्यर्थ हुई हैं, और समाज के विज्ञ और
अभिज्ञ लोग इसी व्यर्थता के माप से ही सब विषयों पर विचार करते रहे हैं। उसी
नियम से भारत के विप्लववादी भी विज्ञ और अभिज्ञ लोगों के मत में भ्रान्त-पथ
के यात्री हैं। और इन समालोचकों में से जो बड़े ही प्रवीण और होशियार हैं वे
इन विप्लवियों को 'ईडियट' (बुद्धू, पागल) कहने में भी संकोच नही करते।
भारत की लब्धप्रतिष्ठ मासिक पत्रिका 'मॉडर्न रिव्यू' के विचक्षण सम्पादक ने
विप्लवियों को निर्देश करके कहा था कि 'यदि भारत में कुछ भी लोग सशस्त्र
विप्लववादी हैं तो भारतवासियों को निश्चय से अपनी बुद्धि-विवेचना पर सन्देह
करना होगा।'
विप्लवियो और समालोचको मे भेद यही है कि विप्लवी लोगों की अपने
आदर्श पर अटूट श्रद्धा है, इसीलिए उन्होने अद्भुत निष्ठा के साथ अपने आदर्श